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West Asia संकट से भारत पर दबाव.
West Asia में जारी तनाव का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका जताई गई है. Crisil की रिपोर्ट के मुताबिक अगर यह संकट लंबे समय तक चलता है, तो भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट यानी CAD बढ़कर GDP के करीब 2% तक पहुंच सकता है. रिपोर्ट में इसे एक जोखिम भरा परिदृश्य बताया गया है, जिसमें बाहरी सेक्टर पर दबाव साफ दिखाई देता है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस पूरे दबाव की मुख्य वजह कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी है. अनुमान के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतों में सालाना आधार पर करीब 23% की तेजी देखी जा सकती है. इससे पेट्रोलियम इंपोर्ट बिल में तेज बढ़ोतरी होगी, जो पहले से ही कुल इंपोर्ट का बड़ा हिस्सा है.
इसके साथ ही गैस और उर्वरक की कीमतों में भी बढ़ोतरी का असर देखने को मिलेगा. इनकी ऊंची लागत भारत के कुल इंपोर्ट बिल को और बढ़ाएगी, जिससे ट्रेड डेफिसिट पर दबाव बढ़ेगा.
रिपोर्ट के अनुसार, तेल, गैस और उर्वरक की महंगी इंपोर्ट से भारत का ट्रेड डेफिसिट बढ़ सकता है. जब इंपोर्ट बिल तेजी से बढ़ता है, तो एक्सपोर्ट के मुकाबले अंतर और ज्यादा हो जाता है.
इसके अलावा West Asia में स्थिति खराब होने से भारत के एक्सपोर्ट पर भी असर पड़ सकता है. इस क्षेत्र में शिपमेंट में रुकावट, शिपिंग और इंश्योरेंस लागत में बढ़ोतरी और वैश्विक मांग में नरमी एक्सपोर्ट को प्रभावित कर सकती है. इससे ट्रेड गैप और चौड़ा होने का खतरा है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि West Asia से आने वाला रेमिटेंस भारत के बाहरी आय का अहम हिस्सा है. लेकिन अगर वहां भारतीय कामगारों की आय प्रभावित होती है, तो इसका असर रेमिटेंस फ्लो पर पड़ सकता है. ऐसे में अगर रेमिटेंस घटता है, तो CAD पर अतिरिक्त दबाव बनेगा. यह स्थिति भारत के बाहरी संतुलन को और कमजोर कर सकती है.
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हालांकि रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत का सर्विस ट्रेड सरप्लस इस दबाव को कुछ हद तक संतुलित कर सकता है. सेवाओं से मिलने वाली आय CAD को पूरी तरह नहीं, लेकिन आंशिक तौर पर संभाल सकती है. फिर भी अगर ऊर्जा की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और एक्सपोर्ट व रेमिटेंस दोनों कमजोर रहते हैं, तो यह राहत सीमित रह सकती है.
Crisil ने अपने बेस केस में भारत का CAD करीब 1.5% रहने का अनुमान लगाया है. लेकिन अगर West Asia संकट बढ़ता है और ऊर्जा की कीमतों में लगातार तेजी बनी रहती है, तो यह बढ़कर करीब 2% तक जा सकता है. यह अंतर दिखाता है कि बाहरी हालात में बदलाव का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर कितना तेजी से पड़ सकता है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि CAD बढ़ने के साथ-साथ महंगाई और रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है. महंगे इंपोर्ट का असर घरेलू कीमतों पर पड़ेगा. साथ ही बाहरी सेक्टर में असंतुलन बढ़ने से मुद्रा पर दबाव आ सकता है और वित्तीय स्थितियां सख्त हो सकती हैं.
Crisil ने चेतावनी दी है कि इस पूरे घटनाक्रम का असर आर्थिक वृद्धि पर भी पड़ सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत की GDP ग्रोथ 7.1% के बेसलाइन अनुमान से घटकर करीब 6.8% तक आ सकती है. कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और गैस की उपलब्धता में कमी से इनपुट लागत बढ़ेगी, जिसका असर मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन और सर्विस सेक्टर पर पड़ेगा.
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रिपोर्ट में कहा गया है कि West Asia के ऊर्जा झटके का असर Asia-Pacific क्षेत्र में सबसे ज्यादा होगा. इसमें भारत भी शामिल है. ऊर्जा की ऊंची कीमतें लोगों की खरीदारी क्षमता को कम कर सकती हैं और घरेलू मांग को कमजोर कर सकती हैं, जिससे अर्थव्यवस्था की गति पर असर पड़ेगा.
रिपोर्ट से साफ है कि अगर West Asia का संकट लंबा खिंचता है, तो भारत के सामने कई चुनौतियां एक साथ आ सकती हैं. इंपोर्ट बिल बढ़ना, एक्सपोर्ट पर असर, रेमिटेंस में कमजोरी, महंगाई और ग्रोथ पर दबाव, ये सभी जोखिम एक साथ सामने आ सकते हैं. हालांकि सर्विस सेक्टर कुछ राहत दे सकता है, लेकिन पूरी स्थिति काफी हद तक वैश्विक हालात और ऊर्जा कीमतों पर निर्भर करेगी.
आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1 CAD 2% तक क्यों बढ़ सकता है?
महंगे तेल, गैस और उर्वरक इंपोर्ट, कमजोर एक्सपोर्ट और रेमिटेंस में गिरावट इसकी वजह बन सकते हैं.
Q2 कच्चे तेल की कीमत में कितना उछाल बताया गया है?
रिपोर्ट के मुताबिक सालाना आधार पर करीब 23% की बढ़ोतरी का अनुमान है.
Q3 बेस केस में CAD कितना है?
Crisil ने बेस केस में CAD करीब 1.5% रहने का अनुमान दिया है.
Q4 GDP ग्रोथ पर कितना असर पड़ सकता है?
ग्रोथ 7.1% से घटकर करीब 6.8% तक आ सकती है.
Q5 क्या कोई राहत देने वाला फैक्टर है?
सर्विस ट्रेड सरप्लस कुछ हद तक इस दबाव को कम कर सकता है.