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सोना, तेल और विदेश यात्रा पर PM मोदी की 'No' के पीछे का पूरा गणित. प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में लोगों से सोना कम खरीदने, विदेश यात्राओं में संयम बरतने, खाने के तेल का इस्तेमाल घटाने और रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करने की अपील की. पहली नजर में यह सामान्य सलाह लग सकती है, लेकिन इसके पीछे छिपा आर्थिक संकट काफी बड़ा है.
असल में PM मोदी जिस 'मौजूदा हालात' की बात कर रहे थे और खासतौर से जिन तीन चीजों (सोना, तेल और विदेश यात्रा) में कटौती की बात कर रहे थे, वह सीधे-सीधे ₹2,07,83,06,65,00,000 रुपये के आर्थिक दबाव से जुड़ा है. जिसे हमने अगर समय रहते संभाल लिया तो बड़े संकट से बच सकते हैं. चलिए, इसे आसान भाषा में समझते हैं.
FY26 के अनुमान बताते हैं कि भारत करीब 122 अरब डॉलर का कच्चा तेल इंपोर्ट कर सकता है. इसके अलावा लगभग 72 अरब डॉलर का सोना इंपोर्ट होने का अनुमान है. वहीं भारतीयों द्वारा विदेश यात्राओं पर करीब 23 अरब डॉलर खर्च किए जा सकते हैं.
अगर इन तीनों को जोड़ दिया जाए तो कुल रकम करीब 217 अरब डॉलर (भारतीय रुपये के हिसाब से 20.78 लाख करोड़ रुपये) बैठती है. यही आंकड़ा अब सरकार के लिए सबसे बड़ी चिंता बनता जा रहा है.
ईरान युद्ध 28 फरवरी से शुरू हुआ और उसके बाद से तेल बाजार में भारी उथल-पुथल देखने को मिली. 27 फरवरी को Brent crude की कीमत 72.87 डॉलर प्रति बैरल थी. अब यह बढ़कर 105.45 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी है. यानी करीब 50 प्रतिशत की तेजी.
इस तेजी की सबसे बड़ी वजह Strait of Hormuz बना हुआ है. यह दुनिया का बेहद अहम समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल और LNG सप्लाई गुजरती थी.
रिपोर्ट के मुताबिक ईरान ने मार्च की शुरुआत से इस रास्ते पर पाबंदियां बढ़ा दीं. कई जहाजों को Islamic Revolutionary Guard Corps के साथ ट्रांजिट बातचीत करनी पड़ रही है. इसके अलावा अप्रैल में अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों पर नेवल ब्लॉकेड की घोषणा कर दी, जिससे तेल और गैस सप्लाई पर और दबाव बढ़ गया.
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल इंपोर्टर है. देश अपनी जरूरत का करीब 89 प्रतिशत तेल बाहर से खरीदता है. ऐसे में तेल महंगा होने का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता. सरकारी तेल कंपनियां फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर रखे हुए हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों के कारण उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है.
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रिपोर्ट के मुताबिक ऑयल मार्केटिंग कंपनियां Under-Recoveries झेल रही हैं. यानी जिस कीमत पर तेल इंपोर्ट हो रहा है और जिस कीमत पर बेचा जा रहा है, उसके बीच बड़ा अंतर बन चुका है. कंपनियां Aviation Turbine Fuel पर भी नुकसान झेल रही हैं. अगर आने वाले समय में कीमतें बढ़ती हैं तो उसका असर हर चीज पर पड़ेगा. क्योंकि भारत में ज्यादातर माल ढुलाई डीजल से होती है. ऐसे में-
रोजमर्रा की चीजों के दाम ऊपर जाएंगे और अंत में पूरा बोझ आम उपभोक्ता पर आएगा.
भारत खुद बहुत कम सोना पैदा करता है. देश अपनी लगभग पूरी जरूरत इंपोर्ट से पूरी करता है. पिछले वित्त वर्ष में भारत ने करीब 72 अरब डॉलर का सोना इंपोर्ट किया. यानी हर महीने लगभग 6 अरब डॉलर.
समस्या सिर्फ इतनी नहीं है कि डॉलर बाहर जा रहे हैं. असली चिंता यह है कि सोने की खरीद रुपये पर भी दबाव बढ़ाती है. जैसे-जैसे डॉलर बाहर जाते हैं, रुपया कमजोर होता जाता है. फिर कमजोर रुपया सोने को और महंगा बना देता है. इस तरह एक खतरनाक चक्र बन जाता है-
हालांकि, दूसरी तरफ RBI खुद भी गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहा है. मार्च 2026 तक RBI के पास 880 टन सोना पहुंच चुका है. पिछले एक साल में RBI ने लंदन से 168 टन सोना जोड़ा.
