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वेनेजुएला एक ऐसा देश है जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है. हालांकि, इसके बाद भी यह देश अपनी क्षमता का 1% भी उत्पादन नहीं कर पा रहा. सालों से अमेरिकी पाबंदियों की बेड़ियों में जकड़े वेनेजुएला के लिए अब हवा का रुख बदल रहा है. अमेरिका के कब्जे के बाद वहां के तेल क्षेत्र पर अब नए फॉर्मूले तैयार हो रहे हैं. इसका फायदा अमेरिका के साथ-साथ भारत की कुछ कंपनियों को भी हो सकता है.
ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म जेफरीज का मानना है कि यह स्थिति भारत की दो दिग्गज कंपनियों-रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) और ONGC के लिए किसी जैकपॉट से कम नहीं है. एक तरफ रिलायंस को सस्ता तेल मिलने की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ ONGC का सालों से अटका पैसा वापस आने की आस जगी है. चलिए अब समझते हैं कि आखिर वेनेजुएला का यह पूरा खेल भारत के इन दो दिग्गजों के लिए कैसे मुनाफे की नई इबारत लिख सकता है.
वेनेजुएला के पास 300 बिलियन बैरल से ज्यादा का तेल भंडार है. यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक सऊदी अरब भी इसके सामने दूसरे नंबर पर आता है. लेकिन हकीकत यह है कि जहां दुनिया हर दिन 100 मिलियन बैरल तेल निकालती है, वहां वेनेजुएला मुश्किल से 1 मिलियन बैरल तक ही पहुंच पाता है.
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दरअसल, अमेरिकी पाबंदियों, निवेश की कमी और जर्जर बुनियादी ढांचे की वजह से वेनेजुएला के लिए तेल निकालना मुश्किल हो रहा था . लेकिन, अब डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की नजर इस खजाने पर है. अमेरिका चाहता है कि उसकी बड़ी तेल कंपनियां वेनेजुएला के मैदान में उतरें, उत्पादन बढ़ाएं और ग्लोबल मार्केट में तेल की सप्लाई बढ़ाकर कीमतों को काबू में करें. यहीं से होती है रिलायंस और ONGC की एंट्री.
रिलायंस इंडस्ट्रीज के लिए वेनेजुएला का तेल हमेशा से पसंदीदा रहा है. इसकी वजह है जामनगर रिफाइनरी की बेजोड़ टेक्नोलॉजी. वेनेजुएला का कच्चा तेल काफी भारी और एसिडिक है. इसे साफ करना हर किसी के बस की बात नहीं है. दुनिया की बहुत कम रिफाइनरियां ऐसी हैं जो इस क्वालिटी के तेल को प्रोसेस कर सकें और रिलायंस का जामनगर कॉम्प्लेक्स इसमें माहिर है.
जेफरीज के मुताबिक, अगर अमेरिका की मदद से वेनेजुएला का उत्पादन बढ़ता है, तो रिलायंस को ब्रेंट क्रूड के मुकाबले 5 से 8 डॉलर प्रति बैरल के डिस्काउंट पर तेल मिल सकता है. 2012 में रिलायंस अपनी जरूरत का 20% तेल वेनेजुएला की कंपनी PDVSA से लेता था, जो 2019 में पाबंदियों के बाद बंद हो गया.
बीच में कुछ समय के लिए रियायतें मिलीं, लेकिन 2025 की गर्मियों में ट्रंप प्रशासन की धमकियों के बाद इसे फिर रोकना पड़ा. अब अगर अमेरिका खुद वहां कमान संभालता है, तो रिलायंस फिर से लॉन्ग टर्म के लिए सस्ता तेल सुरक्षित कर पाएगा. इससे कंपनी का ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन (GRM) बढ़ेगा और कैश फ्लो में भारी बढ़ोतरी होगी.
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अगर रिलायंस के लिए यह सस्ते तेल का मामला है, तो ONGC के लिए यह अपनी खोई हुई दौलत वापस पाने की लड़ाई है. ONGC की विदेशी शाखा, ONGC विदेश लिमिटेड (OVL), वेनेजुएला के 'सन क्रिस्टोबाल' प्रोजेक्ट में 40% की हिस्सेदार है.
कहानी में पेच यह है कि सालों से काम करने के बावजूद ONGC को उसका मुनाफा यानी डिविडेंड नहीं मिला है. 2014 तक का ही करीब 536 मिलियन डॉलर बकाया है. अगर बाद के सालों और दूसरे प्रोजेक्ट्स जैसे 'कारबोबो' (जहां ONGC की 11% हिस्सेदारी है) को जोड़ लें, तो यह रकम करीब 1 बिलियन डॉलर तक पहुंच जाती है.
