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पिपरमिंट की खेती से होगी ताबड़तोड़ कमाई
अगर आप भी खेती से अच्छा मुनाफा कमाना चाहते हैं और कम समय में बड़ा रिटर्न चाहते हैं, तो मेंथा यानी पिपरमिंट की खेती आपके लिए बेहतरीन मौका हो सकती है. उत्तर भारत के किसान इस हरे-भरे पौधे की खेती से सिर्फ 3 से 4 महीने में 2 से 3 गुना तक मुनाफा कमा रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी खासियत है कम लागत, कम समय और बाजार में लगातार बनी रहने वाली मांग.
मेंथा की सबसे दमदार किस्म
मेंथा की खेती के लिए सबसे लोकप्रिय और तेल में भरपूर किस्म है Mentha arvensis, जिसे आमतौर पर जापानी पिपरमिंट कहा जाता है. इसकी खास बात है कि इसमें तेल की मात्रा अधिक होती है, जिससे किसानों को ज्यादा कमाई होती है.
मेंथा की खेती बीज से नहीं बल्कि ‘जवार’ यानी रेनर (Stolon) से की जाती है. एक हेक्टेयर जमीन में लगभग 4 क्विंटल जवार की जरूरत होती है. ये जवार जमीन में आसानी से फैलते हैं और नए पौधे तैयार करते हैं.
कैसे तैयार करें खेत
खेत की तैयारी सबसे जरूरी स्टेप है. मिट्टी को अच्छी तरह जुताई कर खरपतवार से साफ करें और उसमें 20 टन गोबर की खाद (FYM) मिलाएं. इसके बाद खेत में पानी निकासी की उचित व्यवस्था के साथ क्यारियां तैयार करें ताकि सिंचाई आसान हो सके.
कब और कैसे करें बुवाई
मेंथा की बुवाई फरवरी से मार्च के बीच होती है. जवार को 5-6 सेमी गहरे और 40-60 सेमी की दूरी पर लगाना चाहिए. बुवाई के तुरंत बाद खेत में हल्की सिंचाई करें ताकि जवार जल्दी अंकुरित हो सकें.
गर्मी के मौसम में मेंथा को लगभग 10 बार पानी देना होता है, हर 10-12 दिन के अंतराल पर. लेकिन ध्यान रहे कि खेत में पानी जमा न हो, वरना जड़ें सड़ सकती हैं. खेत में नमी बनी रहनी चाहिए लेकिन जलभराव से बचना चाहिए.
खाद और पोषण व्यवस्था
मेंथा की अच्छी बढ़त के लिए NPK (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश) का संतुलित इस्तेमाल जरूरी है. नाइट्रोजन को दो या तीन बार में देने से पौधे की ग्रोथ बेहतर होती है. जैविक खाद जैसे नीम खली, वर्मीकम्पोस्ट से भी फायदा होता है.
गांठें, कीड़े और सफेद मक्खी से करें बचाव
खरपतवार को हटाने के लिए प्री-और पोस्ट-इमर्जेंस हर्बीसाइड का इस्तेमाल किया जाता है. पत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों जैसे बोरर और सफेद मक्खी से बचाने के लिए कम जहरीले कीटनाशकों का प्रयोग करना बेहतर होता है, ताकि तेल की गुणवत्ता बनी रहे.
कटाई कब और कैसे करें
मेंथा की फसल 100-120 दिनों में तैयार हो जाती है. जैसे ही पौधे में फूल आने शुरू होते हैं, उसी समय कटाई करनी चाहिए क्योंकि तभी तेल की मात्रा सबसे ज्यादा होती है. कटाई के लिए धूप वाले दिन का चुनाव करें ताकि पत्तियों में मौजूद मेंथॉल का स्तर बना रहे.
तेल निकालने की प्रक्रिया
कटाई के बाद पूरे पौधे को (डंठल और पत्तियों सहित) भाप या पानी की डिस्टिलेशन तकनीक से तेल निकाला जाता है. यह तेल मिट्टी के बर्तनों में स्टोर किया जाता है ताकि उसकी खुशबू बनी रहे और लंबे समय तक खराब न हो.
जानिए मुनाफे का गणित
एक एकड़ मेंथा की खेती से औसतन 50 लीटर तेल निकलता है. बाजार में मेंथा तेल की कीमत 1,500 से 2,000 रुपये प्रति लीटर तक होती है. यानी एक एकड़ से करीब 75,000 रुपये तक की आय हो सकती है. अगर खेती पर कुल खर्च 30 से 40 हजार रुपये आता है, तो मुनाफा 2 से 3 गुना तक पहुंच सकता है, वो भी सिर्फ एक सीजन यानी 3 से 4 महीने में.