मिडिल ईस्ट की जंग और बासमती की सिसकी! जंग की आग में झुलसा बासमती का कारोबार, लाखों टन चावल जहाजों में फंसा

मिडिल ईस्ट युद्ध की आग में झुलसा जम्मू का बासमती कारोबार. आरएसपुरा की विश्व प्रसिद्ध बासमती के लाखों टन चावल शिपमेंट में फंसे. जानिए कैसे किसानों और व्यापारियों को हो रहा है करोड़ों का नुकसान.
मिडिल ईस्ट की जंग और बासमती की सिसकी! जंग की आग में झुलसा बासमती का कारोबार, लाखों टन चावल जहाजों में फंसा

जंग की आग में झुलसा बासमती का कारोबार. (Image Source-AI)

दुनिया के एक कोने में जब बारूद बरसता है, तो उसकी तपिश मीलों दूर किसी किसान के चूल्हे तक पहुंच जाती है. आज कुछ ऐसा ही मंजर जम्मू के आरएसपुरा में देखने को मिल रहा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग ने भारत के एक्सपोर्ट मार्केट की कमर तोड़ दी है. आलम यह है कि जिस बासमती चावल की महक सात समंदर पार तक जाती थी, आज वही चावल कंटेनरों में कैद होकर बंदरगाहों पर अपनी बारी का इंतजार कर रहा है.

आरएसपुरा की पहचान उसकी बेहतरीन बासमती से है, जिसे दुनिया भर में अपनी खास क्वालिटी के लिए जीआई (GI) टैग मिला हुआ है. लेकिन युद्ध के बिगड़े हालात ने पूरी सप्लाई चेन को तहस-नहस कर दिया है. लाखों टन चावल या तो समुद्र के बीच रास्ते में अटका है या पोर्ट्स पर रुक गया है. इस संकट ने न सिर्फ बड़े व्यापारियों की रातों की नींद उड़ा दी है, बल्कि खेत में पसीना बहाने वाले किसानों के माथे पर भी चिंता की लकीरें खींच दी हैं.

करोड़ों का माल और भारी भरकम नुकसान

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मिडिल ईस्ट के हालातों ने एक्सपोर्ट के व्यापार को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है, जहां सिर्फ अनिश्चितता है. कारोबारियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संकट की वजह से कई शिपमेंट को सुरक्षा कारणों से बीच में ही रोकना पड़ा है. इसका सीधा गणित नुकसान की ओर इशारा कर रहा है.

व्यापारी / मिल मालिककरोड़ों रुपये का माल और पेमेंट फंसा।
किसानकीमतों में भारी गिरावट से लागत निकलना मुश्किल।
मजदूर / ट्रांसपोर्टरकाम रुकने से आजीविका पर संकट।
बाजार भावकरीब 700 रुपये प्रति क्विंटल की बड़ी कमी।

आरएसपुरा की बासमती

आरएसपुरा की बासमती कोई आम फसल नहीं है. इसे इसकी खुशबू और स्वाद के लिए दुनिया भर में सिर आंखों पर बिठाया जाता है. इसे मिले जीआई टैग की वजह से यूरोप और अरब देशों में इसकी भारी डिमांड रहती है. हर साल यहां से लाखों टन प्रीमियम क्वालिटी का चावल विदेशों में भेजा जाता है. लेकिन आज वही खुशबू युद्ध के धुएं में दबती नजर आ रही है. माल आगे न बढ़ने की वजह से गोदाम भर रहे हैं और नया स्टॉक लेने की जगह नहीं बची है.

एक्सपोर्ट चेन टूटने से मची खलबली

मिल मालिकों का दर्द यह है कि उन्होंने भारी निवेश करके माल तैयार किया था. अब जब उसे बाजार में पहुंचकर मुनाफा देने का समय आया, तो रास्ते बंद हो गए.

  • शिपमेंट का अटकना: लाखों टन चावल कंटेनरों में बंद है.
  • पेमेंट का संकट: माल न पहुंचने से विदेशी ग्राहकों से मिलने वाला पैसा भी अटक गया है.
  • मजदूरों पर असर: मिलों में काम कम होने से पैकिंग और ढुलाई करने वाले मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है.
  • ट्रांसपोर्ट सेक्टर: सैकड़ों ट्रक जो हर दिन बंदरगाहों की तरफ दौड़ते थे, अब खड़े होने को मजबूर हैं.

किसानों की टूटी कमर

जब एक्सपोर्ट रुकता है, तो माल लोकल मार्केट में डंप होने लगता है. सप्लाई ज्यादा और डिमांड कम होने के कारण कीमतों का गिरना तय है. व्यापारियों के मुताबिक, बासमती के दामों में प्रति क्विंटल 700 रुपये तक की गिरावट दर्ज की गई है. यह गिरावट उस किसान के लिए किसी झटके से कम नहीं है, जिसने कई महीनों तक खेतों में मेहनत की थी. अगर जल्द ही हालात नहीं सुधरे, तो खेती से जुड़े इस पूरे इकोसिस्टम को संभालना मुश्किल होगा.

भविष्य की चिंता और उम्मीद

बासमती के व्यापार से जुड़े लोग कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में पहले कभी ऐसा अंतरराष्ट्रीय संकट नहीं देखा, जिसने सीधे तौर पर उनकी थाली पर असर डाला हो. फिलहाल सबकी नजरें मिडिल ईस्ट के हालात पर टिकी हैं. हर कोई यही दुआ कर रहा है कि जंग का शोर थमे और व्यापार के रास्ते फिर से खुलें. अगर सप्लाई चेन जल्द बहाल नहीं हुई, तो आरएसपुरा की बासमती की जो वैश्विक धाक है, उसे बड़ा आर्थिक धक्का लग सकता है.

मुसीबत में आरएसपुरा का बासमती

मिडिल ईस्ट की जंग सिर्फ दो देशों या क्षेत्रों के बीच का मामला नहीं रह गया है. इसका असर आरएसपुरा की बासमती की खुशबू और उसे उगाने वाले किसानों की मेहनत पर साफ दिख रहा है. लाखों टन फंसा हुआ चावल और गिरती कीमतें इस बात का सबूत हैं कि वैश्विक अस्थिरता कैसे एक छोटे से कस्बे के बड़े व्यापार को घुटनों पर ला सकती है. अब उम्मीद सिर्फ शांति की है, ताकि बासमती की यह खुशबू फिर से सरहद पार जा सके और हजारों परिवारों के घर फिर से रोशन हो सकें.

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