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मंदी के शोर के बीच टाटा स्टील का धमाका
Tata Steel Q3 FY26 Results: टाटा स्टील ने दिसंबर तिमाही के जो आंकड़े पेश किए हैं, वे शेयर बाजार के जानकारों और निवेशकों के लिए एक बड़ी कहानी कह रहे हैं. एक तरफ जहां भारत में कंपनी का सिक्का जमकर चल रहा है, वहीं सात समंदर पार यूरोप का बाजार अब भी कंपनी के पसीने छुड़ा रहा है.
अगर हम पिछले साल की इसी तिमाही से तुलना करें, तो मुनाफे की रफ्तार देखकर आप हैरान रह जाएंगे. लेकिन जैसे ही हम इसकी तुलना पिछली तिमाही (सितंबर) से करते हैं, तो तस्वीर थोड़ी धुंधली नजर आने लगती है.
सबसे पहले बात करते हैं उस नंबर की, जिसकी सबसे ज्यादा चर्चा है. टाटा स्टील का नेट प्रॉफिट (शुद्ध मुनाफा) इस बार 2,689 करोड़ रुपये रहा है. आपको जानकर ताज्जुब होगा कि पिछले साल इसी समय यह आंकड़ा महज 327 करोड़ रुपये था. यानी एक साल में मुनाफा करीब आठ गुना बढ़ गया.
लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि सितंबर तिमाही में कंपनी ने 3,102 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था. इसका मतलब है कि तिमाही आधार पर मुनाफे में 13% की कमी आई है. इस गिरावट की बड़ी वजह मार्जिन पर पड़ा दबाव और विदेशी ऑपरेशंस में चल रही खींचतान है.
दिसंबर तिमाही में टाटा स्टील की कुल कमाई (रेवेन्यू) 57,002 करोड़ रुपये रही. साल भर पहले यह 53,648 करोड़ रुपये थी, यानी सालाना आधार पर बढ़त बरकरार है. पर अगर हम इसकी तुलना सितंबर तिमाही के 58,689 करोड़ रुपये से करें, तो यहां भी थोड़ी सुस्ती दिखती है. इसकी मुख्य वजह विदेशी बाजारों में वॉल्यूम का कम होना और कीमतों में आई नरमी है. भारत में मांग स्थिर रहने की वजह से कंपनी को बड़ा सहारा मिला है.
किसी भी कंपनी की सेहत उसके EBITDA (कामकाजी मुनाफे) से पता चलती है. इस बार टाटा स्टील का ऑपरेटिंग मुनाफा 8,309 करोड़ रुपये रहा, जो सितंबर तिमाही (9,106 करोड़ रुपये) से कम है. ऑपरेटिंग मार्जिन भी पिछली तिमाही के 15.5% से गिरकर 14.6% पर आ गया है. हालांकि, अगर हम इसे पिछले साल के 11% मार्जिन से देखें, तो कंपनी ने अपनी लागत पर अच्छा काबू पाया है और रिकवरी की राह पर है.
टाटा स्टील की इस पूरी कहानी के दो मुख्य किरदार हैं - भारत और यूरोप.
टीम इंडिया का जलवा: टाटा स्टील इंडिया ग्रुप का असली पावरहाउस साबित हुआ है. भारत से होने वाला रेवेन्यू 35,578 करोड़ रुपये रहा. नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड (NINL) ने भी अपनी परफॉर्मेंस सुधारी है और 351 करोड़ रुपये का कामकाजी मुनाफा कमाया है. भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ते खर्च ने स्टील की मांग को बनाए रखा है.
यूरोप की चुनौती: नीदरलैंड के कारोबार से 570 करोड़ रुपये का EBITDA तो मिला, लेकिन यह पिछली तिमाही से काफी कम है. वहीं, टाटा स्टील यूके (UK) अब भी कंपनी के लिए बड़ा बोझ बना हुआ है. वहां 742 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है. महंगी बिजली, कम डिमांड और पुराने प्लांट को नए तरीके से अपडेट करने का खर्च कंपनी पर भारी पड़ रहा है.
कंपनी ने अपनी लागत को कंट्रोल करने की पूरी कोशिश की है. कच्चे माल की कीमतें कम होने से थोड़ी राहत तो मिली, लेकिन कर्मचारियों का खर्च और मशीनों की घिसाई (Depreciation) का खर्च बढ़ गया है. अच्छी बात यह है कि कंपनी का कर्ज (Debt) कंट्रोल में है. नेट डेट-टू-इक्विटी रेशियो 0.84 पर बना हुआ है, जो दिखाता है कि कंपनी पर कर्ज का बोझ फिलहाल सीमा के भीतर है.
टाटा स्टील का मैनेजमेंट फिलहाल फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है. उनका कहना है कि यूरोप में हालात अभी चुनौतीपूर्ण बने रह सकते हैं, लेकिन भारत में मांग मजबूत रहने की उम्मीद है. कंपनी का पूरा फोकस अब अपनी कार्यक्षमता बढ़ाने और यूके व नीदरलैंड में चल रहे बदलावों को तेजी से पूरा करने पर है. कंपनी को भरोसा है कि मध्यम अवधि में विदेशी कारोबार में भी सुधार देखने को मिलेगा.