युद्ध के 3-महीनों में रुपया डगमगाया: जानें- इसका आपके डेली खर्च, इन्वेस्टमेंट, EMI पर क्या असर पड़ता है?

US-Iran युद्ध शुरू होने के बाद सिर्फ तीन महीनों में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया. फरवरी में 91 रुपये प्रति डॉलर के आसपास रहने वाला रुपया मई में 96 प्रति डॉलर तक पहुंच गया. इसका असर सिर्फ अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि आपके पेट्रोल खर्च, किराने के बिल, विदेश यात्रा, EMI और निवेश तक पर पड़ सकता है.
युद्ध के 3-महीनों में रुपया डगमगाया: जानें- इसका आपके डेली खर्च, इन्वेस्टमेंट, EMI पर क्या असर पड़ता है?

रुपया गिरने से आपके डेली खर्च, इन्वेस्टमेंट, EMI पर क्या असर पड़ता है? प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)

दुनिया के किसी कोने में छिड़ा युद्ध आपकी जेब पर असर डाल सकता है. सुनने में यह बात भले बड़ी लगे, लेकिन इस समय भारत में यही हो रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच शुरू हुए तनाव और युद्ध जैसे हालात के बाद भारतीय रुपया लगातार दबाव में है. फरवरी के आखिर में जहां रुपया करीब 91 रुपये प्रति डॉलर पर था, वहीं तीन महीनों के भीतर यह 96 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच गया.

सोमवार को रुपया 95.23 प्रति डॉलर पर बंद हुआ. यह सिर्फ एक नंबर नहीं है. इसका मतलब है कि अब भारत को वही डॉलर खरीदने के लिए पहले से ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं. और क्योंकि भारत कच्चे तेल से लेकर खाने के तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई जरूरी चीजों के लिए आयात पर निर्भर है, इसलिए कमजोर रुपया धीरे-धीरे हर घर की जेब पर असर डालने लगता है.

यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में लोगों से एक साल तक सोना न खरीदने, विदेश यात्राएं कम करने और तेल-गैस की खपत घटाने की अपील की थी ताकि विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम हो सके. लेकिन आखिर रुपया कमजोर होने का मतलब आम आदमी के लिए क्या है? क्या सिर्फ विदेश यात्रा महंगी होती है या इसका असर आपके पेट्रोल बिल, EMI, निवेश और किराने के खर्च तक पहुंचता है? आइए आसान भाषा में समझते हैं.

आखिर रुपया कमजोर क्यों हो रहा है?

किसी भी देश की करेंसी की कीमत कई चीजों पर निर्भर करती है. इस समय रुपये पर सबसे बड़ा दबाव तीन वजहों से माना जा रहा है. पहली वजह है कच्चे तेल की कीमतों में तेजी. भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है और तेल का व्यापार डॉलर में होता है. जब तेल महंगा होता है और साथ ही डॉलर भी मजबूत होता है तो भारत को ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ते हैं.

दूसरी वजह है विदेशी निवेशकों की बिकवाली. जब दुनिया में तनाव बढ़ता है तो विदेशी निवेशक सुरक्षित बाजारों की तरफ जाते हैं. ऐसे समय में वे भारतीय बाजार से पैसा निकालकर डॉलर जैसी सुरक्षित मानी जाने वाली करेंसी में निवेश बढ़ा देते हैं.

तीसरी वजह है डॉलर की मजबूती. युद्ध और वैश्विक अनिश्चितता के समय दुनिया भर में डॉलर की मांग बढ़ जाती है. इसका असर बाकी देशों की करेंसी पर पड़ता है. इन तीनों कारणों ने मिलकर रुपये पर दबाव बढ़ाया है.

रुपया कमजोर होने का सबसे पहला असर कहां दिखता है?

इसका जवाब है- आपकी रोजमर्रा की जिंदगी में.

जब रुपया कमजोर होता है तो आयातित चीजें महंगी हो जाती हैं. भारत सिर्फ तेल ही नहीं बल्कि खाने के तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, केमिकल्स और कई जरूरी चीजों का भी आयात करता है.