अब तक वेनेजुएला की सरकार ने ऑडिट तक की इजाजत नहीं दी थी. लेकिन अब, जबकि वहां अमेरिका का कंट्रोल बढ़ रहा है, ऐसी उम्मीद है कि तेल की बिक्री से होने वाली कमाई से सबसे पहले पुराने बकाये चुकाए जाएंगे. जेफरीज का कहना है कि अगर 'शेवरॉन मॉडल' के तहत ONGC को वहां काम करने और अपना पैसा वसूलने की इजाजत मिलती है, तो यह कंपनी की बैलेंस शीट के लिए संजीवनी जैसा होगा.
तेल की दुनिया में आजकल 'शेवरॉन मॉडल' की बड़ी चर्चा है. दरअसल, अमेरिकी कंपनी शेवरॉन पहली ऐसी कंपनी थी जिसे पाबंदियों के बावजूद वेनेजुएला में काम करने की खास इजाजत मिली थी. इस मॉडल में विदेशी कंपनी को प्रोजेक्ट के ऑपरेशन, फाइनेंस और तेल बेचने का पूरा कंट्रोल मिल जाता है, भले ही वहां की सरकारी कंपनी PDVSA मेजॉरिटी पार्टनर हो. ONGC भी इसी तर्ज पर वहां काम करना चाहती है ताकि वह अमेरिकी बैंकिंग चैनलों का इस्तेमाल कर सके और अपना पैसा सुरक्षित भारत ला सके.
जेफरीज की रिपोर्ट है कि शॉर्ट टर्म में तो ग्लोबल तेल कीमतों पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि वेनेजुएला का उत्पादन अभी बहुत गिरा हुआ है. लेकिन 2027-28 तक, जब अमेरिकी कंपनियां वहां मोटा निवेश करेंगी, तो दुनिया भर में तेल की सप्लाई बढ़ेगी. अगर OPEC+ देशों ने उत्पादन में कटौती नहीं की, तो कच्चे तेल की कीमतें नीचे आ सकती हैं. सस्ता कच्चा तेल न सिर्फ रिलायंस जैसी कंपनियों के लिए अच्छा है, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी राहत होगा.
हालांकि, कुछ जोखिम भी हैं. अगर रिफाइनिंग मार्जिन गिरते हैं या रिलायंस के नए एनर्जी बिजनेस में ज्यादा पैसा खर्च होता है, तो दिक्कत आ सकती है. वहीं ONGC के लिए कच्चे तेल की गिरती कीमतें और उत्पादन में देरी जोखिम भरे हो सकते हैं.
Q 1: वेनेजुएला के तेल संकट का रिलायंस पर क्या असर होगा?
A: रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी वेनेजुएला के भारी और एसिडिक तेल को प्रोसेस करने के लिए बेस्ट है. अमेरिका के दखल से रिलायंस को फिर से 5-8 डॉलर प्रति बैरल के डिस्काउंट पर तेल मिल सकता है, जिससे कंपनी का मुनाफा काफी बढ़ जाएगा.
Q 2: ONGC का वेनेजुएला में कितना पैसा फंसा हुआ है?
A: ONGC का सन क्रिस्टोबाल प्रोजेक्ट से लगभग 500 मिलियन डॉलर का डिविडेंड काफी समय से बकाया है. अगर अन्य प्रोजेक्ट्स और हाल के वर्षों को जोड़ें, तो यह कुल रकम लगभग 1 बिलियन डॉलर के करीब पहुंचती है.
Q 3: क्या वेनेजुएला के तेल से दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा?
A: जेफरीज के अनुसार, तुरंत तो कोई बड़ा असर नहीं होगा, लेकिन 2027-28 तक जब उत्पादन बढ़ेगा, तो ग्लोबल मार्केट में तेल की कीमतें गिर सकती हैं, जिसका फायदा आम आदमी को मिल सकता है.
Q 4: 'शेवरॉन मॉडल' क्या है और ONGC इसे क्यों चाहती है?
A: यह एक खास लाइसेंसिंग मॉडल है जिसके तहत विदेशी कंपनियां पाबंदियों के बावजूद वेनेजुएला में ऑपरेशन और फाइनेंस पर पूरा कंट्रोल रख सकती हैं. ONGC इसी मॉडल के जरिए अपना बकाया पैसा वापस पाना चाहती है.
Q 5: भारत के लिए वेनेजुएला का तेल क्यों महत्वपूर्ण है?
A: भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल आयात करता है. वेनेजुएला से सप्लाई शुरू होने पर भारत की रूस और खाड़ी देशों पर निर्भरता कम होगी और उसे अपनी 'एनर्जी बास्केट' को और भी ज्यादा मजबूत करने का मौका मिलेगा.