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Budget Tea-20: दिसंबर खत्म होते-होते बजट की तैयारी पहुंचती है अपने चरम पर. जी हां, देश का बजट (Union Budget). फरवरी में पेश में होगा. वित्त मंत्री अपने बही-खाते को तैयार करने में जुट चुकी हैं. हर कोई इस बात पर नजरें गड़ाए बैठा है कि इस बार किसकी उम्मीदों को पंख लगेंगे. हम ऐसी ही कुछ उम्मीदें आपके सामने लेकर आएं हैं, जिनका बजट से सीधे ताल्लुख रहता है. हमारी प्यारी पब्लिक. ये वो पब्लिक है, जिनकी ओपनियन यूं तो वित्त मंत्री (Finance Minister) तक नहीं पहुंचती. लेकिन, सर्दियों की सुबह में चाय की चुस्की पर दिल के गुबार उबाल मारते हैं.
ज़ी बिज़नेस की खास सीरीज Budget Tea-20 में आपका स्वागत है. आज लेकर चलेंगे... उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के पास बसे गांव बुढ़ाना की चाय की टपरी पर... जहां चकल्लस चल रही है आने वाले बजट पर. ये जो बातचीत है आपको हंसाने के साथ-साथ सोचने पर मजबूर जरूर करेगी.
लालू: मजाकिया, हर चर्चा में ठहाका लगाने वाला और अपनी ही दुनिया में मस्त.
पप्पू: चाय वाला और बड़ा सपना देखने वाला, लेकिन हर बार अपने ही तर्कों में उलझ जाता है.
गुप्ता जी: गांव के सबसे अनुभवी किराना दुकानदार, जिनकी बातें सीधे अर्थव्यवस्था और बजट पर केंद्रित रहती हैं.
हकीम चच्चा: उम्रदराज और विद्वान, गांव के मसलों के स्थायी समाधान सुझाने वाले.
गुप्ता जी ने चाय का पहला घूंट लेते हुए कहा, "अरे भाई, इस बार बजट में देखना, पेट्रोल के दाम फिर से बढ़ जाएंगे. सरकार को तो बस टैक्स वसूलना आता है."
लालू ने तुरंत जवाब दिया, "गुप्ता अंकल, महंगाई के साथ-साथ हमारी जेब में भी पईसा आना चाहिए. लेकिन लगता है कि पाई-पाई का हिसाब रखना पड़ेगा."
पप्पू ने एक पकौड़ी मुंह में डालते हुए कहा, "अरे यार, तुम लोग चिंता क्यों करते हो? अगर महंगाई बढ़ेगी तो हम भी चाय और पकौड़ियों के दाम बढ़ा देंगे. अपना तो मुनाफा ही मुनाफा है."
हकीम चच्चा मुस्कराते हुए बोले, "देखो भई, महंगाई तो बढ़ेगी ही, लेकिन सरकार को गंभीर मामले भी समझने चाहिए. किसानों के लिए कुछ करे.. हस्पताल में इलाज के लिए कुछ करे.. इन्हें कुछो नहीं करना है....
लालू: "सुनो पप्पू, ये बजट वाली बात एकदम सीरियस है. हमारी मंहगाई तो ऐसे बढ़ रही है जैसे गुप्ता अंकल की दुकान पर बिस्किट के दाम. अब तो चाय के साथ बिस्किट लेना भी सोचने वाली बात हो गई."
पप्पू: "अरे लालू भैया, ये बजट वाली बातें तो बस टीवी वाले करते हैं. असली बजट तो हकीम चच्चा के दवाखाने में बनता है, जब वो 5 रुपए की दवा के 50 ले लेते हैं."
हकीम चच्चा: (गुस्से में) "अरे पप्पू, तू मुझे क्यों ताना मार रहा है? बजट तो सरकार का खेल है.
पप्पू: जे बात तो सही है चच्चा... अब यहीं देख लो, मेरी खुद की दुकान पर मंहगाई का असर है. अदरक वाली चाय 2 रुपए महंगी हो गई."
गुप्ता जी: "तुम अदरक की बात कर रहे हो. मेरे यहां तो आटे का रेट ही रोज ऊपर-नीचे होता है. अब ये वित्त मंत्री जी हमारे लिए कुछ करेंगे कि नहीं? वैसे चाय-समोसा बेचने वालों का भी कोई बजट बनेगा क्या?"
