Bajra Cultivation: बाजरा खरीफ के मौसम में बोई जाने वाली राजस्थान की प्रमुख फसल है. राजस्थान में बाजरा मनुष्य के भोजन और पशुओं के हरे व सूखे चारे के लिए महत्वपूर्ण फसल हैं. बाजरा की बुवाई का उपयुक्त समय मध्य जून से जुलाई के तीसरे हफ्ते तक है.
1/6फसल उत्पादन में बढ़ोतरी के लिए उन्नत शष्य क्रियाओं के साथ-साथ फसल को कीटों व रोगों से बचाना भी बहुत जरूरी है. बाजरा की फसल में तुलासिता, हरितबाली रोग, अरगट रोग तथा दीमक व सफेद लटकीट आदि का प्रकोप होता हैं. बाजरा की फसल को कीटों व रोगों से बचाने के लिए विभागीय सिफारिशों के अनुसार रोग प्रतिरोधक किस्मों का उपयोग करें. साथ ही बीजोपचार करें.
2/6किसान भाई बीजों को एफ आई आर क्रम में अर्थात फफूंद नाशी, कीटनाशी से बीजों को उपचारित करने के बाद ही जीवाणु कल्चर से बीजों को उपचारित करें और बीजोपचार करते समय हाथों में दस्ताने, मुंह पर मास्क और पूरे कपड़े पहने.
3/6इन रोगों से बचाव के लिए बीजोपचार व अन्य विभागीय सिफारिशों का उपयोग करें. तुलासिता रोग एक फफूंद जनित रोग है जिसे राजस्थान में हरित बाली या जोगिया रोग आदि नामों से भी जाना जाता है. इस रोग से बचाव हेतु रोग प्रतिरोधी किस्मों जैसे-एचएचबी 67 इम्प्रूवड,, राज 171, आरएचबी 177, आरएचबी 173, आरएचबी 121, आरएचबी 223, आरएचबी 233, आरएचबी 234, आरएचबी 228 आदि का उपयोग करें साथ ही बीजों को बुआई से पूर्व 6 ग्राम एप्रोन एसडी 35 प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करके बुवाई करें.
4/6अरगट रोग से बचाव के लिए बीजों को नमक के 20 फीसदी घोल (एक किलो नमक 5 लीटर पानी) में लगभग 5 मिनट तक डुबो कर हिलाएं. तैरते हुए हल्के बीजों एवं कचरे को निकालकर जला देवें और बाकी बचे हुए बीजों को साफ पानी से धोकर, अच्छी प्रकार से छाया में सुखा कर 3 ग्राम थाइरम प्रतिकिलो बीज की दर से उपचारित करके बुवाई करें.
5/6बाजरे की फसल को दीमक, सफेद लट, तना मक्खी व तनाछेदक से बचाने के लिए बुवाई से पहले बीजों को इमिडाक्लोप्रिड 600 एफ एस की 8.75 मि.ली अथवा क्लोथायोनिडिन 50 डब्ल्यू.डी.जी. 7.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से जरूरत के अनुसार पानी में घोल बनाकर बीजों पर समान रुप से छिड़काव कर उपचारित कर छाया में सुखाने के बाद 2 घंटे के अन्दर ही बुवाई करें.
6/6बुवाई से पहले बीजों को एजोटोबेक्टर जीवाणु कल्चर से उपचारित करने से फसल की पैदावार में बढ़ोतरी होती हैं. बीजों को एजोटोबेक्टर जीवाणु कल्चर से उपचारित करने के लिए 500 मिली लीटर पानी में 250 ग्राम गुड़ को गर्म करके घोल बनाए और घोल के ठंडा होने पर इसमें 600 ग्राम जीवाणु कल्चर मिलाएं. इस मिश्रण से एक हैक्टेयर क्षेत्र में बोए जाने वाले बीज को इस प्रकार मिलाएं कि सभी बीजों पर इसकी एक समान परत चढ़ जाएं. इसके बाद इन बीजों को छाया में सुखाकर शीघ्र बोने के काम में लाएं.