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PHD Chamber of Commerce and Industry (PHDCCI) ने नई दिल्ली के होटल ताज महल में "IBC & NCLT @10 – Celebrating a Decade of Insolvency Reforms" कार्यक्रम का आयोजन किया.
भारत के सबसे बड़े आर्थिक और कानूनी सुधारों में गिने जाने वाले Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) को 10 साल पूरे हो गए हैं. इसी मौके पर PHD Chamber of Commerce and Industry (PHDCCI) ने नई दिल्ली के होटल ताज महल में "IBC & NCLT @10 – Celebrating a Decade of Insolvency Reforms" कार्यक्रम का आयोजन किया. इस कार्यक्रम में न्यायपालिका, नीति-निर्माताओं, नियामक संस्थाओं, बैंकों, दिवाला पेशेवरों और उद्योग जगत से जुड़े प्रमुख लोगों ने हिस्सा लिया और पिछले एक दशक में भारत की दिवाला व्यवस्था में आए बदलावों तथा भविष्य की चुनौतियों पर चर्चा की.
कार्यक्रम में NCLAT के चेयरपर्सन जस्टिस अशोक भूषण, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस राजेश बिंदल, NCLT के संस्थापक अध्यक्ष जस्टिस एम.एम. कुमार, विधि विभाग की सदस्य सचिव डॉ. अंजू राठी राणा, NeSL के MD एवं CEO देबज्योति रे चौधरी, IICA के महानिदेशक एवं CEO ज्ञानेश्वर कुमार सिंह सहित कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं.
NCLAT के चेयरपर्सन जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि IBC भारत के सबसे महत्वपूर्ण कानूनी और आर्थिक सुधारों में से एक है. उन्होंने कहा कि IBC से पहले देश में दिवाला समाधान और कर्ज वसूली की प्रक्रिया कई कानूनों और मंचों में बंटी हुई थी. मामलों में देरी होती थी, मुकदमेबाजी लंबी चलती थी और कई बार कंपनी की संपत्ति का मूल्य खत्म हो जाता था.
उन्होंने कहा कि IBC ने इस बिखरी हुई व्यवस्था को एक संगठित, समयबद्ध और कर्जदाता-केंद्रित ढांचे में बदल दिया. अब फोकस सिर्फ कर्ज वसूली पर नहीं बल्कि कारोबार को बचाने, मूल्य संरक्षित रखने और जवाबदेही तय करने पर है.
जस्टिस भूषण ने कहा कि NCLT और NCLAT ने केवल कानून को लागू ही नहीं किया, बल्कि उसकी न्यायिक व्याख्या और विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
अपने संबोधन में जस्टिस भूषण ने कहा कि IBC का सबसे बड़ा प्रभाव डिफॉल्टरों के व्यवहार में बदलाव के रूप में सामने आया है. अब दिवाला प्रक्रिया शुरू होने की संभावना ही कई मामलों में समझौते और समाधान का कारण बन जाती है.
उन्होंने कहा कि कई मामलों में औपचारिक दिवाला प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही विवाद सुलझ गए. इस तरह IBC सिर्फ रिकवरी का कानून नहीं बल्कि वित्तीय अनुशासन स्थापित करने वाला प्रभावी तंत्र भी बन गया है.
हालांकि जस्टिस भूषण ने यह भी माना कि IBC के सामने अभी कई महत्वपूर्ण चुनौतियां मौजूद हैं.
उन्होंने Corporate Insolvency Resolution Process (CIRP) में होने वाली देरी को सबसे बड़ी समस्या बताया. उनके मुताबिक समयबद्ध समाधान IBC की मूल भावना है, लेकिन बढ़ते मुकदमे, बार-बार दाखिल होने वाली याचिकाएं, सीमित संसाधन और बढ़ते मामलों के कारण कई प्रक्रियाएं अपेक्षा से अधिक समय ले रही हैं.
उन्होंने ट्रिब्यूनलों में सदस्यों की समय पर नियुक्ति, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, मजबूत रजिस्ट्री सिस्टम और तकनीकी सहायता बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया.
NCLAT चेयरपर्सन ने कहा कि आने वाले वर्षों में Cross-Border Insolvency और Group Insolvency सबसे महत्वपूर्ण विषय बनने वाले हैं.
उन्होंने कहा कि भारतीय कंपनियों का वैश्विक विस्तार बढ़ रहा है और कई कारोबारी समूह एक-दूसरे से वित्तीय और परिचालन रूप से जुड़े हुए हैं. ऐसे में भविष्य की जरूरतों को देखते हुए इन क्षेत्रों में मजबूत कानूनी ढांचा विकसित करना जरूरी होगा.
