क्रिटिकल मिनरल्स की रेस में अब भारत बनेगा 'गेम चेंजर'! कई देशों के साथ मिलकर तैयार हो रहा नया सप्लाई नेटवर्क

दुनिया भर के दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Minerals) पर चीन का कब्जा खत्म करने के लिए भारत ने कमर कस ली है. जानिए कैसे 'नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन' और पड़ोसियों का साथ भारत को महाशक्ति बनाएगा.
क्रिटिकल मिनरल्स की रेस में अब भारत बनेगा 'गेम चेंजर'! कई देशों के साथ मिलकर तैयार हो रहा नया सप्लाई नेटवर्क

(सांकेतिक तस्वीर)

आज की दुनिया में जिसके पास मोबाइल, लैपटॉप और इलेक्ट्रिक गाड़ियों की चाबी है, वही असली ताकतवर है. लेकिन इन सबके पीछे एक बहुत बड़ा खेल चल रहा है 'रेयर अर्थ एलिमेंट्स' यानी दुर्लभ खनिजों का. फिलहाल इस खेल का इकलौता राजा चीन है. लेकिन अब वक्त बदल रहा है.

भारत ने ठान लिया है कि वह न सिर्फ अपनी निर्भरता कम करेगा, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक नया विकल्प बनकर उभरेगा. यह सिर्फ बिजनेस की बात नहीं है, यह देश की सुरक्षा और तरक्की से जुड़ी एक बड़ी जंग है. भारत की रणनीतिक स्थिति और पड़ोसी देशों के साथ उसके मजबूत रिश्ते उसे इस रेस में सबसे आगे खड़ा कर रहे हैं.

चीन का कब्जा और दुनिया की मजबूरी

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हकीकत यह है कि आज हम जिस तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, उसकी डोर चीन के हाथ में है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, रेयर अर्थ खनिजों को अलग करने और उनकी प्रोसेसिंग करने में चीन की हिस्सेदारी करीब 90% है. इतना ही नहीं, जो मैग्नेट हमारी मशीनों में लगते हैं, उनका 93% हिस्सा भी चीन ही बनाता है.

इसी ताकत के दम पर चीन अक्सर दूसरे देशों को आंख दिखाता रहा है. साल 2010 और जनवरी 2025 में उसने जापान को होने वाली सप्लाई रोक दी थी. भारत भी इससे अछूता नहीं है. हम अपने मैग्नेट के लिए 80 से 90% तक चीन पर ही निर्भर हैं. यह निर्भरता भारत के लिए एक बड़ा खतरा है.

भारत ने शुरू किया अपना मास्टरप्लान

भारत अब चुप बैठने वालों में से नहीं है. अपनी जरूरतों को पूरा करने और दुनिया को विकल्प देने के लिए भारत ने जनवरी 2025 में 'नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन' लॉन्च किया है. इसका मकसद देश के भीतर ही इन कीमती खनिजों की खोज करना, उन्हें प्रोसेस करना और उनका इस्तेमाल बढ़ाना है.

पहले यह सेक्टर सरकारी कंपनियों तक सीमित था, जिससे इसकी रफ्तार धीमी थी. लेकिन अब सरकार ने प्राइवेट सेक्टर के लिए भी दरवाजे खोल दिए हैं. भारत अब अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ 'मिनरल्स सिक्योरिटी पार्टनरशिप' (MSP) के जरिए हाथ मिला रहा है ताकि एक सुरक्षित सप्लाई चेन बनाई जा सके.

पड़ोसी देशों का साथ और भारत की लीडरशिप

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी लोकेशन है. दक्षिण एशिया में भारत एक बड़े भाई की भूमिका निभा रहा है. हमारे पड़ोसी देशों के पास इन खनिजों का खजाना है, लेकिन उनके पास तकनीक और पैसा नहीं है. भारत अपनी 'सागर' (SAGAR) और 'महासागर' (MAHASAGAR) नीतियों के जरिए इन देशों को साथ जोड़ने का काम कर रहा है.

अफगानिस्तान: यहां लैंथेनम, सीरियम और नियोडिमियम जैसे खनिज मौजूद हैं.

म्यांमार: डिस्प्रोprosium और टेरबियम का भंडार है.

श्रीलंका और बांग्लादेश: मोनाजाइट और जिरकोन जैसे खनिज यहां प्रचुर मात्रा में हैं.

नेपाल और भूटान: टेंटलम, लिथियम और टंगस्टन जैसे खनिजों की खानें यहां छिपी हैं.

भारत इन देशों के साथ मिलकर एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर सकता है जिससे चीन की दादागिरी खत्म हो जाए.

तकनीक और निवेश की नई राह

भारत के पास संसाधन भी हैं और दिमाग भी. अब जरूरत है तो बस सही तकनीक और निवेश की. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत ऑस्ट्रेलिया की लायनास कॉरपोरेशन और अमेरिका की माउंटेन पास माइन जैसे प्रोजेक्ट्स के साथ तालमेल बिठा रहा है. जापान की रिसाइक्लिंग तकनीक और यूरोपीय संघ के नए कानूनों का फायदा उठाकर भारत खुद को एक रिफाइनिंग हब के रूप में विकसित कर सकता है. अगर भारत अपने पड़ोसियों के साथ मिलकर वैल्यू चेन बनाने में कामयाब रहा, तो दक्षिण एशिया के दूसरे देश भी ग्लोबल सप्लाई नेटवर्क का हिस्सा बन पाएंगे और उनकी चीन पर निर्भरता खत्म हो जाएगी.

भविष्य की सुनहरी तस्वीर

क्रिटिकल मिनरल्स की यह जंग सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है. यह आने वाले कल की तकनीक पर नियंत्रण की बात है. भारत अपनी रणनीतिक स्थिति और तकनीकी क्षमता के दम पर इस क्षेत्र में एक 'स्थिर शक्ति' बनकर उभर सकता है. चीन के एकाधिकार को चुनौती देना आसान नहीं है, लेकिन भारत ने जो कदम उठाए हैं, वे बताते हैं कि अब दुनिया को एक नया और भरोसेमंद पार्टनर मिलने वाला है. यह आत्मनिर्भर भारत की ओर बढ़ता एक मजबूत कदम है.

FAQs

Q1: रेयर अर्थ खनिजों पर चीन का कितना नियंत्रण है?
A1: चीन दुनिया की करीब 90% रेयर अर्थ प्रोसेसिंग और 93% मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग को कंट्रोल करता है.

Q2: भारत ने चीन के एकाधिकार को चुनौती देने के लिए क्या कदम उठाया है?
A2: भारत ने जनवरी 2025 में 'नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन' शुरू किया है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'मिनरल्स सिक्योरिटी पार्टनरशिप' (MSP) का हिस्सा बना है.

Q3: भारत अपनी मैग्नेट की जरूरतों के लिए किस पर निर्भर है?
A3: भारत अपनी मैग्नेट और उससे जुड़े सामान की जरूरतों के लिए 80 से 90% तक चीन पर निर्भर है.

Q4: भारत के कौन से पड़ोसी देशों में क्रिटिकल मिनरल्स के भंडार हैं?
A4: अफगानिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल, भूटान और श्रीलंका में विभिन्न प्रकार के कीमती खनिज जैसे लिथियम, टंगस्टन और मोनाजाइट मौजूद हैं.

Q5: भारत की 'सागर' (SAGAR) और 'महासागर' नीतियां क्या हैं?
A5: ये नीतियां हिंद महासागर और दक्षिण एशियाई क्षेत्र में समुद्री सहयोग, आर्थिक जुड़ाव और टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई हैं.

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