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खरीफ सीजन में मक्के की खेती के लिए पारंपरिक तरीके की जगह मेढ़ विधि अपनाने की सलाह. (प्रतीकात्मक फोटो: AI/Chatgpt)
Farming Tips: खरीफ सीजन में मक्का की खेती करने वाले किसानों के लिए मेढ़ विधि (Bed Planting Method) काफी फायदेमंद साबित हो सकती है. बिहार कृषि विभाग के मुताबिक, इस तकनीक से बुवाई करने पर ज्यादा बारिश और जलभराव की स्थिति में भी फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है. साथ ही खेत में पानी की निकासी बेहतर होने से पौधों की ग्रोथ भी अच्छी होती है.
कृषि विभाग के अनुसार किसान बेड प्लांटर मशीन की मदद से खेत में मेड़ बनाकर आसानी से मक्के की बुवाई कर सकते हैं. इससे फसल प्रबंधन आसान होता है और उत्पादन बढ़ने की संभावना रहती है.
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डॉ पंकज तिवारी, कृषि वैज्ञानिक पादप रोग विज्ञान, कृषि विज्ञान केंद्र आमस गया ने बताया कि खरीफ मौसम में मानसून की पहली अच्छी बारिश के बाद जून-जुलाई में बुवाई करना उपयुक्त रहता है.
किसानों को उन्नत किस्मों का चयन करें. क्षेत्र के अनुसार उन्नत/संकर किस्में जैसे-
मेढ़ की चौड़ाई के अनुसार दूरी रखें- पौधे से पौधे की दूरी 20-25 सेमी तथा कतार से कतार लगभग 60-75 सेमी रखें. संकरी मेढ़ पर एक कतार और चौड़ी मेढ़ पर दो कतारें लगाई जा सकती हैं.
बीज की सही मात्रा रखें- मेढ़ पर बुवाई के लिए प्रति गड्ढा 1–2 बीज पर्याप्त रहते हैं. बाद में स्वस्थ पौधा छोड़कर कमजोर पौधे निकाल दें.
खाद एवं उर्वरक प्रबंधन करें- प्रति एकड़ लगभग 50-60 किग्रा यूरिया, 25-30 किग्रा डीएपी और 10-15 किग्रा म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) का प्रयोग फायदेमंद रहता है. साथ में गोबर की सड़ी खाद/कम्पोस्ट का उपयोग करें.
नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग जरूरी- यूरिया की आधी मात्रा बुवाई के समय और बाकी दो बार (घुटना अवस्था और फूल आने से पहले) दें.
खरपतवार नियंत्रण करें- शुरुआती 25–30 दिन खेत को खरपतवार मुक्त रखना जरूरी है ताकि पौधों की बढ़ोतरी अच्छी हो.
कीटों की निगरानी रखें- विशेषकर फॉल आर्मीवर्म, तना छेदक और माहू की नियमित निगरानी करें और प्रारंभिक अवस्था में नियंत्रण करें.
जलभराव से बचाएं- मेढ़ पर मक्का लगाने का फायदा यह है कि जलभराव कम होता है, लेकिन लंबे समय तक सूखा भी न रहने दें.
अतिरिक्त आय का बेहतर विकल्प- धान, अरहर, उड़द या सब्जियों के खेत की मेढ़ पर मक्का लगाने से बिना अतिरिक्त भूमि के अतिरिक्त उत्पादन और आय प्राप्त की जा सकती है.
उन्होंने कहा किसान मेढ़ पर मक्का की वैज्ञानिक ढंग से बुवाई करें, उचित दूरी, संतुलित उर्वरक और उन्नत किस्मों का चयन करें तो कम लागत में अतिरिक्त उत्पादन एवं आय प्राप्त कर सकते हैं.
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मेढ़ विधि से मक्का लगाने से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई करनी चाहिए. जुताई के दौरान प्रति एकड़ 30 किलोग्राम एमओपी (MOP) खेत में डालना चाहिए. इससे मिट्टी में पोटाश की कमी पूरी होती है और पौधों की बढ़वार बेहतर होती है.
कृषि विभाग के मुताबिक, एक एकड़ खेत में मक्का की बुवाई के लिए करीब 10 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है. किसान प्रमाणित और उच्च गुणवत्ता वाले बीज का इस्तेमाल करें तो उत्पादन बेहतर मिल सकता है.
विभाग किसानों को सलाह दे रहा है कि बुवाई के दौरान उर्वरक प्रबंधन पर विशेष ध्यान दें. मक्का की बुवाई करते समय मशीन में प्रति एकड़ 50 किलोग्राम DAP डालना चाहिए. इससे शुरुआती अवस्था में पौधों को जरूरी पोषण मिलता है.
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मक्का की फसल में खरपतवार नियंत्रण बेहद जरूरी माना जाता है. बुवाई के 15 से 20 दिन बाद खरपतवार नियंत्रण के लिए 115 मिलीलीटर टैम्बोट्रिओन (Tembotrione) और 500 ग्राम एट्राजिन (Atrazine) को मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करने की सलाह दी गई है. इससे खेत में खरपतवार नियंत्रण बेहतर होता है और फसल की बढ़वार प्रभावित नहीं होती.

यूरिया का इस्तेमाल तीन चरणों में करना चाहिए.
पहला चरण-
बुवाई के 20-25 दिन बाद 40 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ डालना चाहिए.
दूसरा चरण-
बुवाई के 45-50 दिन बाद 50 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ डालना चाहिए.
तीसरा चरण-
बुवाई के 65-70 दिन बाद 25 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ डालना चाहिए.
विभाग का कहना है कि सही समय पर खाद और उर्वरक देने से मक्का की फसल मजबूत होती है, पौधों की ग्रोथ बेहतर रहती है और उत्पादन में अच्छी बढ़ोतरी हो सकती है.
बारिश के मौसम में जलभराव की समस्या वाले इलाकों के किसानों के लिए मेढ़ विधि से मक्का की बुवाई एक बेहतर विकल्प माना जा रहा है.
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