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भारत में फॉर्मल नौकरी की तस्वीर तेजी से बदल रही है. Quess Corp की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक देश की करीब 69-70% पेरोल आधारित नौकरियां अब टियर-2 और टियर-3 शहरों में केंद्रित हैं. सबसे दिलचस्प बात यह है कि टियर-3 शहर अकेले 40% रोजगार दे रहे हैं.
यह निष्कर्ष 640 से अधिक लोकेशन्स और 4.83 लाख से ज्यादा वर्कर्स के डेटा पर आधारित है. यानी तस्वीर व्यापक है और अलग-अलग राज्यों को कवर करती है. यह सिर्फ अनुमान नहीं, बल्कि जमीनी आंकड़ों पर आधारित बदलाव है.
कोयंबटूर, इंदौर, सूरत, वडोदरा, नोएडा और लखनऊ जैसे शहरों में संगठित रोजगार तेजी से बढ़ रहा है. इन शहरों में इंडस्ट्रियल ग्रोथ, रिटेल विस्तार और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के बढ़ने से नई नौकरियां पैदा हो रही हैं.
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छोटे शहरों में नौकरी बढ़ने की 2 बड़ी वजहें:
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नॉन-मेट्रो नौकरी ग्रोथ को कुछ सेक्टर आगे बढ़ा रहे हैं:
टियर-3 शहरों में बैंकिंग और मैन्युफैक्चरिंग मिलकर 45% से अधिक वर्कफोर्स देते हैं, जबकि रिटेल की हिस्सेदारी लगभग 33% है. इसका मतलब साफ है अब नौकरी सिर्फ आईटी या कॉर्पोरेट ऑफिस तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्राउंड लेवल पर भी औपचारिक रोजगार बढ़ रहा है.
रिपोर्ट बताती है कि वर्कर्स में 64% लोग 30 साल से कम उम्र के हैं. यह भारत के डेमोग्राफिक डिविडेंड की झलक है. चौंकाने वाली बात यह भी है कि आधे से ज्यादा कर्मचारी अपनी मौजूदा भूमिका में एक साल से कम समय से हैं.
यह दर्शाता है:
| शहर का प्रकार | वर्कफोर्स हिस्सा (%) |
| टियर-3 शहर | 40% |
| टियर-2 शहर | 29% |
| टियर-1 शहर | 31% |
वित्त वर्ष 2026 के पहले छह महीनों में 26,000 से ज्यादा नए यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (UAN) बनाए गए. और इनमें 23% महिलाएं शामिल हैं.
तमिलनाडु और कर्नाटक से सबसे ज्यादा नए रजिस्ट्रेशन हुए, उसके बाद आंध्र प्रदेश और केरल का स्थान रहा. यह बताता है कि दक्षिण भारत फॉर्मल रोजगार में तेजी से आगे बढ़ रहा है.
कॉर्पोरेट नेतृत्व का कहना है कि नौकरी के अवसरों का डिसेंट्रलाइजेशन हो रहा है. सरल भाषा में समझें तो अब नौकरियां केवल दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु तक सीमित नहीं है. जहां आर्थिक गतिविधि बढ़ रही है, वहीं फॉर्मल जॉब्स भी पहुंच रही हैं.
इसके पीछे कई कारण माने जा रहे हैं:
यानी अब करियर बनाने के लिए मेट्रो शहरों में पलायन जरूरी नहीं रहा.
जब छोटे शहरों में संगठित रोजगार बढ़ता है तो:
Conclusion
भारत में नौकरी का भूगोल बदल रहा है. छोटे और मध्यम शहर अब सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि अवसरों का नया केंद्र बनते जा रहे हैं. 70% फॉर्मल जॉब ग्रोथ का नॉन-मेट्रो में जाना दिखाता है कि आर्थिक विकास अब ज्यादा संतुलित और व्यापक हो रहा है.