लालू: "सुन रहे हो चच्चा? पप्पू कह रहा है महंगाई बढ़ रही है... अब ये बताओ, ऐसा ही चलता रहेगा या फिर कुछ होगा?"
हकीम चच्चा: "देखो भैया, मैं तो यही कहूंगा कि महंगाई बिल्कुल डायन ही है... सब कहे हैं महंगाई पर लगाम लगावेंगे.. पर सच्चाई तो ये है सब बातें चाय की भट्टी के धुएं की तरह उड़ जाती हैं और महंगाई वाली ये डायन तो मरी दो घर भी न छोड़े है."
पप्पू: (हंसते हुए) "और गरीबों की कौन सुनता है? हम जैसे लोग तो बस चाय पीकर बातें बना सकते हैं. बजट आएगा, टीवी वाले चीखेंगे, और टपरी पर आकर लालू भैया हमसे बहस करेंगे."
गुप्ता जी: "तो पप्पू, तू क्या चाहता है इस बार के बजट में?"
पप्पू: "मैं तो यही चाहता हूं कि मेरा चाय-पत्ती का काम चलता रहे. अदरक थोड़ा सस्ता कर दें ताकि तुम चाय की तरह मुझ पर ना खौला करें. बाकी पेट्रोल भी सस्ता कर दे तो पास के गांव के दो चक्कर और लगा लेंगे.
लालू: "सपने देखता है लड़के. चाय सस्ती हो जाए, ये तो गुप्ता अंकल की दुकान मुफ्त हो जाने जैसा है."
हकीम चच्चा: "अरे लालू, ऐसे मजाक मत कर. अब ये बता, तू भी कुछ चाहवे है क्या सरकार से?"
लालू: "चच्चा, अम्मा कहती हैं सब्जी मंडी में भिंडी, टमाटर, लहसून अगर सस्ता है तो सब बढ़िया, पर ये सस्ता दिखे कहां हैं...
गुप्ता जी: "बिलकुल सही कहा, लालू. यही हाल अपनी दुकान का भी है, ग्राहक हम पर लाल होवे है... कमबख्त हम क्या कर रहे हैं, जो करे है सरकार करे है.
पप्पू: "हां, और मैं तो नूं कहूं... पढ़ाई-लिखाई की ओर भी कुछ ध्यान देना पड़ेगा. बहन की स्कूल फीस पता कहां पहुंच रही. गरीब का बच्चा तो पढ़ने से रहा."
हकीम चच्चा: "अरे पप्पू, बात तो तेरी सही है. पर देखो, ये सब बातें होती रहेंगी. असली मुद्दा है कि बजट के बाद हमारे जैसे छोटे लोगों की जेब पर बोझ कम होना चाहिए."
लालू ने चुटकी लेते हुए कहा, "अगर वित्त मंत्री मेरी मानें, तो हर गांव में इंटरनेट फ्री करवा दें. हम भी ऑनलाइन कुछ-कुछ करेंगे और अमेरिका को टक्कर देंगे."
गुप्ता जी ने गंभीरता से कहा, "बेटा, ऐसी बातें टीवी पर अच्छी लगती हैं. असली दिक्कत ये है कि हमारी सुने कौन है. भई तेरी बात पहुंचे तो म्हारे जैसे दुकानदारों का भी कुछ भला करवा दियो.."
पप्पू ने जोश में आकर कहा, "और क्या!" और सब हंसने लगे...
लालू: "तो फिर चलो, जब बजट पेश होगा होगा, तब तक टपरी की चाय की चुस्की लेते रहो... और गॉसिप करते रहो."
हकीम चच्चा ने सभी की बातें सुनकर ठहाका लगाते हुए कहा, "देखो, सरकार चाहे जो करे, तुम अपने काम से मतलब रखो. मेहनत करो मेहनत. तभी कुछ भला होगा."
"ला भई पप्पू एक चाय और पिला... पिछली चाय का तो पता ही ना चला..." हकीम चच्चा ने बात को यहीं खत्म कर दिया..
चाय की भट्टी पर खौलते पानी के साथ, टपरी पर बहस भी खौल रही थी. उम्मीदों और आशंकाओं का ये सिलसिला बजट आने तक चलता रहेगा. देखना ये है कि वित्त मंत्री जी इस बार चाय की टपरी के इन कैरेक्टर्स की उम्मीदों पर कितना खरी उतरती हैं.