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AICPDF ने साफ चेतावनी दी है कि अगर मार्जिन में सुधार नहीं किया गया, तो पूरे देश में विरोध प्रदर्शन शुरू किया जाएगा. प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)
देश के एफएमसीजी (Fast-Moving Consumer Goods) यानी रोजमर्रा के इस्तेमाल का सामान बनाने वाले उद्योग में इस समय एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है. देश भर के डिस्ट्रीब्यूटर्स और एफएमसीजी कंपनियों के बीच कमीशन (मार्जिन) को लेकर तनातनी बेहद गंभीर स्तर पर पहुंच चुकी है. डिस्ट्रीब्यूटर्स की शीर्ष संस्था ऑल इंडिया कंज्यूमर प्रोडक्ट्स डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन (AICPDF) ने एफएमसीजी कंपनियों को एक औपचारिक नोटिस भेजकर आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है.
फेडरेशन ने कंपनियों को अपनी मांगों को सुलझाने के लिए 30 जुलाई 2026 तक का समय दिया है. AICPDF ने साफ चेतावनी दी है कि अगर तय तारीख तक डिस्ट्रीब्यूटर्स के मार्जिन की समीक्षा कर उसमें सुधार नहीं किया गया, तो अगस्त 2026 से पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू किया जाएगा.
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एफएमसीजी डिस्ट्रीब्यूटर्स का कहना है कि आज के दौर में जब महंगाई और परिचालन लागत (Operational Costs) आसमान छू रही है, तब कंपनियां उन्हें महज 3.5% से 5% का मार्जिन दे रही हैं. इस मामूली कमीशन पर अब बिजनेस को आगे बढ़ाना या जिंदा रखना भी बेहद मुश्किल हो चुका है. डिस्ट्रीब्यूटर्स के मुताबिक, वे व्यापार में करोड़ों रुपये का भारी-भरकम निवेश करते हैं, लेकिन कंपनियों की बेरुखी के कारण उनका शुद्ध मुनाफा (Profit) लगातार घटता जा रहा है, जिससे उनकी आर्थिक सेहत पूरी तरह बिगड़ चुकी है.
इस संकट का सबसे गंभीर असर एफएमसीजी क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL) के नेटवर्क पर देखने को मिल रहा है. AICPDF के अनुसार, एचयूएल (HUL) के डिस्ट्रीब्यूटर्स की हालत इस समय बेहद गंभीर है और कई इलाकों में उनके सामने कारोबार समेटने की नौबत आ गई है:
30% टेरिटरी में सरेंडर का खतरा: कंपनी के कुल डिस्ट्रीब्यूशन क्षेत्र (Territory) के लगभग 30 प्रतिशत हिस्से में डिस्ट्रीब्यूटर्स द्वारा काम छोड़ने (Exit) या अपनी एजेंसी को सरेंडर करने का बड़ा खतरा मंडरा रहा है.
पुराने पार्टनर्स ने खड़े किए हाथ: सबसे चिंताजनक बात यह है कि जो डिस्ट्रीब्यूटर्स पिछले 30 से 40 सालों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी कंपनियों के साथ जुड़े हुए थे, वे भी अब घाटे के कारण इस कारोबार को अलविदा कह रहे हैं.
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डिस्ट्रीब्यूटर्स का आरोप है कि पिछले कुछ सालों में उनका खर्च कई गुना बढ़ गया है, लेकिन कंपनियों ने अपने कमीशन स्ट्रक्चर में कोई बदलाव नहीं किया है. पारंपरिक एफएमसीजी डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल को इन प्रमुख वजहों से तगड़ा झटका लगा है:
डीजल की बढ़ती कीमतें: माल को दुकानों तक पहुंचाने वाले वाहनों के लिए ईंधन (डीजल) लगातार महंगा हुआ है.
वेयरहाउस और सैलरी: गोदामों (Warehouses) का किराया और वहां काम करने वाले कर्मचारियों की सैलरी में भारी इजाफा हुआ है.
ब्याज की लागत (Interest Cost): बाजार में पैसा फंसने और बैंकों से लिए गए वर्किंग कैपिटल लोन पर ब्याज की दरें बढ़ने से दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है.
AICPDF का कहना है कि एक तरफ तो एफएमसीजी कंपनियां डिस्ट्रीब्यूटर्स पर ग्रामीण इलाकों (Rural Expansion) में नेटवर्क फैलाने और सामान की 'फास्ट डिलीवरी' (तेज आपूर्ति) करने का लगातार दबाव बना रही हैं, लेकिन दूसरी तरफ मार्जिन को पुराने ढर्रे पर ही रखा गया है. डिस्ट्रीब्यूटर्स ने मांग की है कि कंपनियों को न केवल उनके मार्जिन की समीक्षा (Margin Review) करनी चाहिए, बल्कि उन्हें इस कठिन दौर में लॉजिस्टिक्स सपोर्ट (परिवहन सहायता) भी प्रदान करना चाहिए.
देश के रिटेल इकोसिस्टम और एफएमसीजी सेक्टर की ग्रोथ के लिए डिस्ट्रीब्यूटर नेटवर्क की रीढ़ की हड्डी को बचाना बेहद जरूरी है. अगर डिस्ट्रीब्यूटर्स की आर्थिक स्थिति इसी तरह खराब होती रही, तो देश की पूरी सप्लाई चेन (आपूर्ति श्रृंखला) ध्वस्त हो सकती है, जिसका सीधा असर फैक्ट्रियों से लेकर आपके मोहल्ले की किराना दुकानों तक पड़ेगा. कंपनियों के पास 30 जुलाई तक का समय है. अब देखना यह होगा कि क्या बातचीत के जरिए इस गतिरोध को सुलझाया जाता है या अगस्त में देश को एक बड़े व्यापारिक आंदोलन का सामना करना पड़ेगा.
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