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Coloured Cotton Cultivation: भारत में प्राकृतिक रूप से रंगीन कपास की खेती वैश्विक मांग और दशकों से चल रहे सरकारी शोध प्रयासों के बावजूद मुश्किल दौर से गुजर रही है. यह बिजनेस 1940 के दशक में तेजी से बढ़ रहा था. हालांकि, इस समय यह विशेष फसल कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में केवल 200 एकड़ में उगाई जाती है.
इसकी कीमत 240 रुपये प्रति किलोग्राम है, जो सामान्य कपास (160 रुपये प्रति किलोग्राम) से 50% अधिक है. किसान कम पैदावार के कारण रंगीन कपास की खेती करने से हिचकिचा रहे हैं.
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आईसीएआर-केंद्रीय कपास प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान (ICRCOT) के प्रमुख वैज्ञानिक अशोक कुमार ने बताया, हल्के भूरे रंग के कपास की उत्पादकता बहुत कम यानी 1.5-2 क्विंटल प्रति एकड़ है, जबकि सामान्य कपास की उत्पादकता 6-7 क्विंटल प्रति एकड़ है. इसलिए किसान इस फसल की अधिक खेती नहीं करते हैं. कृषि वैज्ञानिक इस समय हल्के भूरे रंग के कपास पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं.
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भारत में रंगीन कपास की खेती 2500 ईसा पूर्व से हो रही है. इसमें लाल, खाकी और भूरी किस्में शामिल थीं. हरित क्रांति के दौरान उच्च उपज देने वाली सफेद कपास की किस्मों पर जोर देने से रंगीन कपास हाशिये पर चला गया. रंगीन कपास (Colour Cotton) के पर्यावरणीय फायदा महत्वपूर्ण हैं.
पारंपरिक कपास रंगाई में प्रति मीटर कपड़े के लिए लगभग 150 लीटर पानी की जरूरत होती है, जबकि प्राकृतिक रूप से रंगीन कपास इस जरूरत को खत्म कर देता है. साथ ही विषाक्त अपशिष्ट निपटान लागत में 50% तक की कमी आ सकती है.
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कुमार ने कहा, प्राकृतिक रूप से रंगीन कपास में निर्यात की अपार संभावनाएं हैं. उत्पादन और मूल्यवर्धन बढ़ाने के लिए और अधिक सरकारी सहायता की जरूरत है. उन्होंने बताया कि उत्पादन कम होने और बाजार की कमी के कारण कोई भी उन्नत किस्में विकसित नहीं कर पा रहा है.
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पर्यावरण के प्रति जागरूक ब्रांड, खासकर यूरोप, अमेरिका और जापान में रंगीन कपास की मांग बढ़ रही है. इस क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया और चीन पारंपरिक प्रजनन और आनुवंशिक इंजीनियरिंग का उपयोग करके अनुसंधान में भारी निवेश कर रहे हैं.