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Packaging rules in India: ग्राहकों को लगातार खरीदारी के दौरान और बाद में और अधिक पावरफुल बनाने के लिए सरकार पैकेजिंग के नए नियम लाई है. पैकेजिंग के नए नियम 1अप्रैल 2022 से लागू होंगे. इस नियम के मुताबिक, सामान बनाने वाली कंपनियों को MRP के साथ ही पैकेट पर सामान की प्रति यूनिट/प्रति किलो कीमत लिखनी होगी. दूध, चाय, बिस्किट, खाद्य तेल, आटा, बोतलबंद पानी, बेबी फूड, दाल और अनाज, सीमेंट बैग, ब्रेड एवं डिटर्जेंट जैसे आइटम आयातित प्रोडक्ट पर मैन्युफैक्चरिंग डेट लिखना जरूरी होगा.
पैकेज्ड आइटम में मानक से कम वजन है तो प्रति ग्राम या प्रति मिलीलीटर के हिसाब से दाम लिखना होगा. उसी तरह किसी पैकेट में 1 किलो से ज्यादा सामान है तो उसका भी रेट 1 किलो या 1 लीटर के हिसाब से लिखना जरूरी होगा. अक्सर कंपनियां कीमतों को आकर्षक बनाने के लिए कम वजन के पैकेट बाजार में लाती रही हैं. सरकार ने उनके लिए नियम बनाया था कि स्टैंडर्ड पैकिंग होनी चाहिए. अब सामान बनाने वाली कंपनियों को पूरी आजादी होगी कि वह बाजार में जो पैकेज आइटम बेचती हैं, उसकी मात्रा खुद निर्धारित कर सकें.
नए नियमों में एक बड़ा बदलाव यह किया गया है कि इंपोर्ट किए गए पैकेज आइटम पर मंथ या मैन्युफैक्चरिंग ईयर के बारे में जानकारी देनी जरूरी होगी. इस समय पैकेज आइटम के आयात पर सिर्फ महीने या इंपोर्ट करने की तारीख की जानकारी देना जरूरी है. मतलब किसी पैकेट में 1 किलो या 1 लीटर से कम सामान पैक किया गया है तो उस पर प्रति ग्राम या प्रति मिलीलीटर का दाम लिखना पड़ेगा. और किसी पैकेट में 1 किलोग्राम से ज्यादा सामान है तो उसका भी रेट 1 किलो या 1 लीटर के हिसाब से लिखना होगा. इसी तरीके से पैकेज्ड सामान पर मीटर या सेंटीमीटर के हिसाब से भी दाम लिखना पड़ेगा.
सरकार ने लीगल मेट्रोलॉजी (पैकेट कमोडिटी रूल्स) में बदलाव किया है. इसके तहत दूध, चाय, बिस्किट, खाद्य तेल, आटा, बोतलबंद पानी और पेय, बेबी फूड, दाल, अनाज, सीमेंट बैग, ब्रेड एवं डिटर्जेंट जैसे 19 आइटम आएंगे.
किसी प्रोडक्ट की क्वालिटी उसकी मैन्युफैक्चरिंग डेट से तय की जा सकती है. ऐसे में अब आयातित प्रोडक्ट पर मैन्युफैक्चरिंग डेट लिखना जरूरी होगा. कंज्यूमर अफेयर्स मंत्रालय ने नियमों में बदलाव को नोटिफाई कर दिया है. नए नियमों में दो प्रमुख बदलाव किसी पैकेट में सामान की मात्रा और यूनिट प्राइस से संबंधित है. ग्राहकों के सामने अब यह जानने का अधिकार होगा कि उन्हें प्रति ग्राम सामान के लिए कितना पैसा चुकाना पड़ रहा है.