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अदालत ने साफ कहा कि यह कार्रवाई सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं बल्कि सुनियोजित साजिश थी. (फाइल फोटो)
दिल्ली से आई एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर ने प्रशासनिक और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. राजधानी की Tis Hazari Courts ने एक ऐतिहासिक फैसले में केंद्रीय जांच एजेंसी Central Bureau of Investigation (CBI) के मौजूदा जॉइंट डायरेक्टर रामनीश गीर और दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी वी.के. पांडेय को दोषी करार दिया है.
यह मामला कोई हालिया नहीं, बल्कि 25 साल पुराना (साल 2000) है. लेकिन, फैसले ने यह साफ कर दिया है कि कानून के सामने कोई भी पद बड़ा नहीं होता.
तिस हजारी कोर्ट के जज शशांक नंदन भट्ट की अदालत ने दोनों अधिकारियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की इन धाराओं में दोषी पाया:
अदालत ने साफ कहा कि यह कार्रवाई सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं बल्कि सुनियोजित साजिश थी.
यह केस जुड़ा है 19 अक्टूबर 2000 की एक सुबह-सुबह की विवादित रेड से.
इस रेड का निशाना थे अशोक कुमार अग्रवाल, जो उस समय IRS (1985 बैच) अधिकारी थे और प्रवर्तन निदेशालय (ED) में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर तैनात थे.
खास बात:
बाद में उन्हें CBI के दोनों मामलों में क्लीन चिट मिल गई थी यानी जिस आधार पर कार्रवाई हुई, वह टिक नहीं पाई.
अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक, 19 अक्टूबर 2000 की सुबह करीब 5 बजे:
CBI टीम ने पहले सिक्योरिटी गार्ड से मारपीट की फिर दीवार फांदकर घर में घुसी मुख्य दरवाजा तोड़ा गया. परिवार के सदस्यों को एक कमरे में बंद कर दिया गया. अधिकारी को अंडरगारमेंट्स में ही बेडरूम से घसीटकर बाहर लाया गया. उनके साथ शारीरिक हिंसा की गई और बाद में उन्हें अनजान जगह ले जाया गया.
कोर्ट ने कहा कि ये सभी आरोप “बियॉन्ड रीजनेबल डाउट” साबित हुए हैं.
1. गिरफ्तारी थी ‘मालाफाइड’
कोर्ट ने माना कि यह कार्रवाई जानबूझकर की गई थी, ताकि एक अहम आदेश को निष्प्रभावी किया जा सके.
यह आदेश था Central Administrative Tribunal (CAT) का, जिसने 28 सितंबर 2000 को अधिकारी के निलंबन की समीक्षा करने को कहा था.
यानी रेड का मकसद कानूनी प्रक्रिया को रोकना था.
2. पद का दुरुपयोग (Abuse of Power)
अदालत ने साफ कहा:
मतलब- सरकारी पद का सहारा लेकर बच नहीं सकते.
3. जबरन घुसने का सबूत
सबसे अहम बात:
4. कस्टोडियल हिंसा साबित
इन सबने यह साबित किया कि पीड़ित के साथ मारपीट हुई थी.
5. साजिश का खुलासा
कोर्ट ने पाया कि:
जबकि उन्हें सतर्कता (vigilance) के निर्देशों का पालन करना था.
अशोक कुमार अग्रवाल ने:
अदालत का मानना है कि इन शिकायतों के जवाब देने की बजाय उन्हें टारगेट किया गया.
इतने लंबे समय बाद फैसले पर भी कोर्ट ने टिप्पणी की:
इसलिए कोर्ट ने देरी को जायज ठहराया.
यह तय करेगा:
यह फैसला सिर्फ दो अधिकारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए एक संदेश है. कानून से ऊपर कोई नहीं- चाहे पद कितना भी बड़ा क्यों न हो. कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा “पूरी कार्रवाई कानून का उल्लंघन थी और सिर्फ CAT के आदेश को विफल करने के लिए की गई थी.”
25 साल पुराने इस केस ने दिखा दिया कि न्याय भले देर से मिले, लेकिन मिलता जरूर है और सत्ता का दुरुपयोग अंततः कानून की पकड़ में आता है. CBI जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के एक वरिष्ठ अधिकारी का दोषी ठहराया जाना न सिर्फ एक कानूनी घटना है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही की मिसाल भी है.