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जी न्यूज के स्टिंग ऑपरेशन 'ऑपरेशन किसान' ने ₹20,000 करोड़ के यूरिया घोटाले का खुलासा किया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार हर साल करीब ₹2 लाख करोड़ की सब्सिडी खाद पर देती है ताकि किसानों की लागत कम हो सके. लेकिन जी न्यूज की पड़ताल में सामने आया कि इस सब्सिडी का लाभ किसानों के बजाय प्लाईवुड बनाने वाली नामचीन कंपनियां उठा रही हैं.
जी न्यूज की स्पेशल इनवेस्टिगेशन टीम (SIT) ने 'ऑपरेशन किसान' के जरिए देश के कृषि क्षेत्र में हो रही एक बहुत बड़ी धांधली का पर्दाफाश किया है. यह खुलासा उस यूरिया खाद से जुड़ा है, जो सरकार द्वारा भारी सब्सिडी पर केवल किसानों के लिए उपलब्ध कराई जाती है, लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा संगठित माफिया के जरिए प्लाईवुड फैक्ट्रियों तक पहुंच रहा है. यहां इस पूरे मामले और खुलासे की विस्तृत रिपोर्ट दी गई है:
यूरिया की चोरी के पीछे सबसे बड़ा कारण इसकी कीमत में मौजूद भारी अंतर है:
असली कीमत: एक बोरी यूरिया की वास्तविक लागत लगभग ₹3,800 होती है.
किसानों के लिए दाम: सब्सिडी के बाद यह किसानों को मात्र ₹266 में मिलती है (करीब ₹6/किलो).
इंडस्ट्रियल यूरिया (Technical Grade): फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होने वाली कॉमर्शियल यूरिया की कीमत ₹80/किलो तक होती है.
फायदा: कंपनियां किसानों वाली सस्ती यूरिया खरीदकर अपना मुनाफा कई गुना बढ़ा रही हैं.
यमुनानगर (हरियाणा), जो देश का सबसे बड़ा प्लाईवुड हब है, वहां जी न्यूज की टीम ने खरीदार बनकर इस नेक्सस का पर्दाफाश किया. यह चोरी एक संगठित नेटवर्क के जरिए होती है जिसमें शामिल हैं:
डीलर और दलाल: जो सरकारी स्टॉक से यूरिया को डायवर्ट करते हैं.
ट्रांसपोर्टर: जो रात के अंधेरे में मिनी ट्रकों के जरिए पीली बोरियों (किसानों की खाद) को फैक्ट्रियों तक पहुंचाते हैं.
फैक्ट्री मालिक: जो अवैध रूप से इसे ग्लू (गोंद) और बोर्ड बनाने में इस्तेमाल करते हैं.
खुफिया कैमरे (Sting) में दलालों ने साफ स्वीकार किया कि प्रशासन और विभागों के साथ उनकी "सेटिंग" होती है. दलालों के मुताबिक, अगर चंडीगढ़ या दिल्ली से कोई बड़ी टीम छापेमारी के लिए आती भी है, तो उन्हें पहले ही जानकारी मिल जाती है और सब कुछ मैनेज कर लिया जाता है.
राजस्व की हानि: यूरिया चोरी से सरकार को सालाना करीब ₹20,000 करोड़ का नुकसान हो रहा है.
GST की चोरी: अवैध खरीद-फरोख्त के कारण सरकार को मिलने वाले टैक्स का बड़ा हिस्सा मारा जा रहा है.
किसानों पर असर: यूरिया की किल्लत होने पर किसानों को घंटों लाइन में लगना पड़ता है और उनकी मेहनत की खाद फैक्ट्रियों में जलती है.
'ऑपरेशन किसान' ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कागजों पर जो सब्सिडी किसानों के लिए है, वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है. यह केवल एक आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि देश के अन्नदाता के साथ विश्वासघात है. जी न्यूज की टीम इस जांच के दूसरे भाग में उन बड़ी कंपनियों और चेहरों को बेनकाब करेगी जो इस ₹20,000 करोड़ के घोटाले के असली मास्टरमाइंड हैं.
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आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1 किसानों के यूरिया और कॉमर्शियल यूरिया की पहचान क्या है?
किसानों के लिए सब्सिडी वाला यूरिया 'पीले पैकेट' में आता है, जबकि कॉमर्शियल यूरिया 'सफेद पैकेट' में बेचा जाता है.
Q2 प्लाईवुड फैक्ट्रियों में यूरिया का क्या काम है?
प्लाईवुड, एमडीएफ (MDF) और बोर्ड बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले 'ग्लू' (गोंद) के निर्माण में यूरिया एक मुख्य सामग्री है.
Q3 सरकार खाद पर कितनी सब्सिडी देती है?
भारत सरकार सालाना करीब ₹2 लाख करोड़ की सब्सिडी देती है ताकि कृषि लागत कम रहे.
Q4 इस घोटाले से सरकार को कितना नुकसान हो रहा है?
अनुमान के मुताबिक, यूरिया की इस अवैध डायवर्जन से हर साल करीब ₹20,000 करोड़ का नुकसान हो रहा है.
Q5 क्या किसान सीधे शिकायत कर सकते हैं?
हां, किसान उर्वरक विभाग के टोल-फ्री नंबर या स्थानीय जिला कृषि अधिकारी से खाद की कालाबाजारी की शिकायत कर सकते हैं.