क्यों कमजोर हो रहा है भारतीय रुपया और आगे क्या होगा?

Rupee Today: पिछले लगभग 50 वर्षों में रुपये में औसतन 4-5% की वार्षिक गिरावट देखी गई है. हालांकि इस बार कमजोरी हाल के वर्षों के मुकाबले ज्यादा तेज है.
क्यों कमजोर हो रहा है भारतीय रुपया और आगे क्या होगा?

 

Rupee Today: भारतीय रुपया इस वित्त वर्ष में लगातार कमजोरी दिखा रहा है. डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 5% फिसल चुका है और पिछले कुछ दिनों से 90 रुपये प्रति डॉलर के ऊपर बना हुआ है. HDFC Tru की ताज़ा रिपोर्ट में बताया गया है कि रुपया कई बाहरी और घरेलू कारणों की वजह से दबाव में है.

कमजोरी की बड़ी वजहें

रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए ऊंचे ट्रेड टैरिफ, भारत का बढ़ता करंट अकाउंट डेफिसिट, विदेशों में ऊंची ब्याज दरों की वजह से होने वाले कैपिटल आउटफ्लो, और तेल व इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे आवश्यक सामानों के भारी आयात पर निर्भरता- ये सभी कारण रुपये पर दबाव डाल रहे हैं. विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भी रुपये को कमजोर किया है.

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लंबी अवधि में रुपया हमेशा गिरता रहा है

पिछले लगभग 50 वर्षों में रुपये में औसतन 4-5% की वार्षिक गिरावट देखी गई है. हालांकि इस बार कमजोरी हाल के वर्षों के मुकाबले ज्यादा तेज है. 2024 में जहां रुपया ओवरवैल्यूड माना जा रहा था, वहीं 2025 में यह थोड़ा अंडरवैल्यूड हो गया है. इसका संकेत REER (रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट) के 100 से नीचे आने से मिलता है. पिछले 10 सालों में यह केवल चौथी बार हुआ है.

कमजोरी के फायदे और नुकसान

रुपये के अंडरवैल्यूड होने से भारतीय निर्यातकों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है क्योंकि भारत से बाहर सामान सस्ता दिखेगा. लेकिन दूसरी ओर आयात महंगा होगा, जिससे पेट्रोल-डीजल, विदेशी यात्रा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे रोजमर्रा से जुड़े खर्च बढ़ सकते हैं. यह महंगाई पर दबाव बढ़ा सकता है.

RBI की भूमिका क्या है?

IMF की रिपोर्ट कहती है कि भारत 'crawl-like arrangement' अपना रहा है. इसका मतलब है कि RBI रुपये को एक नियंत्रित दायरे में चलने देता है और तेज उतार-चढ़ाव को रोकता है. यह व्यवस्था रुपये को धीरे-धीरे समायोजित होने देती है, आमतौर पर हल्की गिरावट की दिशा में.

आगे का रास्ता कैसा दिख रहा है?

रिपोर्ट कहती है कि लंबी अवधि में विदेशी निवेशकों के लिए रुपये का गिरना फायदेमंद हो सकता है क्योंकि इससे उनकी रिटर्न रूपए में बदलने पर बढ़ जाती है. लेकिन निकट अवधि में दबाव बना रह सकता है. वैश्विक वित्तीय हालात, महंगा आयात और व्यापार से जुड़ी चुनौतियाँ रुपये को कमजोर बनाए रख सकती हैं. रिपोर्ट के अनुसार रुपये की मौजूदा अंडरवैल्युएशन ज्यादा समय तक नहीं टिकती, इसलिए आने वाले महीनों में इसके रुझान पर बाजार की नजर रहेगी.

(ANI के हवाले से)

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