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महंगाई पर सरकार का '5 साल' वाला मास्टरप्लान. (Image Source- AI)
आम आदमी की रसोई से लेकर बाजार की कीमतों तक, हर चीज का सीधा कनेक्शन महंगाई यानी 'इन्फ्लेशन' से होता है. भारत सरकार ने अब अगले पांच सालों के लिए अपनी आर्थिक दिशा साफ कर दी है. बुधवार को जारी एक सरकारी नोटिफिकेशन में साफ कहा गया है कि देश में रिटेल महंगाई का लक्ष्य 4% पर बरकरार रहेगा. सरकार ने इसके लिए 2% से 6% का एक 'कंफर्ट बैंड' (सुरक्षित दायरा) भी तय किया है. यानी महंगाई 2% से नीचे नहीं जानी चाहिए और 6% से ऊपर नहीं निकलनी चाहिए.
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में युद्ध और सप्लाई चेन की दिक्कतों के कारण कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है. सरकार के इस कदम से बाजार और निवेशकों को यह संदेश गया है कि भारत अपनी आर्थिक स्थिरता को लेकर बेहद गंभीर है.
भारत ने साल 2016 में पहली बार महंगाई को काबू में रखने के लिए इस खास ढांचे (Framework) को अपनाया था. इसके तहत भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वह उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित महंगाई को सरकार द्वारा तय किए गए दायरे में रखे.
आखिरी बार इस फ्रेमवर्क की समीक्षा साल 2021 में हुई थी और अब 2026 में सरकार ने इसे अगले पांच साल यानी 2031 तक के लिए फिर से लागू कर दिया है. इस लक्ष्य को हासिल करने का जिम्मा RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) पर होता है. इस समिति में छह सदस्य होते हैं- तीन रिजर्व बैंक के बड़े अधिकारी और तीन सरकार द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ.
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फिलहाल भारत में कीमतों का दबाव कम है. फरवरी के आंकड़ों के अनुसार, रिटेल महंगाई 2.75% के स्तर पर थी, जो सरकारी लक्ष्य के लिहाज से काफी सुरक्षित है. लेकिन आने वाले समय में राह इतनी आसान नहीं दिख रही है.
मिडिल ईस्ट में ईरान के साथ जारी युद्ध और ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में आई उछाल एक बड़ा खतरा बनी हुई है. जानकारों का मानना है कि अप्रैल से शुरू होने वाले नए वित्त वर्ष में महंगाई 4% के ऊपर निकल सकती है. यही वजह है कि 8 अप्रैल को होने वाली RBI की अगली बैठक पर सबकी नजरें टिकी हैं, जहां ब्याज दरों को लेकर बड़ा फैसला हो सकता है.
महंगाई मापने के तरीके को लेकर पिछले कुछ समय से बहस चल रही थी. सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंता नागेश्वरन ने साल 2024 में सुझाव दिया था कि हमें 'कोर इंफ्लेशन' (जिसमें खाने-पीने और ऊर्जा की अस्थिर कीमतें शामिल नहीं होतीं) पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. उनका तर्क था कि ब्याज दरों में बदलाव का खाने-पीने की चीजों की मांग पर कोई खास असर नहीं पड़ता.
हालांकि, इस बीच सरकार ने कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) के बास्केट में बदलाव कर दिया है. अब इसमें खाने-पीने की चीजों का हिस्सा (Share) कम कर दिया गया है. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस बदलाव से महंगाई के आंकड़ों में होने वाला भारी उतार-चढ़ाव काफी हद तक कम हो जाएगा.
रिजर्व बैंक ने पिछले साल एक डिस्कशन पेपर जारी किया था, जिसमें इस मौजूदा फ्रेमवर्क का समर्थन किया गया. आंकड़ों की मानें तो पिछले 10 सालों में महंगाई सिर्फ एक-तिहाई समय के लिए ही तय दायरे (2-6%) से बाहर रही है. सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव कोरोना महामारी के दौरान देखा गया था. लेकिन कुल मिलाकर, इस व्यवस्था ने लोगों और बाजार की उम्मीदों को बांधे रखने (Anchor expectations) में बड़ी मदद की है.