यानी अगर डॉलर महंगा हुआ तो विदेश से आने वाली लगभग हर चीज की लागत बढ़ सकती है. और यही बढ़ी हुई लागत धीरे-धीरे कंपनियां ग्राहकों पर डालने लगती हैं.

पेट्रोल-डीजल महंगा क्यों हो सकता है?

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से तेल खरीदकर पूरा करता है. तेल डॉलर में खरीदा जाता है. ऐसे में जब डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है तो भारत को वही तेल खरीदने के लिए ज्यादा रुपये देने पड़ते हैं.

मान लीजिए पहले एक बैरल तेल खरीदने के लिए 80 रुपये प्रति डॉलर के हिसाब से भुगतान हो रहा था. अगर अब डॉलर 96 रुपये का हो गया तो तेल की वास्तविक लागत बढ़ जाएगी.

यही वजह है कि रुपये में कमजोरी का सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है. हालांकि सरकार टैक्स घटाकर कुछ राहत देने की कोशिश कर सकती है, लेकिन लंबे समय तक दबाव रहने पर कीमतों में असर दिखने लगता है.

सिर्फ पेट्रोल नहीं, रसोई का खर्च भी बढ़ सकता है

बहुत से लोगों को लगता है कि रुपये और डॉलर की लड़ाई सिर्फ शेयर बाजार या विदेशी व्यापार तक सीमित है. लेकिन इसका असर सीधे आपकी रसोई तक पहुंच सकता है.

भारत खाने के तेल का भी बड़ा आयातक है. पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सनफ्लावर ऑयल जैसी चीजें बड़े पैमाने पर विदेशों से आती हैं. ये सभी डॉलर में खरीदी जाती हैं. ऐसे में कमजोर रुपया खाने के तेल को महंगा बना सकता है.

इसके अलावा ट्रांसपोर्ट का खर्च बढ़ने से सब्जियां, दूध, किराना और रोजमर्रा की चीजों की कीमतें भी प्रभावित हो सकती हैं. डीजल ट्रकों, मालगाड़ियों और सप्लाई चेन की रीढ़ माना जाता है. अगर डीजल महंगा होगा तो उसका असर लगभग हर सामान की कीमत पर दिखाई दे सकता है.

मोबाइल, AC और इलेक्ट्रॉनिक्स भी महंगे हो सकते हैं

भारत में बिकने वाले कई स्मार्टफोन, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स और उपकरण विदेशों से आते हैं या उनमें इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल आयातित होता है. जब रुपया कमजोर होता है तो कंपनियों की लागत बढ़ जाती है. ऐसे में वे कीमतें बढ़ा सकती हैं. यानी आने वाले समय में मोबाइल फोन, लैपटॉप, एयर कंडीशनर, टीवी और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक्स महंगे हो सकते हैं.

आपके निवेश पर क्या असर पड़ सकता है?

रुपये की कमजोरी का असर सिर्फ खर्च पर नहीं बल्कि निवेश पर भी पड़ता है. कई ऐसे सेक्टर्स हैं जो आयातित कच्चे माल पर निर्भर हैं. जैसे-

  • एविएशन
  • ऑयल मार्केटिंग कंपनियां
  • पेंट कंपनियां
  • केमिकल सेक्टर
  • इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां

इन कंपनियों को डॉलर में भुगतान करना पड़ता है. जब डॉलर महंगा होता है तो उनकी लागत बढ़ जाती है. अगर कंपनियां यह बढ़ी लागत ग्राहकों पर पूरी तरह नहीं डाल पातीं तो उनके मुनाफे पर असर पड़ता है. और जब मुनाफा घटता है तो शेयर कीमतों पर दबाव आ सकता है. यानी अगर आपके पोर्टफोलियो में ऐसी कंपनियों के शेयर हैं तो रुपये की कमजोरी का असर आपके निवेश रिटर्न पर भी पड़ सकता है.

