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अगर आप सोच रहे थे कि घर का बजट कैसे मैनेज करें, तो सितंबर महीने की ये खबर आपको थोड़ी राहत ज़रूर देगी. CRISIL (क्रिसिल) की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर के दौरान घर में पकाई जाने वाली शाकाहारी और मांसाहारी, दोनों तरह की थालियों की कीमतों में पिछले साल के मुकाबले कमी आई है. ये एक अच्छी खबर है, खासकर तब जब हम बढ़ती महंगाई को लेकर अक्सर चिंतित रहते हैं.
मंगलवार, 7 अक्टूबर को जारी क्रिसिल की रिपोर्ट बताती है कि कमोडिटी की कीमतों में गिरावट के कारण शाकाहारी थाली की कीमत में पिछले साल सितंबर के मुकाबले 10 प्रतिशत की कमी आई है. वहीं, मांसाहारी थाली भी 6 प्रतिशत सस्ती हुई है. ये गिरावट मुख्य रूप से सब्जियों और दालों की कीमतों में आई भारी गिरावट की वजह से है.
रिपोर्ट में साफ तौर पर बताया गया है कि शाकाहारी थाली की कीमत में गिरावट का सबसे बड़ा कारण सब्जियों और दालों की कीमतों में भारी कमी है. आइए, एक नज़र डालते हैं कुछ प्रमुख सब्जियों के दामों पर:
आलू 31% सस्ता: कोल्ड स्टोरेज यूनिट्स से स्टॉक की ज़्यादा डंपिंग होने के कारण आलू की कीमतों में 31 प्रतिशत की भारी गिरावट आई है.
टमाटर 8% सस्ता: बाज़ार में ज़्यादा सप्लाई होने के कारण टमाटर के दाम भी सालाना आधार पर 8 प्रतिशत कम हुए हैं.
प्याज 46% सस्ता: ये सबसे बड़ी राहत है! रबी की ज़्यादा सप्लाई और बांग्लादेश से आयात में कमी के कारण घरेलू बाज़ार में प्याज की भरमार हो गई, जिससे इसकी कीमतों में सालाना आधार पर 46 प्रतिशत की ज़बरदस्त गिरावट दर्ज की गई है. बांग्लादेश भारत के प्याज निर्यात में लगभग 40 प्रतिशत का योगदान देता है.
दालें 16% सस्ती: बंगाल चना, पीली मटर और काले चने के आयात में वृद्धि के कारण दालों की कीमतों में भी 16 प्रतिशत की कमी आई है. इन आयातों को मार्च 2026 तक अनुमति दी गई है, ताकि उपभोक्ताओं के लिए कीमतें कम रखी जा सकें.
ये सभी फैक्टर्स मिलकर शाकाहारी थाली को सस्ता बनाने में कामयाब रहे हैं.
मांसाहारी थाली की कीमत में गिरावट शाकाहारी थाली जितनी तेज़ नहीं रही, लेकिन फिर भी इसमें कमी आई है. इसकी वजह ये है कि ब्रॉयलर (चिकन) की कीमतों में सालाना आधार पर सिर्फ 1 प्रतिशत की मामूली गिरावट आई है, जबकि थाली की कुल लागत में ब्रॉयलर की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत होती है. हालांकि, सब्जियों और दालों की कम कीमतों ने मांसाहारी थाली को भी सस्ता करने में मदद की.
हालांकि, ये जानना ज़रूरी है कि सभी चीज़ें सस्ती नहीं हुई हैं. फेस्टिव सीजन की शुरुआत में ज़्यादा मांग के कारण वनस्पति तेल की कीमतों में सालाना आधार पर 21 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई. साथ ही, एलपीजी सिलेंडरों की कीमतें भी सालाना आधार पर 6 प्रतिशत बढ़ी हैं. इन सबके बावजूद, सब्जियों और दालों की कीमतों में बड़ी गिरावट ने थालियों की कुल लागत को कम रखने में मदद की.
क्रिसिल इंटेलिजेंस के डायरेक्टर पुशन शर्मा ने आने वाले समय को लेकर कुछ चिंताएं भी जताई हैं. उनका कहना है कि मध्यम अवधि में प्याज की कीमतों में हल्की बढ़ोतरी देखी जा सकती है. इसकी वजह ये है कि कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में अगस्त और सितंबर में हुई ज़्यादा बारिश के कारण खरीफ की बुवाई में देरी हुई है, जिससे उपज पर असर पड़ सकता है.
उन्होंने ये भी चेतावनी दी कि अगर अक्टूबर में ज़्यादा बारिश होती है और वो कोल्ड स्टोरेज में रखे प्याज या खेतों में खड़ी खरीफ फसल को प्रभावित करती है, तो कीमतों पर और दबाव पड़ सकता है.
इसके अलावा, फेस्टिव सीजन के दौरान कर्नाटक और महाराष्ट्र में ज़्यादा बारिश के कारण टमाटर की उपज पर भी अलग-अलग प्रभाव पड़ सकता है, जिससे इसकी कीमतों में भी बढ़ोतरी की संभावना है.