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भारतीय अर्थव्यवस्था के इंजन यानी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से एक ऐसी खबर आई है जो जोश भर देने वाली है. फिक्की (Ficci) ने अपना 86वां तिमाही सर्वे जारी किया है और इसके नतीजे बता रहे हैं कि देश के कारखानों में काम की रफ्तार अब तक के सबसे बेहतरीन दौर में है. वित्तीय वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही (Q3) में फिक्की का मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स अपने 'ऑल टाइम हाई' यानी अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है.
इसे ऐसे समझिए कि सर्वे में शामिल होने वाली 91 फीसदी कंपनियों ने माना है कि उनका प्रोडक्शन या तो पहले से बेहतर हुआ है या फिर उसी मजबूती के साथ बना हुआ है. पिछली तिमाही में यह आंकड़ा 87 फीसदी था. यानी पिछले कुछ महीनों में मैन्युफैक्चरिंग की गाड़ी ने गियर बदल दिया है और अब वह टॉप स्पीड की तरफ बढ़ रही है.
इस तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह बाजार में बढ़ती डिमांड है. सर्वे कहता है कि करीब 86 फीसदी मैन्युफैक्चरर्स को यह उम्मीद है कि इस तिमाही में उनके पास ऑर्डर्स की संख्या बढ़ेगी या कम से कम स्थिर रहेगी. इस सकारात्मक सोच के पीछे हाल ही में जीएसटी (GST) दरों में की गई कटौती का भी बड़ा हाथ है. टैक्स कम होने से सामान सस्ता हुआ और लोगों ने खरीदारी में दिलचस्पी दिखाई, जिसका सीधा असर फैक्ट्रियों के ऑर्डर बुक पर पड़ा है.
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फिक्की का यह सर्वे कुल आठ प्रमुख सेक्टर्स पर आधारित है. इनमें ऑटोमोबाइल कंपोनेंट्स, कैपिटल गुड्स, केमिकल्स, फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीन टूल्स, मेटल्स और टेक्सटाइल जैसे बड़े क्षेत्र शामिल हैं. रिपोर्ट बताती है कि इनमें से छह सेक्टर्स में औसत से बेहतर ग्रोथ देखने को मिल रही है.
लेकिन असली बाजी मारी है 'इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिकल्स' सेक्टर ने. इस सेक्टर में सबसे जबरदस्त यानी 'स्ट्रॉन्ग' ग्रोथ की उम्मीद जताई गई है. वहीं, मशीन टूल्स और मेटल्स जैसे सेक्टर्स में भी कामकाज की स्थिति काफी संतोषजनक बनी हुई है.
आज के समय में देश की फैक्ट्रियां अपनी कुल क्षमता का लगभग 75 फीसदी इस्तेमाल कर रही हैं. यह एक अच्छा संकेत है क्योंकि जब कपैसिटी यूटिलाइजेशन बढ़ता है, तो नई नौकरियां पैदा होने की संभावना भी बढ़ जाती है. सर्वे में शामिल 38 फीसदी कंपनियों ने कहा है कि वे अगले तीन महीनों में नए लोगों को नौकरी पर रखने का मन बना रही हैं. पिछले साल इसी समय यह आंकड़ा 35 फीसदी था, यानी रोजगार के मोर्चे पर भी धीरे-धीरे सुधार दिख रहा है.
एक्सपोर्ट यानी निर्यात की बात करें तो 70 फीसदी कंपनियों को भरोसा है कि उनका विदेशी व्यापार पिछले साल के मुकाबले बेहतर रहेगा. दुनिया भर में चल रही उथल-पुथल के बावजूद भारतीय सामान की धाक बाहर के बाजारों में बनी हुई है.
सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि सब कुछ इतना आसान नहीं है. सर्वे में शामिल 57 फीसदी मैन्युफैक्चरर्स ने माना है कि सामान बनाने की लागत (प्रोडक्शन कॉस्ट) बढ़ गई है. इसके पीछे कच्चे माल की कीमतों में उछाल, डॉलर के मुकाबले रुपए की कमजोरी और बिजली व लॉजिस्टिक्स का महंगा होना मुख्य कारण हैं.
एक और बड़ी समस्या 'हुनरमंद हाथों' की है. हालांकि 80 फीसदी कंपनियों के पास पर्याप्त वर्कफोर्स है, लेकिन 20 फीसदी कंपनियां ऐसी भी हैं जिन्हें उनके काम के हिसाब से 'स्किल्ड' लेबर नहीं मिल पा रहे हैं. यह सरकार और इंडस्ट्री दोनों के लिए एक अलार्म है कि अब स्किलिंग यानी हुनर सिखाने पर ज्यादा जोर देना होगा.
इसके अलावा, वैश्विक राजनीति यानी जियोपॉलिटिकल फैक्टर्स भी सिरदर्द बने हुए हैं. ट्रेड रिस्ट्रिक्शन्स और टैरिफ जैसे मुद्दों की वजह से कंपनियां अपनी क्षमता को उस रफ्तार से नहीं बढ़ा पा रही हैं, जैसा वे चाहती हैं.
Q1: फिक्की का ताजा मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स क्या बताता है?
A: फिक्की का सर्वे बताता है कि Q3FY26 में मैन्युफैक्चरिंग इंडेक्स अपने अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है, जिसमें 91% कंपनियों ने बेहतर उत्पादन की रिपोर्ट दी है.
Q2: किन वजहों से मैन्युफैक्चरिंग ऑर्डर्स में बढ़ोतरी हुई है?
A: घरेलू मांग में मजबूती और हाल ही में जीएसटी दरों में की गई कटौती ने बाजार में ऑर्डर्स को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है.
Q3: कौन सा सेक्टर सबसे तेज तरक्की कर रहा है?
A: सर्वे के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिकल्स सेक्टर में सबसे मजबूत यानी 'स्ट्रॉन्ग' ग्रोथ की संभावना जताई गई है.
Q4: क्या मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को कर्मचारियों की कमी महसूस हो रही है?
A: लगभग 20% कंपनियों ने स्किल्ड वर्कफोर्स की कमी की बात कही है, जबकि 80% के पास पर्याप्त कर्मचारी उपलब्ध हैं.
Q5: कंपनियों के सामने उत्पादन लागत बढ़ने के क्या कारण हैं?
A: कच्चे माल की ऊंची कीमत, रुपए की कमजोरी, बढ़ते लॉजिस्टिक्स खर्च और बिजली व यूटिलिटी बिलों में बढ़ोतरी के कारण प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ी है.