ग्रेजुएट किसान ने किया कमाल! 50 दिन में कमाया ₹1.30 लाख का नेट मुनाफा, जानें क्या है यह 'सफलता का मॉडल'

जानें युवा किसान की सफलता की कहानी, जिन्होंने सरकारी अनुदान और आधुनिक तकनीकों से खीरे की खेती कर कमाया ₹1.30 लाख का नेट मुनाफा.
ग्रेजुएट किसान ने किया कमाल! 50 दिन में कमाया ₹1.30 लाख का नेट मुनाफा, जानें क्या है यह 'सफलता का मॉडल'

शेडनेट के माध्यम से खीरे का उत्पादन ऑफ-सीजन में भी लिया जा सकता है. (प्रतीकात्मक फोटो: AI)

Success Story: पारंपरिक खेती से हटकर अब किसानों का रुझान तेजी से नकदी फसलों की ओर बढ़ रहा है, जहां कम समय में बेहतर मुनाफा मिलने की संभावना रहती है. इसी बदलाव की मिसाल छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले के युवा किसान मनीष मिश्रा हैं, जिन्होंने आधुनिक तकनीकों के साथ खीरा की खेती अपनाकर अपनी आय को लाखों रुपये तक पहुंचा दिया है.

छत्तीसगढ़ मुंगेली जिले के युवा किसान मनीष मिश्रा ने पारंपरिक खेती छोड़ बागवानी को अपनाया. राष्ट्रीय बागवानी मिशन (National Horticulture Mission) के तहत मिली सहायता और शेडनेट हाउस, ड्रिप इरिगेशन व मल्चिंग जैसी तकनीकों का उपयोग कर उन्होंने मात्र 1200 वर्ग मीटर में खीरे की खेती से ₹2 लाख की शानदार कमाई की है.

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राष्ट्रीय बागवानी मिशन क्या है?

  • राष्ट्रीय बागवानी मिशन 'मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर' (MIDH) का एक हिस्सा है.
  • यह योजना किसानों को पारंपरिक फसलों से हटाकर ज्यादा मुनाफा देने वाली बागवानी फसलों की ओर प्रोत्साहित करती है.
  • इसमें सरकार किसानों को पौधरोपण, नर्सरी तैयार करने, ड्रिप इरिगेशन और कोल्ड स्टोरेज बनाने के लिए भारी सब्सिडी देती है.

किसान ने खेती में कौन सा बड़ा बदलाव किया?

छत्तीसगढ़ कृषि विभाग के मुताबिक मनीष ग्रेजुएट है. उन्होंने परंपरागत खेती के बजाय 'स्मार्ट फार्मिंग' को चुना. उन्होंने अपनी 2 हेक्टेयर भूमि में से केवल 1200 वर्ग मीटर के हिस्से में आधुनिक तकनीकों का सेटअप लगाया. उन्होंने इसे एक शौक नहीं, बल्कि एक प्रॉफिटेबल बिजनेस की तरह शुरू किया.

सरकार से क्या सहयोग मिला?

मनीष को राष्ट्रीय बागवानी मिशन योजना के तहत विभागीय मार्गदर्शन के साथ-साथ ₹50,000 का अनुदान हासिल हुआ. इस आर्थिक सहायता ने उनकी शुरुआती लागत को काफी कम कर दिया, जिससे जोखिम कम हो गया.

उत्पादन और बिक्री का गणित क्या रहा?

  • उन्नत तकनीकों के कारण युवा किसान को प्रति एकड़ लगभग 175 क्विंटल का बंपर उत्पादन मिला.
  • बाजार में उन्होंने इसे ₹8 से ₹12 प्रति किलो की दर से बेचा.
  • कुल आय ₹2 लाख हुई.
  • इसमें से ₹70,000 की लागत घटाने के बाद उन्हें ₹1.30 लाख का नेट मुनाफा मिला.
डीटेल
किसान का नाममनीष मिश्रा
क्षेत्रफल1200 वर्ग मीटर
कुल उत्पादन175 क्विंटल (प्रति एकड़ दर)
सरकारी अनुदान₹50,000
कुल आय₹2,00,000
नेट मुनाफा₹1,30,000

डिग्री नहीं, तकनीक देगी पैसा

मनीष मिश्रा की कहानी यह साबित करती है कि खेती अब केवल अनपढ़ों का काम नहीं है. एक ग्रेजुएट युवा अगर सरकारी योजनाओं और आधुनिक संसाधनों का मेल बिठा ले, तो वह एक एयर-कंडीशनर ऑफिस की नौकरी से ज्यादा कमाई अपने खेत में कर सकता है. अगर आपके पास भी कम जमीन है, तो खीरा और बागवानी फसलें आपके लिए 'कैश मशीन' बन सकती हैं.

क्या मिली सीख?

कम जमीन, अधिक आय: मनीष ने दिखा दिया कि जरूरी नहीं कि आपके पास 10 एकड़ जमीन हो. 1200 वर्ग मीटर में भी लाखों का मुनाफा संभव है.

सटीक खेती: ड्रिप और मल्चिंग के आने से पानी की बर्बादी कम होगी और खाद का सटीक उपयोग होगा, जिससे मिट्टी की सेहत बनी रहेगी.

युवाओं का रुझान: इस तरह की सफलता की खबरें ग्रामीण युवाओं को शहरों की ओर पलायन करने से रोकेंगी और उन्हें स्वरोजगार के लिए प्रेरित करेंगी.

आपको क्या करना चाहिए?

योजना को समझें: अपने जिले के उद्यानिकी विभाग में जाकर 'राष्ट्रीय बागवानी मिशन' की जानकारी लें.

तकनीक अपनाएं: खुली खेती के बजाय शेडनेट या पॉलीहाउस पर विचार करें, क्योंकि यहां फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है और दाम अच्छे मिलते हैं.

बाजार का अध्ययन: मनीष ने 8 से 12 रुपए के रेट पर माल बेचा. आप भी अपनी फसल बोने से पहले स्थानीय मंडियों और रिटेल चेन से संपर्क करें.

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आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)

Q1. मनीष मिश्रा ने किस फसल से सफलता हासिल की?

उन्होंने खीरे की उन्नत खेती से शानदार मुनाफा कमाया.

Q2. कुल कितने क्षेत्र में खेती की गई?

केवल 1200 वर्ग मीटर क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों के साथ खेती की गई.

Q3. इस खेती से कितनी कमाई हुई?

कुल ₹2 लाख की आय हुई, जिसमें से करीब ₹1.30 लाख का नेट मुनाफा मिला.

Q4. खेती में कौन-कौन सी आधुनिक तकनीकें अपनाई गईं?

ड्रिप इरिगेशन, प्लास्टिक मल्चिंग और शेडनेट हाउस का इस्तेमाल किया गया.

Q5. सरकार से कितना अनुदान मिला?

राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत करीब ₹50,000 की सब्सिडी मिली.

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