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देश में एथेनॉल उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है, लेकिन खपत उतनी तेजी से नहीं बढ़ पा रही है. (प्रतीकात्मक फोटो: AI)
Ethanol Production: इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन (ISMA) ने बिजली मंत्रालय (Power Ministry) को एक पत्र लिखकर CAFÉ-3 (Corporate Average Fuel Efficiency) के आगामी ड्राफ्ट में बदलाव की मांग की है. ISMA का कहना है कि देश में एथेनॉल का उत्पादन (Ethanol Production) तो तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन उसकी खपत के रास्ते सीमित हो रहे हैं. इस समस्या का एकमात्र समाधान फ्लेक्स फ्यूल व्हीकल्स (FFV) को बढ़ावा देना है.
ज़ी बिजनेस के संवाददाता अंबरीश पांडेय के मुताबिक, ISMA ने अपनी चिट्ठी में साफ किया है कि वर्तमान में एथेनॉल का सरप्लस स्टॉक जमा हो रहा है. अगर बाजार में फ्लेक्स फ्यूल व्हीकल (FFV) नहीं उतारी गईं, तो यह सरप्लस स्टॉक एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के लिए मुसीबत बन सकता है.
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ISMA के साथ-साथ ऑटोमोबाइल संस्था SIAM ने भी मांग की है कि FFV, FFV-SHEV (हाइब्रिड) और FFV-PHEV (प्लग-इन हाइब्रिड) को जल्द से जल्द लॉन्च किया जाए.
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VDF में कटौती: नए ड्राफ्ट में FFV का वॉल्यूम डेरोगाटिन फैक्टर (VDF) 1.5 से घटाकर 1.1 कर दिया गया है. ISMA चाहता है कि इसे पुराना (1.5 और 2.5) ही रखा जाए.
अनदेखी: FFV-PHEV और FFV-REEV जैसी एडवांस तकनीकों को नए ड्राफ्ट में जगह ही नहीं दी गई है.
कार्बन न्यूट्रालिटी: एसोसिएशन की मांग है कि पुराना कार्बन न्यूट्रालिटी फैक्टर (22.3%) बरकरार रहे ताकि कंपनियों को एथेनॉल गाड़ियां बनाने का प्रोत्साहन मिले.
FFV-PHEV को जगह मिले: इन गाड़ियों के लिए VDF 3 और CNF 22.3% तय किया जाए.
जल्द नोटिफिकेशन: CAFÉ-3 नियमों को बिना देरी किए जल्द से जल्द लागू किया जाए.
अपील: यह चिट्ठी सिर्फ पावर मिनिस्ट्री ही नहीं, बल्कि PMO, फूड सेक्रेटरी और पेट्रोलियम मिनिस्ट्री को भी भेजी गई है ताकि नीतिगत स्तर पर तालमेल बैठ सके.
CAFÉ: यह नियम ऑटो कंपनियों को अपनी सभी गाड़ियों का औसत ईंधन खपत और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए मजबूर करता है.
VDF: यह एक तरह का 'वेटेज' है. अगर सरकार इसे ज्यादा रखती है, तो कंपनियों को एथेनॉल गाड़ियां बेचने पर ज्यादा क्रेडिट मिलता है, जिससे वे भविष्य में डीजल-पेट्रोल गाड़ियों पर लगने वाले जुर्माने से बच सकती हैं.
किसानों के लिए: अगर FFV गाड़ियां सड़कों पर आती हैं, तो एथेनॉल की मांग बढ़ेगी. इससे गन्ना किसानों और मक्का किसानों को उनकी फसल का समय पर और बेहतर दाम मिल सकेगा.
ऑटो सेक्टर: अगर सरकार ISMA की मांग मान लेती है, तो टोयोटा, मारुति और टाटा जैसी कंपनियां बाजार में अपनी 'फ्लेक्स फ्यूल' गाड़ियां लाने की प्रक्रिया को तेज करेंगी.
पर्यावरण: 100% एथेनॉल पर चलने वाली गाड़ियां कार्बन उत्सर्जन को काफी कम कर देंगी, जो भारत के नेट-जीरो लक्ष्य के लिए जरूरी है.
आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1. फ्लेक्स फ्यूल व्हीकल (FFV) क्या है?
ये ऐसी गाड़ियां हैं जो पेट्रोल के साथ-साथ किसी भी मात्रा में एथेनॉल के मिश्रण पर चल सकती हैं.
Q2. एथेनॉल की खपत क्यों रुकी हुई है?
फिलहाल गाड़ियां केवल 20% ब्लेंडिंग (E20) के लिए ही तैयार हैं.
Q3. CAFÉ-3 क्या है?
यह सरकार के फ्यूल एफिशिएंसी और उत्सर्जन से जुड़े नियमों का नया चरण है.
Q4. FFV क्यों जरूरी हैं?
ये एथेनॉल खपत बढ़ाते हैं और तेल आयात पर निर्भरता घटाते हैं.
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