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Rupee vs Dollar: पिछले कुछ दिनों में आपने कई बार पढ़ा होगा कि रुपया लगातार डॉलर के मुकाबले गिर रहा है. यहां तक कि अब तो 90 रुपये प्रति डॉलर का मनोवैज्ञानिक स्तर टूट चुका है और बाजार में तरह-तरह की अटकलें चल रही हैं कि क्या भारतीय अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है. लेकिन SBI की नई Ecowrap रिपोर्ट इस पूरे मामले की एक बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाती है. रिपोर्ट कहती है कि गिरता हुआ रुपया जरूरी नहीं कि कमजोर रुपया हो. दरअसल रुपये को खींचने वाली ताकतें सिर्फ बाहरी हैं, जबकि भारत की घरेलू आर्थिक मजबूती अब भी बेहद ठोस है.
SBI की रिपोर्ट साफ बताती है कि रुपये पर इस समय जो दबाव है, वह अचानक आया, तेज आया और बहुत हद तक बाहरी कारकों से आया. इसका भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी से बहुत कम लेना-देना है. यानी जो आप देख रहे हैं, वह असली तस्वीर नहीं बल्कि बाहरी तूफानों का असर ज्यादा है.
रिपोर्ट के मुताबिक रुपये में गिरावट की रफ्तार इस बार काफी तेज रही. कम समय में रुपया 85 से 90 के स्तर तक गिर गया, जबकि पहले 5 रुपये की गिरावट आने में सालों लग जाते थे. यह गिरावट दूसरी सबसे तेज गिरावट बताई गई है, जो ‘Taper Tantrum’ के बाद देखी गई थी .
लेकिन यह गिरावट आखिर हुई क्यों? इसके तीन बड़े कारण रिपोर्ट में साफ बताए गए हैं. पहला बड़ा कारण है अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील को लेकर बनी अनिश्चितता. दूसरा कारण है विदेशी निवेशकों यानी FPI द्वारा भारतीय बाजारों से बड़े पैमाने पर पैसा निकालना. तीसरा कारण है RBI का यह स्पष्ट रुख कि वह रुपये को किसी खास स्तर पर रोकने के लिए आक्रामक दखल नहीं करेगा. RBI ने साफ कहा है कि उसका लक्ष्य केवल स्थिरता बनाए रखना है, न कि किसी खास भाव की रक्षा करना.
इसके अलावा डॉलर इंडेक्स की मजबूती, ऑफशोर मार्केट्स में ट्रेडिंग दबाव और कुछ तकनीकी स्तर टूटने के बाद ट्रिगर हुई ‘ऑप्शन सेलिंग’ ने भी रुपये को नीचे धकेला.
कई लोग यह मानकर चल रहे हैं कि भारत का ट्रेड घाटा काफी बढ़ गया है और इसलिए रुपया गिर रहा है, लेकिन रिपोर्ट इसे तथ्यात्मक रूप से गलत बताती है. SBI कहता है कि अप्रैल से अक्टूबर तक भारत का कुल गुड्स और सर्विसेज घाटा 78 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल के 70 अरब डॉलर के मुकाबले थोड़ा ही ज्यादा है . यानी यह कोई ऐसी चिंताजनक बढ़ोतरी नहीं है जो रुपये को इतना दबा दे.
रिपोर्ट के शब्दों में बाज़ार ने भारत के ट्रेड डेटा को “ओवरसोल्ड” कर दिया, जबकि असलियत में यह बड़ा फैक्टर नहीं था.
रिपोर्ट का सबसे बड़ा खुलासा यह है कि अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए भारी-भरकम टैरिफ ही रुपये की कमजोरी की सबसे बड़ी वजह हैं. 2 अप्रैल 2025 के बाद से भारत के मुख्य निर्यातों पर अमेरिका ने 50% तक का टैरिफ लगा दिया. चीन, वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों पर यह टैरिफ 15–30% ही है .
पर इसका असर क्या हुआ? लगभग 45 अरब डॉलर के भारतीय निर्यात पर इसका सीधा प्रभाव पड़ा. इससे न सिर्फ भारतीय निर्यातकों पर दबाव बढ़ा बल्कि रुपये में गिरावट भी तेज हुई.
