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Goldman Sachs ने GDP अनुमान में की बड़ी कटौती.
दुनिया के नक्शे पर जब भी बारूद की गंध फैलती है, उसका सीधा असर आम आदमी की रसोई और देश की तिजोरी पर पड़ता है. इस वक्त अमेरिका और ईरान के बीच जो ठनी हुई है, उसने भारत के लिए खतरे की घंटी बजा दी है. दिग्गज इन्वेस्टमेंट बैंक Goldman Sachs ने भारत की आर्थिक विकास दर यानी GDP ग्रोथ के अनुमान को धड़ाम से नीचे गिरा दिया है. जो भारत पहले 7 फीसदी की रफ्तार से बढ़ने का दम भर रहा था, अब उसके लिए 6 फीसदी का आंकड़ा छूना भी मुश्किल लग रहा है.
तनाव शुरू होने से पहले सब कुछ ठीक था, लेकिन मार्च के महीने में जैसे ही हालात बिगड़े, रेटिंग्स गिरने का सिलसिला शुरू हो गया. पहले इसे घटाकर 6.5 फीसदी किया गया और अब ताजा रिपोर्ट में इसे महज 5.9 फीसदी पर लाकर खड़ा कर दिया है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है कच्चा तेल, जो समंदर के रास्तों में मचे घमासान की वजह से लगातार महंगा हो रहा है.
भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल बाहर से मंगवाता है. अब दिक्कत ये है कि 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' (Strait of Hormuz) जैसे अहम समुद्री रास्तों पर तनाव की वजह से तेल की सप्लाई रुक गई है. Goldman Sachs का कहना है कि अगर यह रुकावट अप्रैल के बीच तक जारी रहती है, तो ब्रेंट क्रूड मार्च में 105 डॉलर और अप्रैल में 115 डॉलर प्रति बैरल के औसत भाव तक पहुंच सकता है.
सोचिए, अगर तेल इतना महंगा होगा तो माल ढुलाई महंगी होगी और फिर हर चीज के दाम बढ़ेंगे. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर यह संकट मई के मध्य तक खिंच गया, तो 2026 की आखिरी तिमाही तक तेल की कीमतें 100 से 115 डॉलर के बीच ही टिकी रहेंगी.
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जब विकास की रफ्तार सुस्त पड़ती है, तो अक्सर महंगाई अपने पैर पसारने लगती है. Goldman Sachs ने 2026 के लिए भारत की महंगाई दर का अनुमान भी बढ़ा दिया है. पहले यह 3.9 फीसदी रहने की उम्मीद थी, जो अब बढ़कर 4.6 फीसदी हो गई है.
भले ही यह RBI की तय सीमा के अंदर है, लेकिन इसके पीछे के कारण डराने वाले हैं. एक तरफ तेल महंगा हो रहा है और दूसरी तरफ रुपया कमजोर हो रहा है. जब रुपया गिरता है, तो बाहर से आने वाला हर सामान महंगा हो जाता है. इसका सीधा असर आम जनता की रोजमर्रा की चीजों पर पड़ेगा.
नीचे दी गई टेबल से आप समझ सकते हैं कि युद्ध के पहले और अब के हालात में कितना बड़ा अंतर आ गया है-
| GDP ग्रोथ रेट | 7.0% | 6.5% | 5.9% |
| महंगाई दर (Inflation) | 3.9% | 4.2% | 4.6% |
| कच्चा तेल (Brent Crude) | सामान्य | $105 (मार्च औसत) | $115 (अप्रैल औसत) |
| रेपो रेट (ब्याज दर) | 5.25% | - | 5.75% (प्रस्तावित) |
महंगाई को काबू में करने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के पास सबसे बड़ा हथियार होता है 'रेपो रेट'. Goldman Sachs का अनुमान है कि इस साल RBI ब्याज दरों में 50 बेसिस पॉइंट्स यानी 0.50% की बढ़ोतरी कर सकता है. अभी रेपो रेट 5.25 फीसदी पर है, जो बढ़कर 5.75 फीसदी हो सकता है. इसका मतलब साफ है कि आपके होम लोन या कार लोन की EMI आने वाले दिनों में और महंगी हो सकती है.
भारतीय रुपया इस साल पहले ही डॉलर के मुकाबले 4 फीसदी टूट चुका है, जबकि 2025 में भी इसमें 4.7 फीसदी की गिरावट आई थी. कमजोर रुपया भारत के लिए मुसीबत बन गया है क्योंकि इससे आयात की लागत बढ़ जाती है.
एक और बड़ी चिंता 'करेंट अकाउंट डेफिसिट' (CAD) को लेकर है. सरल भाषा में कहें तो हम बाहर से सामान ज्यादा मंगा रहे हैं और बेच कम पा रहे हैं. अनुमान है कि 2026 में यह बढ़कर GDP का 2 फीसदी हो जाएगा, जो साल 2025 की आखिरी तिमाही में महज 1.3 फीसदी था.