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लो-ग्रेड आयरन ओर पर सरकार का बड़ा दांव.
सरकार ने माइनिंग सेक्टर में बड़ा बदलाव करते हुए लो-ग्रेड आयरन ओर के लिए नई प्राइसिंग व्यवस्था लागू कर दी है. Ministry of Mines ने Mineral Concession Rules में संशोधन करते हुए 45% से कम Fe ग्रेड वाले हेमेटाइट आयरन ओर के लिए Average Sale Price यानी ASP तय करने का फॉर्मूला स्पष्ट किया है.
अब तक इस कैटेगरी के आयरन ओर के लिए कोई अलग प्राइसिंग मेथडोलॉजी नहीं थी. ऐसे में 45% से ऊपर वाले ग्रेड की कीमत को ही आधार मानकर रॉयल्टी और अन्य चार्ज लगाए जाते थे. इससे लो-ग्रेड आयरन ओर का इस्तेमाल आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं रह जाता था.
नई नीति में खास तौर पर Banded Haematite Quartzite (BHQ) और Banded Haematite Jasper (BHJ) जैसे लो-ग्रेड संसाधनों को शामिल किया गया है. देश में इनकी बड़ी मात्रा मौजूद है, लेकिन अब तक इनका इस्तेमाल सीमित था. सरकार के नए नियमों के बाद इन संसाधनों को प्रोसेस कर हाई-ग्रेड आयरन ओर में बदला जा सकेगा. इससे इनका इस्तेमाल स्टील मैन्युफैक्चरिंग में कच्चे माल के तौर पर बढ़ेगा.
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सरकार ने लो-ग्रेड आयरन ओर के लिए दो स्तरों पर ASP तय किया है. 35% से 45% Fe ग्रेड वाले आयरन ओर के लिए ASP, 45% से 51% ग्रेड के औसत का 75% होगा. वहीं 35% से कम ग्रेड के लिए ASP, उसी आधार का 50% रखा गया है.
इस नए फॉर्मूले से रॉयल्टी और अन्य चार्ज कम होंगे, जिससे लो-ग्रेड आयरन ओर का बेनिफिसिएशन ज्यादा किफायती बनेगा. यानी कंपनियां अब इन संसाधनों को प्रोसेस करने के लिए ज्यादा तैयार होंगी.
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देश में हाई-ग्रेड आयरन ओर के भंडार सीमित हैं और लगातार इस्तेमाल से उन पर दबाव बढ़ रहा है. ऐसे में लो-ग्रेड संसाधनों को उपयोग में लाना जरूरी हो गया था. नई नीति से हाई-ग्रेड आयरन ओर पर निर्भरता कम होगी और संसाधनों का संतुलित इस्तेमाल संभव हो सकेगा. इससे भविष्य में कच्चे माल की कमी का खतरा भी कम होगा.
स्टील सेक्टर के लिए आयरन ओर सबसे अहम कच्चा माल है. लो-ग्रेड आयरन ओर के इस्तेमाल को बढ़ावा मिलने से इस सेक्टर को स्थिर सप्लाई मिल सकेगी. यह कदम खास तौर पर उस समय अहम है, जब देश में इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं. कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ने से उत्पादन में भी स्थिरता आएगी.
सरकार का यह कदम सिर्फ प्राइसिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य खनन को ज्यादा वैज्ञानिक और संतुलित बनाना भी है. लो-ग्रेड संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ने से खनन गतिविधियों में विविधता आएगी. इससे संसाधनों का बेहतर संरक्षण होगा और अनावश्यक वेस्टेज कम होगा. यानी अब जो पहले बेकार समझा जाता था, वह भी उपयोगी बन सकेगा.
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सरकार ने रॉयल्टी से जुड़े नियमों में भी अहम बदलाव किया है. अब अगर प्रोसेसिंग के नाम पर खनिज की वैल्यू कम की जाती है, तो उस पर रोक रहेगी. नए नियम के तहत रॉयल्टी unprocessed run-of-mine यानी कच्चे माल की शुरुआती स्क्रीनिंग के बाद तय होगी. इससे कंपनियां वैल्यू घटाकर कम रॉयल्टी देने की कोशिश नहीं कर पाएंगी.
लो-ग्रेड आयरन ओर के उपयोग से देश अपने संसाधनों का ज्यादा बेहतर इस्तेमाल कर सकेगा. इससे आयरन ओर की उपलब्धता लंबे समय तक बनी रहेगी और आयात पर निर्भरता कम होगी. सरकार का यह कदम माइनिंग सेक्टर में सुधार के साथ-साथ देश को संसाधनों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है.
आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1 सरकार ने लो-ग्रेड आयरन ओर के लिए क्या नया नियम लागू किया है?
सरकार ने 45% से कम Fe ग्रेड वाले आयरन ओर के लिए नया ASP फॉर्मूला तय किया है, जिससे इसकी कीमत अलग से तय होगी.
Q2 BHQ और BHJ क्या होते हैं?
यह लो-ग्रेड आयरन ओर के रूप हैं, जिन्हें प्रोसेस करके हाई-ग्रेड आयरन ओर में बदला जा सकता है.
Q3 नए नियम से माइनिंग कंपनियों को क्या फायदा होगा?
कम रॉयल्टी और स्पष्ट प्राइसिंग के कारण लो-ग्रेड आयरन ओर का बेनिफिसिएशन सस्ता और किफायती होगा.
Q4 क्या इससे स्टील सेक्टर को फायदा मिलेगा?
हां, कच्चे माल की सप्लाई बढ़ने से स्टील इंडस्ट्री को स्थिरता और लागत में राहत मिलेगी.
Q5 क्या यह कदम संसाधनों के संरक्षण में मदद करेगा?
हां, लो-ग्रेड संसाधनों के इस्तेमाल से हाई-ग्रेड आयरन ओर पर दबाव कम होगा और संतुलित खनन को बढ़ावा मिलेगा.