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दुनिया में तेल महंगा हो चुका है, लेकिन भारत में अभी तक आम आदमी को बड़ा झटका नहीं दिया गया. (प्रतीकात्मक फोटो/AI-ChatGpt)
महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल, ये काफी समय से चर्चा है. सरकार की सफाई भी आ चुकी है. लेकिन हालात किसी और तरफ इशारा कर रहे हैं. सवाल यही है कि आखिर पेट्रोल-डीजल के दाम आखिर कब बढ़ेंगे? ये सवाल अब सिर्फ सोशल मीडिया या राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रह गया है. वजह साफ है- दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन भारत में पिछले करीब दो साल से पेट्रोल और डीजल के रेट लगभग उसी स्तर पर टिके हुए हैं.
अब पीएम नरेंद्र मोदी की एक अपील ने इस बहस को और तेज कर दिया है. हैदराबाद में एक कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी ने लोगों से ज्यादा से ज्यादा सार्वजनिक परिवहन इस्तेमाल करने की अपील की. उनका कहना था कि जितना कम पेट्रोल-डीजल जलेगा, उतना ही देश का विदेशी मुद्रा खर्च कम होगा. यानी साफ है कि सरकार पर दबाव बढ़ रहा है.
दूसरी तरफ सरकारी तेल कंपनियां हर दिन करीब ₹1700 करोड़ तक का नुकसान उठा रही हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ना अब तय है? चलिए, पूरा गणित आसान भाषा में समझते हैं.
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जवाब: इसकी सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में जारी युद्ध है.
युद्ध की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है और ब्रेंट क्रूड की कीमतों में करीब 50% तक उछाल आ चुका है. दुनिया के कई देशों में इसका असर सीधे पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दिखा है.

जवाब: यही सबसे बड़ा सवाल है.
भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें पूरी तरह बाजार से तय जरूर होती हैं, लेकिन सरकार का असर इसमें काफी बड़ा रहता है. सरकार ने अभी तक कीमतें बढ़ने से रोकने के लिए दो बड़े कदम उठाए हैं:
1. एक्साइज ड्यूटी घटाई
सरकार ने पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी ₹13 से घटाकर ₹3 कर दी. डीजल पर ड्यूटी ₹10 से घटाकर लगभग जीरो कर दी गई.
2. तेल कंपनियों को नुकसान उठाने दिया
IOC, BPCL और HPCL जैसी सरकारी कंपनियां बढ़ी हुई लागत के बावजूद पुराने रेट पर ईंधन बेच रही हैं. यानी आम आदमी को राहत देने का बोझ अभी कंपनियां और सरकार दोनों उठा रहे हैं.
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जवाब: PTI सूत्रों के मुताबिक, पिछले 10 हफ्तों में सरकारी तेल कंपनियों को ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा का नुकसान हो चुका है.
अभी:
तीनों कंपनियों को मिलाकर रोज ₹1600-1700 करोड़ तक का घाटा हो रहा है.

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जवाब: क्योंकि यह सिर्फ कारोबारी फैसला नहीं, राजनीतिक फैसला भी है.
यही वजह है कि सरकार अचानक बड़ा झटका देने से बचती है.
फिलहाल सरकार एक्साइज ड्यूटी कम करके हर महीने करीब ₹14,000 करोड़ का बोझ खुद उठा रही है.
जवाब: पीएम मोदी ने लोगों से Public Transport इस्तेमाल करने की अपील की. यह सिर्फ पर्यावरण वाला संदेश नहीं था.
असल संकेत यह था कि:
भारत:
यानी तेल जितना महंगा होगा, देश पर उतना ज्यादा आर्थिक दबाव बढ़ेगा.
जवाब: यही सबसे बड़ा सवाल है और इसका सीधा जवाब अभी किसी के पास नहीं है.
लेकिन एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि अगर कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहा, तो सरकार को पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने पड़ सकते हैं.
संभावित अनुमान
| क्रूड ऑयल स्तर | पेट्रोल-डीजल पर असर |
| $85-$90 प्रति बैरल | ₹3-7 प्रति लीटर तक बढ़ोतरी |
| $95+ प्रति बैरल | ₹8-15 प्रति लीटर तक |
| लंबे समय तक ऊंचे दाम | और बड़ी बढ़ोतरी संभव |
जवाब: सबसे बड़ा असर महंगाई पर पड़ेगा.
भारत में करीब 70% माल ढुलाई डीजल से चलने वाले ट्रकों से होती है.
यानी डीजल महंगा हुआ तो:
यहां तक कि खेती की लागत भी बढ़ जाएगी क्योंकि ट्रैक्टर और सिंचाई में भी डीजल का इस्तेमाल होता है.
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जवाब: काफी हद तक हां.
जवाब: सरकार के पास कुछ विकल्प अभी भी हैं:
लेकिन लंबे समय तक नुकसान सहना आसान नहीं होगा.
जवाब: अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि “सरकार आखिर कब तक कीमतें रोके रख पाएगी?”
अगर युद्ध लंबा चलता है और कच्चा तेल महंगा बना रहता है, तो आने वाले महीनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर बड़ा फैसला लेना पड़ सकता है. और शायद यही वजह है कि अब सरकार भी लोगों को कम ईंधन इस्तेमाल करने की सलाह देने लगी है.
दुनिया में तेल महंगा हो चुका है, लेकिन भारत में अभी तक आम आदमी को बड़ा झटका नहीं दिया गया. इसकी कीमत सरकार और तेल कंपनियां उठा रही हैं. लेकिन, रोज ₹1700 करोड़ का नुकसान हमेशा नहीं झेला जा सकता.
अब सारी नजर इस बात पर है कि:
क्योंकि अगर दबाव ऐसे ही बढ़ता रहा, तो आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ना लगभग तय माना जा रहा है.