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बीते 200 वर्षों में वैश्विक वित्तीय परिदृश्य में एक नाटकीय बदलाव आया है. 19वीं सदी का निर्विवाद सम्राट- ब्रिटिश पाउंड (GBP) आज अपनी वैश्विक चमक खो चुका है, जबकि स्विट्जरलैंड का स्विस फ्रैंक (CHF) दुनिया का सबसे भरोसेमंद 'सेफ हेवन' बनकर उभरा है. चलिए समझते हैं कि कैसे सोने के भंडार, केंद्रीय बैंकों की नीति और युद्धों ने मुद्राओं की नियति को बदला है. साथ ही, यह भारत की स्थिति और रुपये की सुरक्षा पर भी प्रकाश डालती है.
1800 के दशक की शुरुआत में, ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग दुनिया की सबसे शक्तिशाली मुद्रा थी. उस समय ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य अस्त नहीं होता था और पाउंड को दुनिया की सबसे सुरक्षित संपत्ति माना जाता था. ऐतिहासिक डेटा के अनुसार, उस दौर में 1 ब्रिटिश पाउंड के बदले लगभग 26 स्विस फ्रैंक मिलते थे. पतन का कारण-
दो विश्व युद्धों ने ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया. युद्ध की लागत ने देश को कर्ज में डुबो दिया, जिससे पाउंड की क्रय शक्ति में लगातार गिरावट आई.
ब्रेटन वुड्स समझौते के बाद, वैश्विक व्यापार में डॉलर ने पाउंड की जगह ले ली.
आज 2026 में, 1 पाउंड का मूल्य लगभग 1.03-1.04 स्विस फ्रैंक के आसपास सिमट गया है. यह 200 वर्षों में आई एक ऐतिहासिक गिरावट है जो एक सुपरपावर के आर्थिक पतन की कहानी कहती है.
अर्थशास्त्र का एक बुनियादी सिद्धांत है- जिस देश की मुद्रा के पीछे ठोस संपत्तियां (सोना) होती हैं, वह मुद्रा संकट में भी स्थिर रहती है.
स्विट्जरलैंड की मजबूती का रहस्य उनके 'गोल्ड पर कैपिटा' (प्रति व्यक्ति सोना) में है. स्विस नेशनल बैंक ने हमेशा अपनी मुद्रा को सोने के भंडार के साथ एक निश्चित अनुपात में बांधकर रखा है.
जब भी बाजार में अनिश्चितता होती है, तो निवेशक उन मुद्राओं को छोड़ देते हैं जो केवल कागजी वादों पर टिकी हैं और उन मुद्राओं की ओर भागते हैं जो सोने द्वारा समर्थित हैं.
जिस देश का गोल्ड रिजर्व कम होता है, वहां की करेंसी पर वैश्विक झटकों का असर अधिक गहरा होता है. इसका उदाहरण 1970 के दशक के बाद की मुद्रास्फीति में देखा जा सकता है.
इतिहास गवाह है कि युद्ध ने अर्थव्यवस्था को हमेशा पीछे धकेला है. 'फर्स्ट वर्ल्ड वॉर' (1914-1918) और 'सेकंड वर्ल्ड वॉर' (1939-1945) के दौरान और बाद में, वैश्विक स्तर पर मुद्राओं के अवमूल्यन (Devaluation) का सिलसिला चला.
युद्ध के दौरान, सरकारें हथियारों की खरीद और सेना के खर्च के लिए बड़ी मात्रा में नोट छापती हैं. इससे मुद्रा की आपूर्ति (Money Supply) बढ़ जाती है, जिससे मुद्रास्फीति आसमान छूने लगती है.
1929 की 'ग्रेट डिप्रेशन' हो या 2008 का वित्तीय संकट, हर बड़ी मंदी के बाद कमजोर अर्थव्यवस्था वाली मुद्राओं का मूल्य गिरना तय था. जिन देशों के पास अपना सोने का भंडार था, वे मंदी के प्रभाव को कम करने में सफल रहे.
दुनिया में कुछ ऐसी मुद्राएं हैं जिन्हें 'सेफ हेवन' कहा जाता है. इनमें स्विस फ्रैंक सबसे ऊपर है.
हालांकि डॉलर सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी है, लेकिन संकट के समय (जैसे ईरान-इजरायल तनाव, यूक्रेन युद्ध), निवेशक स्विस फ्रैंक को डॉलर से ज्यादा सुरक्षित मानते हैं.
स्विट्जरलैंड की तटस्थता. दुनिया चाहे किसी भी जंग में फंसी हो, स्विट्जरलैंड अपनी बैंकिंग गोपनीयता और तटस्थता के कारण सुरक्षित माना जाता है. यहाँ की करेंसी पर भरोसा दुनिया की राजनीतिक उथल-पुथल से प्रभावित नहीं होता.
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से बढ़ रहा है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) लगातार सोने की खरीदारी कर रहा है.
भारत के पास वर्तमान में लगभग 880 टन स्वर्ण भंडार है. हालांकि, यह बहुत बड़ा है, लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था का आकार और जनसंख्या देखते हुए, हमें अपनी करेंसी (रुपया) को और अधिक सुरक्षित बनाने के लिए गोल्ड रिजर्व बढ़ाने की आवश्यकता है.
क्या गोल्ड कम होना रुपये की कमजोरी का कारण है? सीधे तौर पर नहीं, लेकिन यह निश्चित रूप से एक कारक है. रुपये की अस्थिरता का एक बड़ा कारण हमारा व्यापार घाटा और वैश्विक डॉलर की मांग है. सोने का भंडार हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक विश्वसनीय बनाता है.
दुनिया के अधिकांश केंद्रीय बैंक अब फिर से सोने की ओर मुड़ रहे हैं. 2026 के आंकड़ों के अनुसार, चीन, भारत और तुर्की जैसे देश अपने रिजर्व में सोने का हिस्सा बढ़ा रहे हैं.
एक चार्ट में अगर हम 'गोल्ड एज शेयर ऑफ करेंसी इन सर्कुलेशन' देखें, तो पता चलता है कि जिन केंद्रीय बैंकों ने पिछले एक दशक में सोना जमा किया है, उनकी करेंसी के प्रति वैश्विक निवेशकों का विश्वास अधिक है.
आरबीआई ने सोने को एक 'रणनीतिक संपत्ति' के रूप में देखा है. यह न केवल रुपये को स्थिरता देता है, बल्कि डॉलर पर हमारी निर्भरता को कम करता है.
आज का समय भू-राजनीतिक (Geopolitical) दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है.
ईरान-इजरायल, यूक्रेन, और चीन-ताइवान तनाव ने निवेशकों के बीच डर पैदा कर दिया है. जब दुनिया सुरक्षित नहीं होती, तो लोग कागज की करेंसी से निकलकर सोना और स्विस फ्रैंक में निवेश करते हैं.
भविष्य उन देशों का है जो अपनी अर्थव्यवस्था को सोने और स्थिर नीतियों से जोड़कर रखेंगे. साम्राज्य का पतन केवल हथियारों से नहीं, बल्कि उस साम्राज्य की मुद्रा के गिरने से शुरू होता है- जैसा कि ब्रिटिश पाउंड के साथ हुआ.