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(फोटो सोर्स: Pexels)
Pearl Farming: रायसेन में आयोजित 'उन्नत कृषि महोत्सव' में मोती की खेती (Pearl Farming) एक क्रांतिकारी बदलाव के रूप में उभरी है. पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर यह मॉडल किसानों की आय बढ़ाने, रोजगार पैदा करने और कम संसाधनों में ज्यादा कमाई का रास्ता खोल रहा है.
जवाब: बिल्कुल. इसे 'मीठे पानी का मोती पालन' (Freshwater Pearl Culture) कहते हैं. इसके लिए समुद्र की नहीं, बल्कि एक छोटे तालाब या प्लास्टिक टैंक की जरूरत होती है. सीप के अंदर एक 'बीड' या नाभिक डालकर उसे प्राकृतिक प्रक्रिया के जरिए मोती में बदला जाता है.
कम संसाधन में ज्यादा कमाई- यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है.
हां, यह सबसे बड़ा फायदा है. अगर आपके पास पहले से मछली पालन का तालाब है, तो उसी पानी में आप सीप भी डाल सकते हैं. यानी एक ही जगह और एक ही लागत में 'डबल कमाई'.
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केंद्र सरकार PMMSY योजना के जरिए प्रोजेक्ट की कुल लागत पर 50% तक की सब्सिडी देती है. कई राज्यों में इसके लिए ₹5 लाख तक का अनुदान मिलता है. आप अपने जिले के मत्स्य विभाग में इसके लिए आवेदन कर सकते हैं.

हां.
अगर आपके पास पहले से तालाब है, तो लागत और भी कम हो जाती है.
मेले में ये तकनीक भी दिखीं-
ये सभी पानी आधारित खेती को और स्मार्ट और प्रॉफिटेबल बनाती हैं.
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मोती की खेती सिर्फ एक नई तकनीक नहीं, बल्कि खेती का भविष्य बनती जा रही है. कम लागत, ज्यादा मुनाफा और सरकारी सपोर्ट- ये तीनों मिलकर इसे किसानों और युवाओं के लिए एक गेम-चेंजर बना रहे हैं. अगर सही तरीके से अपनाया जाए, तो यह “छोटा तालाब, बड़ा खजाना” साबित हो सकता है.
आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1. मोती की खेती में कितना समय लगता है?
लगभग 12 से 18 महीने.
Q2. क्या इसके लिए समुद्र जरूरी है?
नहीं, तालाब या टैंक में भी संभव है.
Q3. शुरुआती लागत कितनी होती है?
छोटे स्तर पर कम निवेश से शुरू कर सकते हैं.
Q4. क्या सरकार मदद देती है?
हां, PMMSY योजना के तहत सब्सिडी मिलती है.
Q5. क्या यह फुल-टाइम बिजनेस बन सकता है?
हां, सही स्केल और मार्केट के साथ.
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