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पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष अब अपने छठे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर दिख रहा है. युद्ध शुरू होने से पहले कच्चा तेल (Crude Oil) जो लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल पर था, वह अब उछलकर 110 डॉलर प्रति बैरल के पास कारोबार कर रहा है. इस भारी बढ़त के बावजूद, भारत सरकार ने अभी तक पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों (Pump Prices) में कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं की है.
PwC इंडिया के पार्टनर और आर्थिक सलाहकार राणेन बनर्जी ने न्यूज एजेंसी ANI से बात करते हुए इसे एक 'अस्थिर स्थिति' करार दिया है. उनके अनुसार, सरकार जिस तरह से कीमतों को थामे हुए है, उसे लंबे समय तक जारी रखना मुश्किल होगा. अगर अंतरराष्ट्रीय कीमतों का बोझ जल्द ही उपभोक्ताओं पर नहीं डाला गया, तो इसका सीधा असर देश के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) पर पड़ेगा, जो सरकार के बजट गणित को बिगाड़ सकता है.
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राणेन बनर्जी का मानना है कि बढ़ते तेल बिल और स्थिर घरेलू कीमतों के बीच सरकार के पास चुनने के लिए केवल दो ही रास्ते बचेंगे और दोनों ही अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतीपूर्ण हैं:
राजकोषीय घाटे को बढ़ने देना: सरकार अपने तय किए गए बजट घाटे के लक्ष्य (Budgeted Fiscal Deficit) को पार कर जाए और ज्यादा कर्ज लेकर खर्च चलाए. इससे मुद्रास्फीति (Inflation) बढ़ने और रुपये पर दबाव आने का खतरा रहता है.
कैपेक्स (Capex) में कटौती: सरकार उन पैसों की भरपाई के लिए अपने 'कैपिटल एक्सपेंडिचर' यानी बुनियादी ढांचे (सड़क, रेलवे, इंफ्रास्ट्रक्चर) पर होने वाले खर्च में कटौती कर दे. यह विकास की गति को धीमा कर सकता है.
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तेल की कीमतें अकेले मुसीबत नहीं ला रही हैं. बनर्जी ने नोट किया कि कच्चे तेल के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उर्वरकों (Fertilisers) की कीमतें भी बढ़ रही हैं. इससे सरकार पर खाद सब्सिडी (Subsidy) का बोझ बढ़ेगा, जिससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा.
इसके अलावा, महंगा तेल आयात करने की वजह से देश का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) बढ़ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया (Rupee) लगातार दबाव में है. तेल विपणन कंपनियां (OMCs) भी इस समय भारी दबाव में हैं क्योंकि वे महंगे दाम पर तेल खरीद रही हैं लेकिन उसे पुराने रेट पर ही बेच रही हैं.
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बनर्जी का कहना है कि अगर पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध जल्द ही समाप्त हो जाता है, तो भी व्यापार और सप्लाई चेन को सामान्य होने में कम से कम 3 से 4 महीने का समय लगेगा. हालांकि, युद्ध खत्म होने के बावजूद तेल की कीमतें तुरंत नीचे नहीं आएंगी और काफी समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं. इसका मतलब है कि आने वाले समय में महंगाई का दबाव बना रहेगा और सरकार को जल्द ही कीमतों में बढ़ोतरी या बजट में कटौती जैसे कड़े फैसले लेने होंगे.
सरकार वर्तमान में जनता को महंगाई से बचाने की कोशिश कर रही है, लेकिन वैश्विक बाजार की हकीकत इसे एक खतरनाक खेल बना रही है. अगर $110 प्रति बैरल वाला कच्चा तेल इसी स्तर पर बना रहता है, तो बजट को संतुलित रखना लगभग नामुमकिन होगा. अब देखना यह है कि सरकार विकास (Capex) की बलि देती है या फिर पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाकर महंगाई का कड़वा घूंट जनता को पिलाती है.
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