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रक्षा मंत्रालय (MoD) ने हाल ही में रूस के साथ ₹2182 करोड़ ($236 मिलियन) का एक बड़ा समझौता किया है. इस समझौते के तहत हमारी नौसेना के युद्धपोतों के लिए रूस से वर्टिकल लॉन्च श्तिल (VL-Shtil) मिसाइलें खरीदी जाएंगी.
हैरानी की बात यह है कि हमारे पास पहले से ही इजरायल के साथ मिलकर बनाई गई बेहतरीन Barak-8 (MR-SAM) मिसाइल मौजूद है, जो तकनीकी रूप से काफी एडवांस मानी जाती है. तो फिर नौसेना ने रूसी मिसाइलों पर इतना पैसा क्यों खर्च किया? चलिए, इस खबर की एक-एक परत खोलते हैं और इसे आसान भाषा में समझते हैं.
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भारतीय रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में कुल ₹5,083 करोड़ के दो बड़े सौदों पर साइन किए हैं.
इस ₹2,182 करोड़ के सौदे में केवल मिसाइलें ही नहीं, बल्कि उन्हें युद्धपोत पर तैनात करने के लिए जरूरी 'मिसाइल होल्डिंग फ्रेम्स' भी शामिल हैं. इसका उद्देश्य भारतीय नौसेना के फ्रंटलाइन युद्धपोतों (Warships) की सुरक्षा को कई गुना बढ़ाना है.
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अगर आसान भाषा में कहें, तो 'श्तिल-1' एक ऐसा सुरक्षा कवच है जो समुद्र में हमारे जहाजों को दुश्मन के हवाई हमलों से बचाता है. इसे रूस की मशहूर कंपनी अल्माज-आंते (Almaz-Antey) ने बनाया है.
मिसाइल का नाम: इसमें 9M317ME मिसाइल का इस्तेमाल होता है. यह जमीन पर मार करने वाले मशहूर Buk-M2 एयर डिफेंस सिस्टम का ही नौसैनिक वर्जन (Naval Variant) है.
बनावट: यह एक सिंगल-स्टेज सॉलिड-फ्यूल मिसाइल है. इसके पंख (Fins) मुड़ सकते हैं, जिससे यह युद्धपोत के छोटे से डिब्बे (Canister) में भी फिट हो जाती है.
मिसाइलों की दुनिया में दो तरह की तकनीकें सबसे ज्यादा चलती हैं- एक होती है ARH (Active Radar Homing) जो 'दागो और भूल जाओ' (Fire and Forget) के सिद्धांत पर काम करती है. वहीं दूसरी होती है SARH (Semi-Active Radar Homing). श्तिल-1 में SARH तकनीक का इस्तेमाल होता है.
अब आप सोचेंगे कि 'दागो और भूल जाओ' वाली तकनीक बेहतर होनी चाहिए, तो फिर भारत ने पुरानी तकनीक क्यों चुनी? इसके पीछे गहरी इंजीनियरिंग और आर्थिक कारण हैं:
कम लागत: एक युद्धपोत को अपनी सुरक्षा के लिए 24 से 36 मिसाइलें ले जानी पड़ती हैं. ARH मिसाइलों के अंदर अपना खुद का छोटा रडार लगा होता है, जो उन्हें बहुत महंगा बना देता है. इसके मुकाबले SARH मिसाइलों का सीकर (Seeker) काफी सस्ता और सरल होता है. थोक में खरीदने पर इससे करोड़ों रुपये की बचत होती है.
अधिक ताकत: SARH मिसाइल खुद के रडार पर निर्भर नहीं होती. जहाज पर लगा हुआ शक्तिशाली रडार (जैसे MR-90 Orekh) दुश्मन के टारगेट पर रोशनी (Illumination) डालता है और मिसाइल उस रोशनी का पीछा करती है. क्योंकि जहाज का रडार मिसाइल के छोटे रडार से कई गुना ज्यादा ताकतवर होता है, इसलिए दुश्मन का पता लगाना और उसे ट्रैक करना आसान होता है.