अब भारत के फॉरेक्स रिजर्व में गोल्ड की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो पिछले साल 10 प्रतिशत थी. लेकिन RBI की गोल्ड खरीद और आम लोगों की गोल्ड खरीद में बड़ा फर्क है. RBI इसे रिजर्व मैनेजमेंट के लिए खरीदता है, जबकि घरेलू खरीद सीधे डॉलर आउटफ्लो बढ़ाती है.
विदेश यात्रा भी अब भारत की विदेशी मुद्रा पर बड़ा दबाव बनती जा रही है. 2023-24 में भारतीयों ने विदेश यात्रा पर 31.7 अरब डॉलर खर्च किए. 2024 में करीब 3.09 करोड़ भारतीय विदेश गए, जबकि 2023 में यह संख्या 2.79 करोड़ थी. तेल महंगा होने के कारण एयरलाइन टिकट भी तेजी से महंगे हो रहे हैं.
प्रधानमंत्री मोदी ने खाने के तेल का इस्तेमाल कम करने की भी अपील की. भारत खाने के तेल के लिए काफी हद तक इंपोर्ट पर निर्भर है. देश इंडोनेशिया और मलेशिया से पाम ऑयल खरीदता है, जबकि रूस और यूक्रेन से सनफ्लावर ऑयल आता है.
समस्या यह है कि खाने का तेल कोई लग्जरी चीज नहीं बल्कि रोजमर्रा की जरूरत है. इसे आसानी से टाला नहीं जा सकता है. ऊपर से रुपया कमजोर होने के कारण हर इंपोर्टेड लीटर और महंगा हो जाता है. सरसों तेल जैसे घरेलू विकल्प मौजूद हैं, लेकिन उन्हें इतनी तेजी से स्केल नहीं किया जा सकता कि पूरा देश इंपोर्टेड तेल छोड़ दे.
प्रधानमंत्री ने रासायनिक खाद के इस्तेमाल को आधा करने की बात भी कही. इसकी वजह भी विदेशी मुद्रा पर बढ़ता दबाव है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया इंपोर्टर है. पिछले साल देश ने करीब 1 करोड़ टन यूरिया इंपोर्ट किया. लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं.
फरवरी में यूरिया की कीमत 508 डॉलर प्रति टन थी. अब यह बढ़कर 935 डॉलर प्रति टन पहुंच गई है. जबकि, DAP की कीमत, पिछले साल 680 डॉलर थी. अब 925 डॉलर प्रति टन तक पहुंचने का अनुमान है. वहीं, अमोनिया की कीमत की बात करें तो वह, 435 डॉलर से बढ़कर 850-900 डॉलर तक पहुंच गई है.
भारत अपने लगभग 75 प्रतिशत यूरिया इंपोर्ट के लिए Gulf देशों पर निर्भर है. वहीं घरेलू यूरिया प्लांट भी LNG पर निर्भर हैं, जिसका बड़ा हिस्सा कतर, UAE और ओमान से Strait of Hormuz के जरिए आता है. अगर यह सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित होती है तो सिर्फ इंपोर्ट ही नहीं बल्कि घरेलू उत्पादन भी प्रभावित होगा.
भारत का फॉरेक्स रिजर्व 1 मई तक 690.69 अरब डॉलर रह गया. मार्च के अंत से इसमें 7.79 अरब डॉलर की गिरावट आई. अगर फरवरी 27 से तुलना करें तो रिजर्व 728.5 अरब डॉलर से नीचे आ चुका है. IMF ने 2026 के लिए भारत का Current Account Deficit 84 अरब डॉलर रहने का अनुमान लगाया है.
Negative CAD का मतलब होता है कि देश जितना कमा रहा है उससे ज्यादा खर्च कर रहा है. ऊपर से रुपया करीब 95.65 प्रति डॉलर तक कमजोर हो चुका है. कमजोर रुपया हर इंपोर्ट को और महंगा बना देता है. यानी- तेल महंगा, सोना महंगा, खाद महंगी, खाने का तेल महंगा, विदेश यात्रा महंगी और अंत में इसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ता है.
सरकार की चिंता सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं हैं. असल डर यह है कि अगर तेल और महंगा हुआ, डॉलर लगातार बाहर जाते रहे, फॉरेक्स रिजर्व तेजी से घटा और रुपया और कमजोर हुआ तो भारत पर बड़ा मैक्रो इकोनॉमिक दबाव बन सकता है.
इसी वजह से सरकार अब घरेलू उत्पादन बढ़ाने, गैरजरूरी इंपोर्ट घटाने और विदेशी मुद्रा बचाने पर पूरा फोकस कर रही है. PM मोदी की अपील को इसी बड़े आर्थिक संदर्भ में देखा जा रहा है. यह सिर्फ सामान्य सलाह नहीं बल्कि आने वाले संभावित आर्थिक दबाव के लिए देश को तैयार करने की कोशिश मानी जा रही है.