कौन से सेक्टर को फायदा हो सकता है?

हर गिरावट हर किसी के लिए नुकसान नहीं होती. कुछ सेक्टर्स को कमजोर रुपये से फायदा भी मिलता है. IT कंपनियां इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. Infosys, TCS और Wipro जैसी कंपनियां विदेशों से डॉलर में कमाई करती हैं. जब डॉलर मजबूत होता है तो उनकी कमाई रुपये में ज्यादा दिखाई देती है. इसी तरह फार्मा एक्सपोर्टर्स, टेक्सटाइल और जेम्स-ज्वेलरी एक्सपोर्ट सेक्टर को भी फायदा हो सकता है.

Gold ETFs और Sovereign Gold Bonds में निवेश करने वालों को भी फायदा मिल सकता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय गोल्ड कीमतों और रुपये की कमजोरी दोनों का असर सोने की कीमत पर पड़ता है.

क्या SIP निवेशकों को डरना चाहिए?

विशेषज्ञ मानते हैं कि लंबी अवधि के निवेशकों को घबराने की जरूरत नहीं है. करेंसी साइकल समय के साथ बदलते रहते हैं. ऐसे में घबराकर निवेश निकालने के बजाय पोर्टफोलियो को संतुलित रखना ज्यादा बेहतर माना जाता है. एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि निवेशकों को अलग-अलग एसेट क्लास में निवेश रखना चाहिए. जैसे:

  • इक्विटी
  • गोल्ड
  • फिक्स्ड इनकम
  • इंटरनेशनल एक्सपोजर

इससे जोखिम कम किया जा सकता है.

विदेश यात्रा क्यों महंगी हो जाती है?

अगर आप विदेश घूमने की योजना बना रहे हैं तो कमजोर रुपया आपकी जेब पर बड़ा असर डाल सकता है. विदेश यात्रा का लगभग हर खर्च डॉलर या विदेशी करेंसी में होता है-

  • फ्लाइट टिकट
  • होटल
  • खाना
  • शॉपिंग
  • लोकल ट्रांसपोर्ट

मान लीजिए अमेरिका ट्रिप के लिए आपका बजट 5,000 डॉलर है. अगर डॉलर 80 रुपये का था तो खर्च करीब 4 लाख रुपये बैठता. लेकिन अगर डॉलर 96 रुपये का हो जाए तो वही ट्रिप करीब 4.8 लाख रुपये की पड़ सकती है. यानी सिर्फ करेंसी बदलने से आपका खर्च लाखों रुपये बढ़ सकता है.

क्या घरेलू यात्रा भी महंगी हो सकती है?

बहुत लोग सोचते हैं कि रुपये की कमजोरी का असर सिर्फ विदेश यात्रा पर पड़ता है. लेकिन ऐसा नहीं है. एयरलाइंस कंपनियों का बड़ा खर्च डॉलर से जुड़ा होता है. विमान लीज, मेंटेनेंस और एविएशन फ्यूल की लागत डॉलर में होती है. जब कंपनियों का खर्च बढ़ता है तो वे टिकट महंगे कर सकती हैं. होटल इंडस्ट्री और ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर भी इसका असर पड़ सकता है. यानी घरेलू यात्रा भी महंगी हो सकती है.

EMI और लोन पर क्या असर पड़ेगा?

रुपये की कमजोरी का असर धीरे-धीरे ब्याज दरों तक भी पहुंच सकता है. जब तेल महंगा होता है तो महंगाई बढ़ने लगती है. अगर महंगाई ज्यादा बढ़े तो RBI को दखल देना पड़ सकता है. ऐसे हालात में RBI रेपो रेट बढ़ा सकता है.

अगर रेपो रेट बढ़ता है तो बैंक भी होम लोन, कार लोन और दूसरे फ्लोटिंग रेट लोन पर ब्याज बढ़ा सकते हैं. इसका मतलब आपकी EMI बढ़ सकती है. हालांकि फिलहाल भारत में ऐसी स्थिति नहीं बनी है, लेकिन अगर लंबे समय तक तेल और डॉलर में तेजी बनी रहती है तो आगे दबाव बढ़ सकता है.

