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ग्लोबल कंसल्टिंग कंपनी BCG ने चेतावनी दी है कि अगर भारत ने जलवायु परिवर्तन पर जल्द कदम नहीं उठाए, तो देश का एक्सपोर्ट सेक्टर भारी नुकसान का सामना कर सकता है.
खासकर एल्यूमिनियम, आयरन और स्टील जैसे सेक्टर्स, जो इंटरनेशनल मार्केट पर काफी निर्भर हैं, उन्हें बहुत बड़ा झटका लग सकता है. BCG का कहना है कि क्लाइमेट इनएक्शन अब सीधे-सीधे बिजनेस के प्रॉफिट, ऑपरेशंस और लॉन्ग-टर्म फ्यूचर को खतरे में डाल रहा है.
COP30 में जारी हुए ‘क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2026’ के अनुसार, भारत दुनिया के उन टॉप 10 देशों में शामिल है जो सबसे ज्यादा एक्सट्रीम वेदर से प्रभावित हुए हैं. BCG के एशिया पैसिफिक क्लाइमेट एंड सस्टेनेबिलिटी हेड सुमित गुप्ता का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के जोखिम इतने बड़े हैं कि अब इन्हें अनदेखा करना संभव नहीं.
गुप्ता ने RBI और WEF 2024 के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2030 तक भारत की GDP का करीब 4.5% हिस्सा क्लाइमेट-रिलेटेड घटनाओं की वजह से खतरे में हो सकता है. वहीं, सदी के अंत तक देश की नेशनल इनकम का 6.4% से 10% तक हिस्सा भी खत्म हो सकता है.
BCG ने कहा कि क्लाइमेट झटकों का असर सिर्फ अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि बिजनेस के रोजमर्रा के कामकाज पर भी तेजी से बढ़ रहा है. एक्सट्रीम वेदर की वजह से कई बार फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान होता है, कर्मियों की लेबर आवर्स कम हो जाते हैं और प्रोडक्टिविटी लगातार गिरती है.
ऐसे मामलों में प्रोजेक्ट्स समय पर पूरे नहीं हो पाते और हाई-रिस्क वाले इलाकों में निवेश की क्षमता भी कम हो जाती है. कुल मिलाकर, क्लाइमेट इनएक्शन कंपनियों के लिए बड़ा ऑपरेशनल रिस्क बन चुका है.
BCG इंडिया के क्लाइमेट एंड सस्टेनेबिलिटी लीड अनिर्बन मुखर्जी ने कहा कि भारत के एक्सपोर्ट सेक्टर के लिए हालात और चुनौतीपूर्ण हैं. खासकर वे सेक्टर जो ज्यादा प्रदूषण उत्सर्जन करते हैं और इंटरनेशनल मार्केट में बेचते हैं, जैसे-
Aluminium
Iron
Steel
इन पर अंतरराष्ट्रीय नियमों का दबाव लगातार बढ़ रहा है.
EU का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) भारत के एक्सपोर्ट पर बड़ा असर डालेगा. अनुमान है कि भारत के करीब USD 7.7 बिलियन यानी 10-11% एक्सपोर्ट पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा.
BCG का अनुमान है कि 2050 तक ग्लोबल कंपनियों का 5% से 25% EBITDA सीधे जलवायु जोखिम की वजह से प्रभावित हो सकता है. यानी कंपनियों की कमाई का बड़ा हिस्सा एक्सट्रीम वेदर के कारण खतरे में पड़ सकता है.
BCG की रिपोर्ट बताती है कि भारत की बड़ी कंपनियां अब क्लाइमेट चेंज को गंभीरता से लेने लगी हैं. भारत की लगभग एक-तिहाई बड़ी कंपनियां क्लाइमेट स्ट्रेटेजी को अपनी टॉप प्राथमिकताओं में शामिल कर चुकी हैं.
लेकिन समस्या यह है कि सिर्फ 40% भारतीय कंपनियां ही फिजिकल क्लाइमेट रिस्क असेसमेंट करती हैं. यानी ज्यादातर कंपनियां अभी तक जलवायु जोखिम के हिसाब से तैयार नहीं हैं.
क्लाइमेट झटकों का सबसे बड़ा खतरा MSME सेक्टर पर है. बड़ी कंपनियां अपनी 60-70% सप्लाई MSME से लेती हैं. अगर MSME क्लाइमेट रिस्क झेल नहीं पातीं, तो इसका सीधा असर बड़ी कंपनियों की सप्लाई चेन पर पड़ता है.
ऑटोमोबाइल सेक्टर में 70% पार्ट्स Tier-2 और Tier-3 MSMEs से आते हैं. ऐसे में अगर MSME यूनिट्स को नुकसान हुआ, तो पूरी सप्लाई चेन रुक सकती है. BCG का कहना है कि लगभग 20-30% MSME एक्सपोर्ट पर CBAM से सीधा या अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है.
Q1. भारत के एक्सपोर्ट सेक्टर के लिए सबसे बड़ा क्लाइमेट रिस्क क्या है?
A: एक्सट्रीम वेदर और इंटरनेशनल कार्बन नियम सबसे बड़े खतरे हैं.
Q2. CBAM का भारत पर कितना असर होगा?
A: करीब USD 7.7 बिलियन यानी 10-11% एक्सपोर्ट प्रभावित होंगे.
Q3. कौन-कौन से सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हैं?
A: Aluminium, Iron और Steel सेक्टर सबसे पहले झटका झेलेंगे.
Q4. MSME पर क्लाइमेट रिस्क का क्या असर पड़ेगा?
A: MSME की क्षमता घटने पर पूरी सप्लाई चेन टूट सकती है.
Q5. क्या भारतीय कंपनियां क्लाइमेट चेंज के लिए तैयारी कर रही हैं?
A: हां, लेकिन अभी भी कई कंपनियों की तैयारी अधूरी है.