उन्होंने साफ कहा कि "Resolution नियम होना चाहिए और Liquidation अपवाद." किसी भी दिवाला कानून की सफलता केवल मामलों के निपटारे की गति से नहीं बल्कि कारोबार बचाने, रोजगार सुरक्षित रखने और आर्थिक विश्वास बढ़ाने की क्षमता से तय होती है.
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस राजेश बिंदल ने कहा कि IBC ने भारत की दिवाला व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है. उन्होंने कहा कि इस कानून ने बिखरी हुई और अप्रभावी प्रणाली की जगह समाधान-आधारित ढांचा दिया, जिसका उद्देश्य व्यवसायों को बचाना और आर्थिक मूल्य को संरक्षित रखना है.
उन्होंने कहा कि पिछले 10 वर्षों में रिकवरी के नतीजों में सुधार हुआ है, संकटग्रस्त कंपनियों के पुनर्जीवन को बढ़ावा मिला है, NPA कम हुए हैं और क्रेडिट अनुशासन मजबूत हुआ है.
जस्टिस बिंदल ने कहा कि यह सफलता किसी एक संस्था की नहीं बल्कि न्यायपालिका, नियामकों, वित्तीय संस्थानों, उद्योग जगत और अन्य हितधारकों के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है.
कार्यक्रम में NeSL के MD एवं CEO देबज्योति रे चौधरी ने एक महत्वपूर्ण आंकड़ा साझा किया.
उन्होंने बताया कि करीब 32,000 आवेदन ऐसे रहे जिनमें लगभग ₹14 लाख करोड़ के कर्ज से जुड़े मामले NCLT में औपचारिक रूप से दाखिल होने से पहले ही सुलझ गए.
उनके मुताबिक IBC ने डिफॉल्टरों पर ऐसा दबाव बनाया कि उन्होंने शुरुआती चरण में ही समझौते और बातचीत का रास्ता अपनाया.
उन्होंने कहा कि Information Utilities ने सूचना विषमता को कम करने और कर्जदाताओं का भरोसा बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है.
देबज्योति रे चौधरी ने बताया कि NeSL एक ऐसा मंच है जो कर्जदाताओं और कर्ज लेने वालों के बीच प्रमाणित वित्तीय जानकारी साझा करता है. किसी भी डिफॉल्ट की जानकारी सभी संबंधित कर्जदाताओं तक पहुंचने से समाधान की प्रक्रिया तेज होती है.
उन्होंने बताया कि NeSL भविष्य में इलेक्ट्रॉनिक स्टाम्प ड्यूटी और E-Surety Bond जैसे नए डिजिटल समाधान भी लाने की दिशा में काम कर रहा है.
NCLT के संस्थापक अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एम.एम. कुमार ने शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहा कि NCLT ने सीमित संसाधनों और कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ अपना काम शुरू किया था.
इसके बावजूद संस्था ने IBC को प्रभावी ढंग से लागू किया, रिकवरी बढ़ाने में मदद की, NPA कम किए और भारत की Ease of Doing Business रैंकिंग सुधारने में योगदान दिया.
उन्होंने कहा कि पिछले 10 वर्षों में Loan Recovery Framework काफी मजबूत हुआ है और Out-of-Court Settlement को भी बढ़ावा मिला है.
IICA के महानिदेशक एवं CEO ज्ञानेश्वर कुमार सिंह ने कहा कि IBC की सफलता सरकार, न्यायपालिका, नियामकों, दिवाला पेशेवरों और उद्योग जगत के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है.
उन्होंने भविष्य की प्राथमिकताओं का जिक्र करते हुए कहा कि अब Personal Insolvency, Cross-Border Insolvency, Technology-Driven Reforms, Creditor-Led Restructuring और Institutional Capacity Building पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है.
कार्यक्रम में मौजूद विशेषज्ञों की राय थी कि IBC का पहला दशक संस्थागत निर्माण और कानूनी ढांचा विकसित करने का दशक रहा है. अब दूसरा दशक दक्षता बढ़ाने, संस्थागत क्षमता मजबूत करने, तकनीक के अधिक उपयोग और समयबद्ध समाधान सुनिश्चित करने का होगा.
यही कारण है कि IBC के 10 साल पूरे होने का यह आयोजन सिर्फ एक उपलब्धि का जश्न नहीं था, बल्कि अगले दशक के लिए भारत की दिवाला व्यवस्था का रोडमैप तैयार करने का मंच भी बना.