किन लोगों पर सीधा असर ज्यादा पड़ता है?

विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्र

अगर आपने एजुकेशन लोन लिया है और विदेश में पढ़ाई कर रहे हैं तो फीस, हॉस्टल और रहने का खर्च बढ़ सकता है.

विदेशी करेंसी में खर्च करने वाले लोग

क्रेडिट कार्ड से विदेशी खर्च करने पर बैंक पहले ही लगभग 3.5 प्रतिशत FX मार्कअप लेते हैं. कमजोर रुपये से खर्च और बढ़ जाता है.

कंपनियों पर असर

जिन कंपनियों ने डॉलर में कर्ज लिया है और हेजिंग नहीं की है, उनके बैलेंस शीट पर दबाव बढ़ सकता है.

क्या NRI को फायदा हो सकता है?

दिलचस्प बात यह है कि कुछ मामलों में NRI को फायदा भी हो सकता है. अगर कोई NRI डॉलर में कमाई करता है और भारत में रुपये में EMI भरता है तो डॉलर मजबूत होने पर उसकी EMI डॉलर के हिसाब से सस्ती पड़ सकती है.

आम आदमी को अब क्या करना चाहिए?

1. खर्चों पर नजर रखें

फ्यूल, इलेक्ट्रॉनिक्स और लग्जरी खर्चों को लेकर सावधानी जरूरी हो सकती है.

2. निवेश में विविधता रखें

सिर्फ एक सेक्टर या एक एसेट पर निर्भर रहना जोखिम बढ़ा सकता है.

3. इमरजेंसी फंड बनाएं

कम से कम 6 से 12 महीने के खर्च जितनी बचत रखना सुरक्षित माना जाता है.

4. घबराकर फैसले न लें

करेंसी में उतार-चढ़ाव हमेशा रहता है. ऐसे समय में जल्दबाजी में निवेश निकालना नुकसान बढ़ा सकता है.

दुनिया का युद्ध आपकी जेब तक कैसे पहुंच जाता है?

यह पूरी कहानी दिखाती है कि आज दुनिया कितनी जुड़ी हुई है. अमेरिका और ईरान के बीच तनाव हजारों किलोमीटर दूर हो सकता है, लेकिन उसका असर भारत में पेट्रोल पंप, किराने की दुकान, शेयर बाजार और आपकी EMI तक पहुंच सकता है.

युद्ध से तेल महंगा होता है. तेल महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ती है. डॉलर मजबूत होता है तो रुपया कमजोर पड़ता है. और फिर धीरे-धीरे इसका असर पूरे आर्थिक सिस्टम में फैलने लगता है. यानी ग्लोबल घटनाएं अब सिर्फ टीवी डिबेट का हिस्सा नहीं रह गईं, बल्कि आम आदमी की जेब और बजट से सीधे जुड़ चुकी हैं.

आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)

Q1 रुपया कमजोर होने का मतलब क्या होता है?

इसका मतलब है कि डॉलर खरीदने के लिए पहले से ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं.

Q2 कमजोर रुपये से सबसे पहले क्या महंगा होता है?

आमतौर पर तेल, आयातित सामान और विदेश यात्रा पर असर जल्दी दिखाई देता है.

Q3 क्या रुपये की कमजोरी से शेयर बाजार गिरता है?

कुछ सेक्टर्स पर दबाव बढ़ सकता है, खासकर जो आयात पर निर्भर हैं.

Q4 क्या सोने की कीमत भी बढ़ सकती है?

हां, डॉलर मजबूत होने और रुपये कमजोर होने पर सोने की कीमतों में असर दिख सकता है.

Q5 क्या EMI तुरंत बढ़ जाती है?

जरूरी नहीं. लेकिन अगर महंगाई बढ़े और RBI ब्याज दरें बढ़ाए तो EMI पर असर पड़ सकता है.

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