जैमिंग का डर नहीं: दुश्मन के विमान अक्सर मिसाइलों को गुमराह करने के लिए जैमर्स का इस्तेमाल करते हैं. क्योंकि SARH मिसाइल का सीकर 'पैसिव' होता है (यानी वह सिर्फ सुनता है, कुछ भेजता नहीं), इसलिए उसे सीधे जैम करना मुश्किल है. दुश्मन को जहाज के उस विशालकाय रडार को जैम करना पड़ेगा, जो लगभग नामुमकिन होता है.
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यह मिसाइल सिस्टम समुद्र में किसी 'अभेद्य दीवार' की तरह काम करता है. इसकी कुछ प्रमुख खूबियां इस प्रकार हैं:
फायरिंग की रफ्तार: यह सिस्टम हर 2 से 3 सेकंड में एक मिसाइल दाग सकता है. यानी अगर दुश्मन एक साथ कई मिसाइलों से हमला (Saturation Attack) करे, तो भी यह जवाब देने के लिए तैयार रहता है.
रेंज (दूरी): यह 3.5 किलोमीटर से लेकर 50 किलोमीटर की दूरी तक दुश्मन को मार गिराने की ताकत रखता है.
ऊंचाई: यह समुद्र की सतह से मात्र 5 मीटर ऊपर उड़ती हुई मिसाइलों (Sea-skimmers) से लेकर 15 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ रहे विमानों तक को तबाह कर सकता है.
मल्टी-टार्गेटिंग: एक बार में यह सिस्टम 12 टारगेट को ट्रैक कर उन पर हमला कर सकता है.
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पहले हमारे जहाजों पर पुरानी 'उरगान' (Uragan) प्रणाली होती थी, जिसमें एक रेल लॉन्चर होता था जो घूमकर मिसाइल छोड़ता था. नई श्तिल-1 में कई खासियतें हैं-
1. यह वर्टिकल लॉन्च सिस्टम (VLS) है. यानी मिसाइल सीधे ऊपर की तरफ निकलती है.
2. इसमें लॉन्चर को दुश्मन की तरफ घुमाने की जरूरत नहीं होती. यह 360 डिग्री यानी किसी भी दिशा से आ रहे खतरे को सेकंडों में भांप लेती है.
3. यह जहाज के डेक के नीचे फिट होती है, जिससे जहाज का वजन और बनावट संतुलित रहते हैं.
भारतीय नौसेना अपने कई पुराने और नए जहाजों को इस सिस्टम से लैस कर रही है:
तलवार क्लास फ्रिगेट (Talwar-class): INS तलवार, त्रिशूल, तबर, तेग, तरकश और त्रिकंड. इन पर पहले पुराने रेल लॉन्चर थे, अब उन्हें श्तिल-1 (VLS) से बदला जा रहा है.
दिल्ली क्लास डिस्ट्रॉयर (Delhi-class): INS दिल्ली, मैसूर और मुंबई. इनके मिड-लाइफ रिफिट (Mid-life refit) के दौरान श्तिल-1 लगाया जाएगा और साथ ही नए Fregat-M2EM रडार भी दिए जाएंगे.
शिवालिक क्लास फ्रिगेट (Shivalik-class): INS शिवालिक, सतपुड़ा और सह्याद्रि. इन अत्याधुनिक जहाजों को भी अब श्तिल-1 से और ज्यादा सुरक्षित बनाया जा रहा है.
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अब आते हैं उस बड़े सवाल पर- इन दोनों में से कौन बेहतर है? सच तो यह है कि ये दोनों एक-दूसरे के दुश्मन नहीं, बल्कि 'साथी' हैं.
