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Rare Earth Magnet Scheme: भारत सरकार ने 'रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट' (REPM) के सेक्टर में आत्मनिर्भर बनने के लिए कमर कस ली है. केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने दिल्ली में एक हाई लेवल बैठक की अध्यक्षता की. इस मीटिंग का मकसद देश में सिंटर्ड रेयर अर्थ मैग्नेट बनाने को स्पीड देने वाली नई योजना पर चर्चा की. बता दें कि यह योजना 15 दिसंबर 2025 को अधिसूचित की गई थी.
मौजूदा वक्त में भारत इन खास मैग्नेट के लिए बहुत ज्यादा आयात पर निर्भर रहता है. अब उम्मीद की जा रही है कि 7280 करोड़ रुपये की इस योजना से न केलव भारत की घरेलू जरूरतें पूरी होंगी, बल्कि ग्लोबल मार्केट में भी भारत एक मजबूत खिलाड़ी की तरह खुद को पेश करेगा. बता दें कि रेल और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव भी अमेरिका में क्रिटिकल मिनरल्स पर हो रही एक चर्चा का हिस्सा बने हैं, जो दिखाता है कि यह मिशन कितना अहम है.
रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) ऐसे ताकतवर चुंबक होते हैं जो नियोडिमियम और डिस्प्रोसियम जैसी दुर्लभ चीजों से बनते हैं. इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक कारों की मोटरों को बनाने, पवन चक्कियों में, स्मार्टफोन्स में और मिसाइल गाइडेंस सिस्टम में होता है. देखा जाए तो इनके बिना आधुनिक तकनीक और 'ग्रीन एनर्जी' का सपना अधूरा है.
सरकार ने इस स्कीम के लिए कुल ₹7280 करोड़ का बजट आवंटित किया है. इस स्कीम को दो मुख्य हिस्सों में बांटा गया है. पहला है सेल्स लिंक्ड इंसेंटिव, जिसके तहत 6450 करोड़ रुपये उन कंपनियों को दिए जाएंगे जो भारत में बने मैग्नेट को बेचेंगे. वहीं दूसरा है कैपिटल सब्सिडी, जिसके तहत 750 करोड़ रुपये विनिर्माण संयंत्र बनाने के लिए दिए जाएंगे.
इस योजना का लक्ष्य भारत में कुल 6000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष (MTPA) की REPM निर्माण क्षमता विकसित करना है. यह योजना अगले 7 सालों तक चलेगी. शुरुआत के 2 साल विनिर्माण सुविधाओं को बनाने के लिए 'जेस्टेशन पीरियड' के रूप में दिए जाएंगे. वहीं अगले 5 सालों तक सेल्स पर इंसेंटिव की रकम दी जाएगी.
मीटिंग के दौरान मंत्री कुमारस्वामी ने साफ-साफ कहा कि यह स्कीम सिर्फ फैक्ट्रियां लगाने के बारे में नहीं है. यह स्कीम भारत की सुरक्षा और भविष्य की मजबूती के लिए भी है. उन्होंने घरेलू और ग्लोबल इन्वेस्टर्स से इस मौके का फायदा उठाने और बोली प्रक्रिया में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने को कहा. मंत्रालय जल्द ही 'रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल' (RfP) को अंतिम रूप देने वाला है.
रेयर अर्थ मैग्नेट विनिर्माण योजना भारत के लिए 'गेम-चेंजर' साबित हो सकती है. ₹7,280 करोड़ का भारी निवेश यह स्पष्ट करता है कि सरकार भविष्य की 'ग्रीन इकोनॉमी' में भारत की हिस्सेदारी सुनिश्चित करना चाहती है. यदि यह योजना सफलतापूर्वक लागू होती है, तो भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों की कतार में शामिल हो जाएगा जिनके पास महत्वपूर्ण खनिजों और उनके अनुप्रयोगों (Applications) की पूरी तकनीक मौजूद है.
ये पाउडर धातुकर्म (Powder Metallurgy) प्रक्रिया से बने अत्यधिक शक्तिशाली स्थायी चुंबक होते हैं.
इसका मतलब है कि भारत हर साल 6,000 मीट्रिक टन वजन के बराबर चुंबक बनाने की क्षमता हासिल करेगा.
पात्र घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कंपनियां जो भारत में मैग्नेट निर्माण की इकाइयां लगाएंगी.
हां, क्योंकि मैग्नेट EV मोटर का सबसे महंगा हिस्सा होते हैं, घरेलू निर्माण से लागत कम होने की उम्मीद है.
'रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल' (RfP) वह आधिकारिक दस्तावेज है जिसमें सरकार कंपनियों से काम शुरू करने के लिए प्रस्ताव मांगती है.
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