वोडाफोन आइडिया और एयरटेल को बॉम्बे हाई कोर्ट से बड़ी राहत: 2012 का वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज रद्द, बैंक गारंटी लौटाने का आदेश

बॉम्बे हाई कोर्ट ने टेलीकॉम सेक्टर की दो बड़ी दिग्गज कंपनियों, वोडाफोन आइडिया (Vodafone Idea) और भारती एयरटेल (Bharti Airtel) को एक बहुत बड़ी कानूनी और वित्तीय राहत दी है. अदालत ने केंद्र सरकार द्वारा इन कंपनियों पर लगाए गए साल 2012 के वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज (OTSC) को पूरी तरह से रद्द कर दिया है.
वोडाफोन आइडिया और एयरटेल को बॉम्बे हाई कोर्ट से बड़ी राहत: 2012 का वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज रद्द, बैंक गारंटी लौटाने का आदेश

वोडाफोन आइडिया और भारती एयरटेल का 2012 का वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज (OTSC) रद्द, डिमांड नोटिस खारिज. प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)

देश के दूरसंचार (टेलीकॉम) क्षेत्र के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट से एक बेहद ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सामने आया है. अदालत ने 2 प्रमुख टेलीकॉम ऑपरेटरों- वोडाफोन आइडिया (Vodafone Idea) और भारती एयरटेल (Bharti Airtel) के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार द्वारा लगाए गए साल 2012 के वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज (OTSC- One-Time Spectrum Charges) को पूरी तरह से रद्द कर दिया है.

इस फैसले से दोनों कंपनियों को हजारों करोड़ रुपये की संभावित देनदारी से बड़ी राहत मिली है. हाई कोर्ट ने दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा दोनों कंपनियों को जारी किए गए डिमांड नोटिस को भी पूरी तरह खारिज कर दिया है और उनकी बैंक गारंटी (Bank Guarantee) को तुरंत लौटाने का आदेश दिया है.

पिछली तारीख से शुल्क लगाना पूरी तरह अवैध

बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और दूरसंचार विभाग के रुख पर कड़े सवाल उठाए. अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से ये बातें कहीं:

कानूनी अधिकार नहीं: केंद्र सरकार के पास पिछली तारीख (Backdate) से कंपनियों पर ऐसा कोई अतिरिक्त शुल्क या चार्ज लगाने का न तो कोई कानूनी अधिकार था और न ही दोनों पक्षों के बीच हस्ताक्षरित अनुबंध (Contract) में ऐसा कोई प्रावधान था.

पुरानी तारीख से वसूली गलत: साल 2012 की स्पेक्ट्रम नीलामी की कीमतों को आधार बनाकर, कंपनियों से साल 2008 से शुल्क वसूलने की सरकार की कोशिश पूरी तरह से अवैध और अनुचित थी.

राजस्व-साझेदारी के जरिए पहले ही हो रहा था भुगतान

अदालत ने कंपनियों की दलील को सही मानते हुए माना कि ये टेलीकॉम कंपनियां अपने पास मौजूद अतिरिक्त स्पेक्ट्रम (Extra Spectrum) के लिए सरकार को पहले से ही राजस्व-साझेदारी (Revenue-Sharing Model) के माध्यम से नियमित भुगतान कर रही थीं. ऐसे में उन पर अलग से वन-टाइम चार्ज थोपना गलत है.

हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक राष्ट्रीय दूरसंचार नीति-1999 (NTP-1999) का हवाला देते हुए याद दिलाया कि इस नीति का मुख्य उद्देश्य देश के आम नागरिकों तक सस्ती, सुलभ और सार्वभौमिक (Universal) दूरसंचार सेवाएं पहुंचाना था, न कि केवल सरकार का राजस्व (Revenue) बढ़ाना.

'वैध अपेक्षा' के सिद्धांत के खिलाफ गई सरकार

अदालत ने इस बात को भी रेखांकित किया कि टेलीकॉम कंपनियों को जारी किया गया लाइसेंस अपने आप में एक 'पूर्ण अनुबंध' (Complete Contract) होता है. सरकार इस अनुबंध की शर्तों और नियमों को अपनी मर्जी से एकतरफा (Unilaterally) नहीं बदल सकती.

हाई कोर्ट के मुताबिक, सरकार द्वारा इस तरह अचानक अपना रुख और नियम बदल लेना कानून के स्थापित ‘वैध अपेक्षा’ (Legitimate Expectation) के सिद्धांत के पूरी तरह खिलाफ था.

इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि ट्राई (TRAI) की सिफारिश को यदि लागू भी किया जाता, तो वह केवल 10 MHz से अधिक के स्पेक्ट्रम पर ही प्रभावी होती, न कि निचले बैंड्स पर.

मद्रास हाई कोर्ट के पुराने फैसले से असहमति

इस फैसले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बॉम्बे हाई कोर्ट ने एयरसेल (Aircel) मामले में साल 2016 के मद्रास हाई कोर्ट के पुराने फैसले से अपनी असहमति जताई है. हालांकि, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि एयरसेल की अपील और इससे संबंधित टीडीसैट (TDSAT) के कई अन्य मामले अभी भी देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में लंबित हैं, जिन पर अंतिम फैसला आना बाकी है.

Conclusion

बॉम्बे हाई कोर्ट का यह आदेश वोडाफोन आइडिया और भारती एयरटेल जैसी वित्तीय और कानूनी चुनौतियों से जूझ रही कंपनियों के लिए एक संजीवनी की तरह है. यह फैसला न केवल कॉरपोरेट जगत में अनुबंधों (Contracts) की पवित्रता और उनके कड़ाई से पालन को सुनिश्चित करता है, बल्कि सरकार को भी यह संदेश देता है कि नियमों को पिछली तारीख से बदलकर कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं डाला जा सकता. इस फैसले से टेलीकॉम सेक्टर में निवेशकों का भरोसा और मजबूत होने की उम्मीद है.

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