| फीचर | Shtil-1 (रूस) | Barak-8 / MR-SAM (इजरायल-भारत) |
|---|---|---|
| तकनीक | SARH (सेमी-एक्टिव) | ARH (एक्टिव – फायर एंड फॉरगेट) |
| रेंज | 50 किलोमीटर | 70+ किलोमीटर |
| इंजन | सिंगल-स्टेज, सिंगल-पल्स | ड्यूल-पल्स (ज्यादा फुर्तीली) |
| कीमत | काफी कम (सस्ती) | बहुत ज्यादा (महंगी) |
| मुख्य काम | फ्रिगेट्स और छोटे जहाजों की सुरक्षा | बड़े और महत्वपूर्ण युद्धपोतों की सुरक्षा |
| जैमिंग रेजिस्टेंस | बहुत ज्यादा (जहाज के रडार की वजह से) | अच्छी, लेकिन जैमर्स के प्रति संवेदनशील |
सरल शब्दों में तुलना: Barak-8 एक 'प्रीमियम स्मार्टफोन' की तरह है, जिसमें हर तरह के एडवांस फीचर्स हैं, लेकिन वह बहुत महंगा है. वहीं, Shtil-1 एक 'भरोसेमंद वर्कहॉर्स' की तरह है, जो सस्ता है, टिकाऊ है और अपना काम बखूबी जानता है.
भारत ने यह फैसला बहुत सोच-समझकर लिया है:
लेयर्ड डिफेंस (Layered Defence): समुद्र में सुरक्षा की कई परतें होती हैं. अगर कोई मिसाइल Barak-8 (70 किमी) से बच निकलती है, तो उसे Shtil-1 (50 किमी) से मार गिराया जा सकता है.
सप्लाई चेन: रूस के साथ हमारे दशकों पुराने रक्षा संबंध हैं. हमारे कई जहाजों का ढांचा रूसी है, इसलिए उनमें रूसी मिसाइल सिस्टम फिट करना आसान और किफायती होता है.
लागत का संतुलन: हर छोटे जहाज पर अरबों रुपये की इजरायली मिसाइलें लगाना आर्थिक रूप से सही नहीं है. Shtil-1 कम पैसे में वह सुरक्षा प्रदान कर देता है, जिसकी एक फ्रिगेट को जरूरत होती है.
विश्वसनीयता: 'बक' (Buk) परिवार की यह मिसाइल दुनिया भर के युद्धों में खुद को साबित कर चुकी है.
भारतीय नौसेना का यह कदम अपनी ताकत को संतुलित करने का एक शानदार उदाहरण है. एक तरफ हमारे पास इजरायल की हाई-टेक 'फायर एंड फॉरगेट' तकनीक है, तो दूसरी तरफ रूस की 'मजबूत और सस्ती' रडार होमिंग तकनीक. Shtil-1 मिसाइलें हमारे उन युद्धपोतों को नई जिंदगी देंगी जो थोड़े पुराने हो रहे थे, और नए जहाजों को एक ऐसा सुरक्षा कवच देंगी जिसे भेद पाना किसी भी दुश्मन के लिए नामुमकिन होगा. ₹2,182 करोड़ का यह निवेश भारत की समुद्री सीमाओं को 'अभेद्य' बनाने की दिशा में एक बड़ा और जरूरी कदम है.
1- क्या Shtil-1 मिसाइल Barak-8 से पुरानी है?
तकनीकी रूप से SARH एक पुरानी तकनीक है, लेकिन Shtil-1 इसका सबसे आधुनिक वर्जन है जो आज के दौर के खतरों से लड़ने में सक्षम है.
2- भारत इजरायल के बजाय रूस से मिसाइल क्यों खरीद रहा है?
भारत दोनों से खरीद रहा है. रूस की मिसाइलें सस्ती और पुराने जहाजों के लिए ज्यादा फिट हैं, जबकि इजरायल की मिसाइलें बड़े और नए मिशनों के लिए हैं.
3- वर्टिकल लॉन्च (VLS) का क्या फायदा है?
VLS से मिसाइल किसी भी दिशा में तुरंत दागी जा सकती है और लॉन्चर को घुमाने में लगने वाला समय बच जाता है.
4- Shtil-1 कितनी दूरी तक मार कर सकती है?
यह 3.5 किलोमीटर से लेकर 50 किलोमीटर की दूरी तक के लक्ष्यों को निशाना बना सकती है.
5- क्या यह मिसाइल ड्रोन को भी गिरा सकती है?
हां, यह सुपरसोनिक विमानों, हेलीकॉप्टरों, मिसाइलों और यहां तक कि छोटे ड्रोन्स को भी मार गिराने में सक्षम है.
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