खेती की प्रगति में महिलाएं बनीं अगुआ! नारी शक्ति की भागीदारी से बदल रही है ग्रामीण भारत की तस्वीर

Agriculture: झारखंड, तमिलनाडु, ओडिशा, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में समुन्नति फाउंडेशन महिला-नेतृत्व वाले किसान उत्पादक संगठन (FPOs) और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के साथ मिलकर जमीनी स्तर पर बदलाव ला रहा है.
खेती की प्रगति में महिलाएं बनीं अगुआ! नारी शक्ति की भागीदारी से बदल रही है ग्रामीण भारत की तस्वीर

FAO: भारत के ग्रामीण इलाकों में जहां मिट्टी जीवन की गाथा बुनती है, वहां महिलाओं ने सदियों से खेती की कमान संभाली है. फिर भी, उन्हें वो सम्मान और अधिकार आज तक नहीं मिला, जिसके वो हकदार हैं. खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, भारत में महिलाएं करीब एक-तिहाई किसान और लगभग आधे कृषि श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करती हैं. बावजूद इसके, उनके पास मात्र 13% कृषि भूमि का स्वामित्व है. यानी जो खेत वे जोतती हैं, उस पर उनका नाम तक नहीं होता.

यह असमानता सिर्फ ज़मीन के कागज़ों में नहीं है, बल्कि इससे तय होता है कि किसे फैसला लेने का अधिकार होगा, किसे बैंक से कर्ज मिलेगा और मंडी में फसल बेचकर मुनाफा किसके हिस्से आएगा. लेकिन अब हालात बदल रहे हैं- और इस बदलाव में महत्‍वपूर्ण भ‍ूमिका निभा रहा है समुन्नति फाउंडेशन (Samunnati Foundation).

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समुन्नति का मिशन: महिलाओं को खेत से कमान तक पहुंचाना

झारखंड, तमिलनाडु, ओडिशा, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में समुन्नति फाउंडेशन महिला-नेतृत्व वाले किसान उत्पादक संगठन (FPOs) और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के साथ मिलकर जमीनी स्तर पर बदलाव ला रहा है. अभी तक 10 हजार से ज्‍यादा महिलाओं की सहायता की गई है- ये बदलावा कैसे होता है ये भी जान लीजिए.

  • महिलाओं को वित्तीय साक्षरता, प्रशासनिक कौशल और बाज़ार मूल्यांकन की ट्रेनिंग दी जा रही है.
  • जलवायु-अनुकूल प्राकृतिक खेती (Natural Farming), मुर्गी पालन (Poultry Farming), और बकरी पालन (Goat Farming) जैसे मॉडल के जरिए उन्हें आय के विविध स्रोत दिए जा रहे हैं.
  • SHGs को FPOs से जोड़कर सामूहिक बचत को व्यवसाय में बदलने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं.
  • महिला उत्पादकों को सीधे बाजार और खरीदारों से जोड़कर बिचौलियों की निर्भरता कम की जा रही है.

महिलाएं सिर्फ खेत में नहीं, पूरे समाज को हैं संवारती

इन उपायों से महिलाएं सिर्फ बेहतर किसान नहीं, बल्कि अपने समुदाय की लीडर बन रही हैं. "महिलाएं सिर्फ खेत में नहीं, पूरे समाज को संवारती हैं". समुन्‍नति फाउंडेशन की सीईओ पूर्णा पुष्कला ने कहा, हमने देखा है कि जब महिलाओं को संसाधनों और फैसलों में भागीदारी मिलती है, तो न सिर्फ उनकी आय बढ़ती है, बल्कि पूरे समुदाय का विकास होता है. महिलाएं सिर्फ खेत में काम नहीं करतीं, वे अपने बच्चों की पढ़ाई, घर की सेहत और गांव की आत्मनिर्भरता भी सम्भालती हैं. यही वजह है कि समुन्नति फाउंडेशन महिलाओं को सिर्फ किसान नहीं, ‘परिवर्तन की अगुवा’ मानता है.

डेटा ही नहीं, दिशा भी तय कर रहे हैं ये प्रयास

समुन्नति जैसे संगठनों के प्रयासों को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान (IWMI) और CGIAR के Water, Land and Ecosystems (WLE) प्रोग्राम्स द्वारा सुझाए गए श्रेष्ठ उपाय अपनाए जा रहे हैं. इन संगठनों ने यह स्पष्ट किया है कि सिर्फ महिलाओं की भागीदारी काफी नहीं है, बल्कि हर स्तर पर असमानता मिटानी होगी. इसलिए अब नीति-निर्माता और जमीनी संस्थाएं मिलकर महिला सशक्तिकरण को मापन योग्य रूप में ढाल रहे हैं.

Women Empowerment in Agriculture Index (WEAI) जैसे पैरामीटर के ज़रिए ये आंकड़ा किया जाता है कि महिलाएं खेती में सिर्फ कितनी कमा रही हैं नहीं, बल्कि कितने फैसला ले पा रही हैं, संसाधनों पर कितना नियंत्रण है, और उनका समय का उपयोग कैसा है.

सरकार भी साथ, जमीन भी साथ

महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना (MKSP) जैसी सरकारी योजनाएं और राज्य स्तरीय महिला-एफपीओ सहायता कार्यक्रम, इस बदलाव को नीति स्तर से समर्थन दे रहे हैं. लेकिन असली परिवर्तन वहीं हो रहा है जहां समुन्नति, MSSRF, SEWA और BAIF जैसे संगठन एक-एक गांव में, एक-एक महिला के साथ खड़े हो रहे हैं.