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एनजीओ (NGO) और सामाजिक संस्थाओं के लिए एक बड़ी खबर आ रही है. सरकार विदेशी चंदे से चलने वाली संस्थाओं के लिए नियमों को 'रेगुलेटरी' (नियामक) से बदलकर 'कंट्रोल-ओरिएंटेड' (नियंत्रण-आधारित) बनाने जा रही है. ज़ी बिजनेस की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, कल लोकसभा में FCRA संशोधन बिल पेश किया जा सकता है.
इसका सीधा मतलब यह है कि अब विदेशी पैसे का हिसाब-किताब केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उस पैसे से बनाई गई हर संपत्ति पर सरकार की सीधी नजर होगी. आइए, ज़ी बिजनेस की इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में जानते हैं कि इस बिल में क्या-क्या खास है.
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सरकार एक 'नामित अथॉरिटी' (Designated Authority) बनाने जा रही है जो विदेशी धन और उससे बनी संपत्तियों का प्रबंधन करेगी.
संपत्ति का ट्रांसफर: अगर किसी एनजीओ का रजिस्ट्रेशन रद्द होता है, नवीनीकरण (Renewal) नहीं होता या वह खुद सरेंडर करती है, तो उसकी सारी संपत्तियां इस सरकारी अथॉरिटी को ट्रांसफर कर दी जाएंगी.
बिक्री पर रोक: विदेशी फंड से खरीदी गई कोई भी संपत्ति सरकार की इजाजत के बिना बेची नहीं जा सकेगी.
सरकारी खजाना: सरकार इन जब्त संपत्तियों को दूसरी एजेंसियों को दे सकती है या इन्हें बेचकर मिलने वाली रकम 'भारत की समेकित निधि' (Consolidated Fund of India) में जमा कर सकती है.
स्वतः समाप्ति: अगर समय पर रिन्यूअल नहीं कराया गया या आवेदन खारिज हो गया, तो एनजीओ का रजिस्ट्रेशन अपने आप खत्म हो जाएगा.
लेनदेन पर पाबंदी: सस्पेंशन के दौरान संस्था अपनी संपत्तियों से जुड़ा कोई भी लेन-देन (खरीद-बिक्री) बिना सरकारी अनुमति के नहीं कर पाएगी.
उपयोग की सीमा: विदेशी धन को एक निर्धारित समय सीमा के भीतर खर्च करना अनिवार्य होगा. अगर आप पैसा दबाकर बैठे हैं, तो पहले सरकार से मंजूरी लेनी होगी.
सरकार अब संस्था के साथ-साथ उसके पीछे बैठे लोगों को भी जवाबदेह बनाएगी.
व्यक्तिगत जिम्मेदारी: एनजीओ में किसी भी तरह की गड़बड़ी होने पर उसके प्रमुख पदाधिकारियों (जैसे प्रेसिडेंट या सेक्रेटरी) को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार माना जाएगा.
सजा में राहत: एक दिलचस्प बदलाव यह है कि अधिकतम सजा को 5 साल से घटाकर 1 साल करने का प्रस्ताव है.
जांच का कवच: विदेशी पैसा लेने वाले एनजीओ के खिलाफ केंद्र सरकार की अनुमति के बिना कोई भी एजेंसी जांच शुरू नहीं कर सकेगी.
यह संशोधन संकेत देता है कि सरकार विदेशी फंडिंग को लेकर बेहद गंभीर है. अब तक सरकार केवल रिपोर्ट मांगती थी, लेकिन अब सरकार 'संपत्तियों की मालिक' बनने की शक्ति अपने हाथ में ले रही है. इससे उन संस्थाओं पर नकेल कसी जाएगी जो विदेशी चंदे का इस्तेमाल राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों या तय मकसद से हटकर संपत्तियां बनाने में करती थीं.
एनजीओ सेक्टर के लिए यह 'करो या मरो' वाली स्थिति है. अब केवल समाज सेवा का मुखौटा पहनकर विदेशी चंदा लेना आसान नहीं होगा. अगर बिल पास होता है, तो हर एनजीओ को अपनी एक-एक इंच जमीन और एक-एक पैसे का हिसाब सरकार की नई अथॉरिटी को देना होगा.
1- क्या यह कानून सभी एनजीओ पर लागू होगा?
नहीं, यह केवल उन्हीं एनजीओ पर लागू होगा जो विदेश से चंदा (Foreign Contribution) लेते हैं और जिनके पास FCRA लाइसेंस है.
2- क्या सरकार एनजीओ की जमीन बेच सकती है?
हां, अगर एनजीओ का रजिस्ट्रेशन रद्द होता है, तो नई अथॉरिटी के पास उस संपत्ति को बेचकर पैसा सरकारी खजाने में डालने का अधिकार होगा.
3- Consolidated Fund of India क्या है?
यह सरकार का मुख्य खाता है जहां सभी टैक्स और अन्य प्राप्तियां जमा होती हैं. देश के सारे खर्चे इसी फंड से किए जाते हैं.
4- सजा कम क्यों की गई है?
सजा कम करना 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' का हिस्सा हो सकता है, ताकि छोटी तकनीकी गलतियों के लिए पदाधिकारियों को लंबे समय तक जेल न जाना पड़े, लेकिन वित्तीय नियंत्रण को और कड़ा कर दिया गया है.
5- क्या अब विदेशी चंदा लेना मुश्किल हो जाएगा?
चंदा लेना मुश्किल नहीं होगा, लेकिन उसे खर्च करना और उससे जुड़ी संपत्तियों का हिसाब रखना अब बहुत ज्यादा जटिल और पारदर्शी हो जाएगा.
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