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ईरान में जारी राजनीतिक अस्थिरता का सीधा असर अब भारत के बासमती चावल मार्केट पर होता दिखने लगा है.असल में ईरान भारतीय बासमती का बड़ा खरीदार रहा है, लेकिन वहां बिजनेस रुकने और पेमेंट में देरी से मांग कमजोर पड़ती दिख रही है. बीते एक हफ्ते में घरेलू बाजार में बासमती चावल के दाम तेजी से गिरे हैं. कुछ प्रमुख बासमती किस्मों की कीमतें करीब 5 रुपये प्रति किलो तक नीचे आ गई हैं, जिससे किसानों और कारोबारियों दोनों की चिंता बढ़ गई है.लेकिन कभी आपने सोचा है कि ये मशहूर बासमती चावल आखिर किसान उगाता कैसे है.
जी हां दुनिया भर में अपनी खुशबू और लंबे दानों के लिए फेमस बासमती चावल की डिमांड कभी कम नहीं होती है. लेकिन क्या आपने सोचा है कि जो बासमती आपकी थाली तक पहुंचता है, उसे किसान किस कड़ी मेहनत से उगाते हैं? और क्या वाकई इसमें आम धान के मुकाबले ज्यादा कमाई है? तो बिना देरी किए आइए, बासमती की खेती के उस सफर पर चलते हैं जो खेत से शुरू होकर ग्लोबल मार्केट तक जाता है.
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बासमती की खेती नॉर्मल छोटे दानों वाले धान जैसी ही दिखती है, लेकिन इसकी 'नजाकत' इसे अलग बनाती है.
बीज का चयन: सबसे पहले पूसा बासमती 1121, 1509 या 1718 जैसी उन्नत किस्मों को चुनें
नर्सरी तैयार करना (जून-जुलाई): पहले छोटे से हिस्से में पौध तैयार की जाती है.जब पौधे 25-30 दिन के हो जाते हैं, तब इन्हें खेत में लगाते हैं.
रोपाई और पानी: बासमती को बहुत ज्यादा गहरे पानी की जरूरत नहीं होती है, लेकिन नमी बनी रहनी चाहिए.वैसे पकने के वक्त (सितंबर-अक्टूबर) ठंडी रातों और साफ आसमान से इसमें बेहतरीन खुशबू पैदा होती है. बता दें कि इसकी कटाई बड़ी सावधानी से की जाती है ताकि दाने टूटें नहीं.
| खूबी | बासमती चावल | सामान्य चावल |
|---|---|---|
| लंबाई | पकने के बाद दाना अपनी लंबाई से दोगुना हो जाता है | दाना फूलता है, लेकिन ज्यादा लंबा नहीं होता |
| खुशबू | इसमें नैचुरल सुगंध (अरोमा) होती है | इसमें कोई खास खुशबू नहीं होती |
| टेक्सचर | दाना खिला-खिला और नॉन-स्टिकी रहता है | पकने के बाद अक्सर चिपक जाता है |
| GI टैग | GI टैग मिला है | सामान्य धान कहीं भी उगाया जा सकता है |
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बासमती की खेती में लागत नॉर्मल धान से थोड़ी ज्यादा हो सकती है, लेकिन इसका मार्केट रेट गेम बदल देता हैय
लागत: एक एकड़ में खाद, बीज, मजदूरी और सिंचाई मिलाकर मान लेते हैं करीब 25,000 से 30,000 रुपये का खर्च होगा.
पैदावार: एक एकड़ में औसतन 18 से 22 क्विंटल तक पैदावार हो सकती है.
कमाई: बासमती का रेट अक्सर 3,500 से 5,000 रुपये प्रति क्विंटल (किस्म के आधार पर) हो जाता है.
टोटल मुनाफा: सब खर्च काटकर एक किसान एक सीजन में प्रति एकड़ करीब-करीब 40,000 से 60,000 रुपये तक का टोटल मुनाफा कमा सकता है, जो सामान्य धान के मुकाबले ज्यादा होता है.

आजकल ऑर्गेनिक बासमती और नई किस्मों (जैसे पूसा 1847) की भारी मांग है. जी हां किसान अब केवल खेती नहीं कर रहे, बल्कि अपनी उपज का सीधा एक्सपोर्ट या ब्रांडिंग करके हजारों लाखों में खेल रहे हैं.
1. अगर आप कीटनाशकों का यूज कम करेंगे, तो आपका चावल विदेशों में ऊंचे दामों पर बिक सकता है.
2. बुवाई से पहले बीजों का उपचार जरूर करें ताकि फसल बीमारियों से बची रहे.
3. इसके दाने में जब 18-20% नमी हो, तभी कटाई करें ताकि दाना टूटे नहींय
किसान के लिए बासमती की खेती केवल फसल उगाना नहीं, बल्कि एक कला होता है. तो अगर सही तकनीक और सही मार्केट की जानकारी हो, तो यह किसानों के लिए सच में अमीर बनाने वाली खेती बन सकता है.
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खबर से जुड़े FAQs
1. बासमती चावल को खास क्यों माना जाता है?
इसकी प्राकृतिक खुशबू, लंबे दाने और पकने पर नॉन-स्टिकी टेक्सचर इसे खास बनाते हैं.
2. बासमती और नॉर्मल चावल में सबसे बड़ा फर्क क्या है?
बासमती में खुशबू और दाने की लंबाई ज्यादा होती है, जबकि नॉर्मल चावल में यह खूबियां नहीं होतीं.
3. बासमती की खेती कब और कैसे की जाती है?
जून-जुलाई में नर्सरी, 25–30 दिन बाद रोपाई और सितंबर-अक्टूबर में सावधानी से कटाई की जाती है.
4. क्या बासमती की खेती ज्यादा मुनाफेदार है?
हां, लागत थोड़ी ज्यादा होती है लेकिन बाजार भाव ऊंचा होने से मुनाफा ज्यादा मिलता है.
5. बासमती की सबसे ज्यादा मांग कहां रहती है?
ईरान, खाड़ी देश और यूरोप जैसे इंटरनेशनल मार्केट्स में इसकी भारी डिमांड रहती है.
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