&format=webp&quality=medium)
मिडिल ईस्ट संकट से खतरे में भारत का खजाना! (Image Source-AI)
दुनिया के एक हिस्से में छिड़ी जंग की लपटें अब भारत के आर्थिक गलियारों तक पहुंचती दिख रही हैं. एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट की एक ताजा रिपोर्ट '2026 मिडिल ईस्ट कनफ्लिक्ट एंड इट्स इंप्लिकेशंस' ने खतरे की घंटी बजा दी है. रिपोर्ट का कहना है कि पश्चिम एशिया (वेस्ट एशिया) में जारी यह तनाव सिर्फ कच्चे तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा. इसका सीधा असर विदेशों से आने वाले पैसे (Remittances), भारतीय रुपये की सेहत और सरकार के राजकोषीय बजट पर पड़ने वाला है.
भारत के लिए खाड़ी देश न केवल तेल का जरिया हैं, बल्कि वहां लाखों भारतीय रहते हैं जो हर महीने अपने घर पैसे भेजते हैं. इस तनाव ने अब उस भरोसे और फ्लो पर सवालिया निशान लगा दिया है. अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो आम आदमी से लेकर सरकार तक सबको अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है.
भारत दुनिया में सबसे ज्यादा रेमिटेंस यानी विदेशों से धन प्राप्त करने वाला देश है. इसमें एक बहुत बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों का है. एसबीआई फंड्स की रिपोर्ट बताती है कि भारत में आने वाले कुल रेमिटेंस का लगभग 38 प्रतिशत हिस्सा मिडिल ईस्ट से आता है. हैरानी की बात यह है कि इस 38 प्रतिशत का आधा हिस्सा अकेले यूएई (UAE) से आता है.
जंग की वजह से अगर वहां आर्थिक गतिविधियां धीमी होती हैं या भारतीयों के काम पर असर पड़ता है, तो सीधे तौर पर भारत आने वाले डॉलर्स में कमी आएगी. यह पैसा न केवल परिवारों का खर्च चलाता है बल्कि देश के विदेशी मुद्रा भंडार को भी मजबूती देता है.
जब भी खाड़ी देशों में तनाव होता है, कच्चा तेल सबसे पहले महंगा होता है. रिपोर्ट में एक बहुत सीधा गणित समझाया गया है. अगर कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी होती है, तो भारत का चालू खाता घाटा (CAD) सालाना 15 अरब डॉलर बढ़ जाता है.
Zee Business Hindi Live TV यहां देखें-
एक डरावने परिदृश्य की कल्पना करें, जहां तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास टिकी रहें. ऐसी स्थिति में भारत का घाटा 70 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है. यह घाटा देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा बोझ साबित होगा, जिससे विकास की रफ्तार सुस्त पड़ सकती है.
विदेशी निवेश के उतार-चढ़ाव और बाहरी झटकों का सीधा असर हमारी करेंसी यानी रुपये पर पड़ता है. रिपोर्ट के मुताबिक, अगर विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) का निवेश वापस नहीं लौटा, तो रुपया और भी कमजोर होगा. अभी रुपया 93 रुपये प्रति डॉलर के आसपास ट्रेड कर रहा है.
ये भी पढ़ें: विदेशी निवेशकों ने शेयर बाजार पर मचाया कहर! बेच डाले 1.13 लाख करोड़ रुपये के शेयर, DII ने संभाला मोर्चा
अनुमान लगाया जा रहा है कि अगले दो महीनों में यह गिरकर 96 रुपये प्रति डॉलर तक जा सकता है. पहले रुपये में 2-3 प्रतिशत की गिरावट की उम्मीद थी, लेकिन अब इसे बदलकर 4-5 प्रतिशत कर दिया गया है. रुपया कमजोर होने का मतलब है कि बाहर से आने वाली हर चीज, चाहे वो मोबाइल हो या मशीनरी, हमारे लिए महंगी हो जाएगी.
इस संकट का एक और पहलू है जिस पर कम चर्चा होती है, और वह है खाद यानी फर्टिलाइजर. रिपोर्ट में बताया गया है कि दिसंबर 2025 से अब तक यूरिया की कीमतें वैश्विक स्तर पर लगभग 50 प्रतिशत बढ़ चुकी हैं. गैस की बढ़ती कीमतें और खाद की महंगाई सरकार के लिए मुसीबत बन रही है.
सरकार किसानों को सस्ती खाद देने के लिए सब्सिडी देती है. गैस के दाम बढ़ने से खाद बनाने की लागत बढ़ गई है. रिपोर्ट का अनुमान है कि सरकार को खाद सब्सिडी के लिए बजट में तय की गई रकम से 300 अरब रुपये या उससे भी ज्यादा खर्च करने पड़ सकते हैं. यह अतिरिक्त बोझ देश के राजकोषीय घाटे को बढ़ाएगा.
भारत का 'बैलेंस ऑफ पेमेंट' (BoP) भी इस समय नाजुक मोड़ पर है. हालांकि 2015 से भारत का चालू खाता घाटा जीडीपी के 2 प्रतिशत से नीचे रहा है, लेकिन अभी असली समस्या 'फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट' (FDI) की है. रिपोर्ट के अनुसार, नेट एफडीआई फ्लो लगभग शून्य के करीब पहुंच गया है.
जब बाहर से निवेश कम आता है और खर्च (तेल और आयात) बढ़ जाता है, तो देश की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगती है. पश्चिम एशिया का यह संघर्ष भारत के वित्तीय बाजारों और बजट के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है.
Q: पश्चिम एशिया संकट से भारत के रेमिटेंस पर क्या असर पड़ेगा?
A: भारत के कुल रेमिटेंस का 38 प्रतिशत हिस्सा मिडिल ईस्ट से आता है. संघर्ष के कारण इस प्रवाह में कमी आने की आशंका है, जिससे देश में आने वाले डॉलर कम हो सकते हैं.
Q: कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से भारत का घाटा कितना बढ़ सकता है?
A: रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी भारत के सालाना चालू खाता घाटे (CAD) को 15 अरब डॉलर तक बढ़ा देती है.
Q: रुपये की कीमत में कितनी गिरावट आने का अनुमान है?
A: विशेषज्ञों का मानना है कि रुपया 2026 में 4-5 प्रतिशत तक गिर सकता है. आने वाले समय में यह 93 से गिरकर 96 रुपये प्रति डॉलर तक जा सकता है.
Q: खाद सब्सिडी पर सरकार का खर्च क्यों बढ़ रहा है?
A: दिसंबर 2025 से यूरिया की कीमतें 50 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं. गैस और खाद की महंगी कीमतों की वजह से सरकार का सब्सिडी बिल 300 अरब रुपये से ज्यादा बढ़ सकता है.
Q: एफडीआई (FDI) को लेकर रिपोर्ट में क्या चिंता जताई गई है?
A: रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में नेट एफडीआई निवेश लगभग शून्य के स्तर पर पहुंच गया है, जिससे भारत का 'बैलेंस ऑफ पेमेंट' और आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है.