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मार्च 2025 के आधार पर भारत की डेटा सेंटर कैपेसिटी 1352MW है. प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)
Data Center: सुबह-सुबह जब आपकी नींद खुलती है तो अपने दोस्तों को WhatsApp पर गुड मॉर्निंग मैसेज भेजना. मेट्रो में सफर करते हुए Instagram रील्स स्क्रॉल करना. ऑफिस के काम के लिए Google Drive पर फाइल सेव करना और रात को आराम से Netflix या YouTube पर अपनी पसंदीदा वेब सीरीज देखना. ये सबकुछ अब हमारी सामान्य जिंदगी हो गई है.
लेकिन, आपने कभी सोचा है कि आपके मोबाइल स्क्रीन पर एक क्लिक करते ही जो वीडियो, फोटो या मैसेज पलक झपकते ही सामने आ जाता है, वो हवा में तैरता हुआ कहां से आता है? आसमान में कोई ऐसा बादल (Cloud) नहीं है जहां ये सब स्टोर रहता है. आप जो भी डेटा जनरेट कर रहे हैं, वो जमीन पर बने कंक्रीट के बड़े-बड़े कमरों में चल रहे लाखों सुपर फास्ट कंप्यूटर्स और सर्वर्स में सुरक्षित रहता है. इसी को Deta Center कहते हैं.
Data Center हमारे डिजिटल लाइप की बैकबोन बन चुके हैं. जैसे बिना पेट्रोल के गाड़ी नहीं चल सकती, वैसे ही डेटा सेंटर के बिना आपका स्मार्टफोन, डिजिटल बैंकिंग, Zomato-Swiggy से खाना ऑर्डर करना और यहां तक कि पूरा इंटरनेट एक सेकंड में ठप हो सकता है. आइए बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि इंटरनेट और AI की इस दुनिया को चलाने वाला डेटा सेंटर क्या होता है और यह कैसे काम करता है.
कॉन्सेप्ट: डेटा सेंटर को इंटरनेट की दुनिया का महा तिजोरी कह सकते हैं. यह एक फिजिकल बिल्डिंग होती है जहां हजारों लाखों सर्वर्स, स्टोरेज डिवाइसेस, राउटर्स, फायरवॉल और मशीन को कूल रखने के लिए बड़े-बड़े कूलिंग सिस्टम लगे होते हैं.
काम कैसे करता है?: जब आप कोई डेटा (जैसे फोटो या वीडियो) अपलोड करते हैं, तो वो देश या विदेश के किसी डेटा सेंटर में जाकर सेव हो जाता है. जब कोई दूसरा उसे देखना चाहता है तो डेटा सेंटर से बिजली की रफ्तार से वो डेटा उसके फोन तक पहुंचता है.
बदलता दौर: पहले कंपनियां अपनी बिल्डिंग में छोटे सर्वर रूम रखती थीं. अब जमाना 'क्लाउड' का है, जहां कंपनियां खुद सर्वर न खरीदकर बड़े डेटा सेंटर्स (जैसे Amazon, Google या को-लोकेशन सेंटर्स) से स्पेस किराए पर लेती हैं.
24x7 कनेक्टिविटी: अगर डेटा सेंटर 1 सेकंड के लिए भी बंद हो जाए तो UPI पेमेंट फेल हो जाएंगे, शेयर मार्केट रुक जाएगा और Google काम करना बंद कर देगा.
Security: आपका पर्सनल डेटा, बैंक डिटेल्स और सरकारी डॉक्युमेंट्स (जैसे Aadhaar/PAN) को हैकर्स से बचाने के लिए इन सेंटर्स में सुपर सिक्योरिटी और फायरवॉल्स लगे होते हैं.
डेटा सेंटर का इतिहास 1940s दशक का है जब दुनिया का पहला बड़ा कंप्यूटर Mainframes बना था. ये कंप्यूटर इतने विशाल थे कि इन्हें रखने के लिए बहुत बड़े कमरे की जरूरत होती थी. 1945 का ENIAC कंप्यूटर जिसे रखने के लिए एक पूरा बड़ा कमरा चाहिए था. यही डेटा सेंटर की शुरुआत थी.
1960s-1970 का दशक
1980s: जब सर्वर आया
1990s: इंटरनेट Boom का दशक
2000s: क्लाउड कंप्यूटिंग का आया जमाना
2010s: मेगा और Hyperscale डेटा सेंटर
2020s (आज का दौर): AI से डेटा की सुनामी
डेटा सेंटर की क्षमता जमीन या बिल्डिंग के साइज से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह कितना बिजली इस्तेमाल कर सकता है. इसे मापने की मुख्य इकाई मेगावाट (MW) होती है. डेटा सेंटर कैपेसिटी का मतलब कितने सर्वर्स एक साथ बिना रुके चल सकते हैं. सर्वर्स को चलाने और उन्हें ठंडा रखने के लिए भारी बिजली चाहिए होती है, इसलिए पूरी कैपेसिटी को बिजली की खपत (Power Consumption) से ही नापा जाता है.