एक दिलचस्प बात रिपोर्ट कहती है: रुपये ने सबसे ज्यादा गिरावट झेली है, लेकिन वह सबसे ज्यादा अस्थिर मुद्रा नहीं है. 2 अप्रैल 2025 से अब तक रुपये की अस्थिरता सिर्फ 1.7% रही है, जो दुनिया की कई बड़ी मुद्राओं से कम है. इसका मतलब रुपये गिरा जरूर है, लेकिन घबराहट वाली स्पीड में नहीं. इसकी चाल बड़ी नियंत्रित रही है.
अब आते हैं सबसे अहम सवाल पर कि क्या रुपया सच में कमजोर हो गया है? SBI की रिपोर्ट का जवाब साफ है - नहीं.
रिपोर्ट कहती है कि अगर Real Effective Exchange Rate (REER) यानी असली प्रभावी विनिमय दर देखें तो रुपया अभी अंडरवैल्यूड है, यानी उसकी वैल्यू असल में जितनी होनी चाहिए, उससे कम दिखाई दे रही है. अक्टूबर 2025 के RBI आंकड़ों के मुताबिक REER 97.40 पर आ गया है, जो 7 साल का सबसे निचला स्तर है .
REER 100 से नीचे होने का मतलब है कि रुपया सस्ता हुआ है और लंबे समय में इससे भारतीय निर्यात को फायदा भी मिल सकता है.
इसके साथ-साथ NEER यानी Nominal Effective Exchange Rate भी जून 2024 के 92.1 से गिरकर अक्टूबर 2025 में 84.6 हो गया. यह दर्शाता है कि रुपये पर दबाव बाहरी कारकों की वजह से है, न कि घरेलू कमजोरी की वजह से.
रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक जुलाई से अक्टूबर 2025 तक बाजार में डॉलर की मांग बहुत बढ़ गई थी. व्यापारी श्रेणी (merchant category) में ही 102.5 अरब डॉलर की अतिरिक्त मांग दर्ज की गई. इस दबाव को कम करने के लिए RBI ने जून से सितंबर के बीच 18 अरब डॉलर बाजार में झोंके और फिर अक्टूबर में लगभग 10 अरब डॉलर और लगाए. कुल 30 अरब डॉलर के करीब हस्तक्षेप हुआ .
इसके बावजूद RBI ने अपने रुख में बदलाव नहीं किया. RBI ने कहा कि रुपये की रक्षा करना उसका काम नहीं. उसका लक्ष्य सिर्फ फाइनेंशियल स्टेबिलिटी है.
रिपोर्ट कहती है कि आने वाले महीनों में भी कुछ उतार-चढ़ाव बने रहेंगे. अमेरिका के साथ ट्रेड डील को लेकर अनिश्चितता, रूस से तेल खरीद पर दबाव और विदेशी निवेश की चाल रुपये की दिशा तय करेगी. हालांकि SBI का मानना है कि ट्रेड डील मार्च 2026 से पहले हो सकती है और तब रुपये पर दबाव कम होगा.
FAQs
1. क्या रुपया वास्तव में कमजोर हो गया है?
SBI रिपोर्ट कहती है कि रुपया गिरा है लेकिन कमजोर नहीं हुआ. REER के अनुसार यह अंडरवैल्यूड है.
2. रुपये में गिरावट की सबसे बड़ी वजह क्या है?
अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ और FPI आउटफ्लो रुपये की गिरावट के मुख्य कारण हैं.
3. क्या खराब ट्रेड डेटा की वजह से रुपया गिरा है?
नहीं, SBI कहता है कि ट्रेड घाटा मामूली बढ़ा है और यह असली वजह नहीं है.
4. क्या RBI रुपये को बचा रहा है?
RBI सिर्फ अत्यधिक वोलैटिलिटी रोक रहा है. वह किसी खास स्तर की रक्षा नहीं कर रहा.
5. क्या आने वाले समय में रुपये में सुधार होगा?
अगर ट्रेड डील सुलझती है और बाहरी दबाव कम होते हैं तो रुपये में सुधार संभव है.
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