बिजली ही ईंधन है
कूलिंग सिस्टम ही जान है
100 MW डेटा सेंटर का मतलब एक ऐसे सेंटर से है जो 100 MW बिजली की खपत कर सकता है. मतलब, डेटा सेंटर पूरी कैपेसिटी से चलता है तो उसे पावर ग्रिड से लगातार 100 मेगावाट की बिजली सप्लाई चाहिए होती है. इस समझने के लिए 1000 वाट (1 kW) के गीजर या हीटर की तरह समझें. जब आप उसे ऑन करते हैं तो वह उसी पल 1000 वाट बिजली खींचना शुरू कर देता है.
अगर एक 100 MW का डेटा सेंटर अपनी पूरी क्षमता पर लगातार चलता है, तो समय के हिसाब से उसकी बिजली की खपत ऐसे दिखेगी.
1 घंटे में: 100 MWh बिजली की जरूरत होगी जो यूनिट में 1 लाख यूनिट होता है. यह एक सामान्य घर के लिए सालों का बिल है.
1 दिन में: 2400 MWh बिजली की जरूरत होगी जो यूनिट में 24 लाख यूनिट होता है.
1 साल में: लगभग 8,76,000 MWh बिजली की जरूरत होती है.
भारत में Colocation Data Center की कुल क्षमता CY23 में 977MW थी. मार्च 2025 तक यह बढ़कर 1352MW हो गई है, यानी सालाना आधार पर 38% की ग्रोथ हुई है. 2020 के बाद से डेटा सेंटर की क्षमता 27% CAGR की दर से बढ़ी है, जबकि 2014 से अब तक 23% CAGR ग्रोथ दर्ज की गई है. डेटा इस्तेमाल और इंटरनेट ट्रैफिक तेजी से बढ़ने की वजह से Data Center कैपेसिटी में भी तेजी से विस्तार देखने को मिल रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2030 तक भारत में 5GW (5000 MW) डेटा सेंटर की जरूरत होगी.
ट्रेडिशनल सॉफ्टवेयर की तुलना में AI को काम करने, सीखने और डेटा प्रोसेस करने के लिए बहुत ज्यादा कंप्यूटर पावर, सुपरफास्ट नेटवर्किंग और भारी स्टोरेज की जरूरत होती है. इसी वजह से देश में AI-Ready (हाई-टेक) डेटा सेंटर्स की मांग बढ़ रही है. अब ऐसे डेटा सेंटर्स की मांग बढ़ रही है जो बिना रुके भारी कंप्यूटिंग लोड संभाल सकें. जैसे-जैसे कंपनियां और आम लोग AI टूल्स का इस्तेमाल बढ़ाएंगे, वैसे-वैसे देश में विशाल और सुपर-फास्ट डेटा सेंटर्स (AI-Ready Infrastructure) की मांग रिकॉर्ड तोड़ रफ्तार से बढ़ेगी.
Data Center Density: PB/MW
डेटा सेंटर डेंसिटी का मतलब है कि हर 1 मेगावाट (MW) बिजली पर कितना डेटा (Petabytes-PB में) प्रोसेस या स्टोर करने का दबाव है. यह नंबर जितना ज्यादा होगा, इसका मतलब है कि क्षमता (Capacity) उतनी ही कम है और सेंटर्स पर लोड बहुत ज्यादा है.
मौजूदा स्थिति: भारत की डेंसिटी 14.5 PB/MW है. इसके मुकाबले चीन की 4.5 और अमेरिका की सिर्फ 0.3 है. यानी अमेरिका और चीन के पास डेटा के मुकाबले बहुत ज्यादा कैपेसिटी है.
2030 का अनुमान: यदि भारत 25% की सालाना रफ्तार (CAGR) से नए डेटा सेंटर बनाता भी है, तो 2030 तक यह घटकर 9.0 PB/MW पर आएगी. लेकिन यह क्षमता भी चीन की आज की स्थिति से दोगुनी (2x) पीछे होगी.
मतलब, इस रफ्तार से 2030 तक भारत की डेटा सेंटर कैपेसिटी 5GW के पार पहुंच जाने की उम्मीद है.
तो अगली बार जब आप रील्स स्क्रॉल करते हुए मुस्कुराएं तो बैकग्राउंड में चल रहे उन कंक्रीट के कमरों और लाखों सुपरफास्ट कंप्यूटर्स को थैंक यू जरूर कहिएगा. क्योंकि आपकी मुस्कुराहट और इंटरनेट की रफ्तार के पीछे यही डेटा सेंटर हैं. ये वो अनदेखी दुनिया है जिसके बिना आज की इंसानी जिंदगी पूरी तरह थम जाएगी. डेटा सेंटर्स इंटरनेट का यह वो पावर हाउस है जो 24 घंटे आपकी डिजिटल लाइफ को चला रहा है.