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काॅलेज की दोस्ती, काॅरपोरेट का एक्सपीरिएंस और कुछ बड़ा करने का सपना. कुछ ऐसे ही शुरू हुआ था फैशनियर. जो आगे चलकर बना मीशो. जी हां वही मीशो जिसका नाम 2021 की यूनिकॉर्न लिस्ट में शुमार था. IIT दिल्ली के दो स्टूडेंट्स - विदित आत्रेय और संजीव बरनवाल ने 24 साल की उम्र में ही अपनी अच्छी खासी काॅरपोरेट नौकरी छोड़ दी. क्योंकि वो इंडियन मार्केट के एक बड़े गैप को खत्म करना चाहते थे. वो चाहते थे कि छोटे बिजनेसेज, जिन्हें ज्यादातर महिलाएं अपने घर से ही काम करके चलाती हैं, वो इंडियन मार्केट में अपनी अलग जगह बना पाएं.
पर ये सफर बिलकुल आसान नहीं था. विदित बताते हैं कि अक्टूबर का महीना था, साल था 2015 और त्योहार सर पर थे. बेंगलुरु के बाजारों में इतनी भीड़ थी कि सड़कों पर पैर रखने तक की जगह नहीं थी. वहीं जेबों में अपने बनाए फैशन डिस्कवरी ऐप के पैम्फ्लेट लिए, एक मौके की तलाश में घूम रहे थे विदित और उनके बिजनेस पार्टनर संजीव. वो एक कपड़ों की दुकान के सामने खड़े होकर वहां आने वाले हर कस्टमर को रोककर उसे अपना पैम्फलेट पकड़ाते. उससे अपनी ऐप डाउनलोड करने की रिक्वेस्ट करते. इस ऐप का नाम था फैशनियर. ऐप बनाए एक महीना हो चुका था लेकिन डाउनलोड्ज अभी भी जीरो.
मीशो की शुरुआत दो दोस्तों ने साथ मिलकर की थी. विदित और संजीव की दोस्ती हुई IIT दिल्ली में जहां विदित इलेक्ट्रिक इंजिनीयरिंग की पढ़ाई कर रहे थे और संजीव कम्प्यूटर साइंस इंजिनीयरिंग की. विदित दिल्ली के ही एक मिडिल क्लास परिवार से आते हैं जिन्हें बचपन से सक्सेसफुल होने का एक ही रास्ता बताया गया था- वो था सरकारी नौकरी का रास्ता. वहीं संजीव झारखंड में पले बढे. उनके परिवार में बच्चों को दो ही करियर ऑप्शन मिलते थे - या तो डॉक्टर या फिर इंजीनियर. खैर दोनों ने IIT दिल्ली में एडमिशन ले लिया. कॉलेज जाकर पता चला कि दुनिया कितनी बड़ी है और सपने देखने की कोई लिमिट नहीं है. उन्होंने कॉलेज के कई सीनियर्स को अपनी कंपनी शुरू करते देखा. हालांकि, कॉलेज खत्म होते ही दोनों ने बंगलुरु की IT कंपनियों में नौकरी शुरू कर दी. कुछ वक्त बाद उन्होंने खुद का स्टार्टअप शुरू करने का मन बना लिया.
विदित और संजीव चाहते थे कि वो एक ऐसा प्लेटफार्म बनाएं जहां कस्टमर्स अपनी गली-मोहल्ले की दुकानों के सारे फैशन ऑप्शन घर बैठे देख और खरीद सकें. उन्होंने इसके लिए फैशनियर नाम की कपंनी शुरू की. घर-घर जाकर इस कंपनी के ऐप को डाउनलोड करवाना शुरू किया. बहुत कोशिशों के बाद उन्होंने कुछ लोगों को ऐप डाउनलोड करने के लिए मना तो लिया, लेकिन कस्टमर्स और सेलर्स दोनों से उन्हें बहुत खराब फीडबैक मिले. विदित बताते हैं कि उन्होंने खुद को निराश नहीं होने दिया, वो खुद समझते थे कि 24 साल के लड़कों के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है.
दोनों अपने आईडिया को सुधारने की कोशिश में जुट गए. उन्होंने नोटिस किया कि लोकल दुकानदारों ने अपने कस्टमर्स का एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया हुआ है. वो अपने नए प्रोडक्ट्स को इस ग्रुप पर डालते हैं और कस्टमर्स ग्रुप से ही प्रोडक्ट खरीद लेते हैं. ये तरीका उनके लिए यूरेका मोमेंट बन गया. उन्होंने मीशो के नाम से एक नई ऐप बनाई. इसके जरिए उन्होंने छोटे दुकानदारों और छोटे-मोठे हैंडमेड प्रोडक्ट्स बनाने वाले सेलर्स को एक ऐसा प्लेटफार्म दिया जिससे वो पर्सनली व्हाट्सएप या फेसबुक इस्तेमाल करके पूरे इंडिया के कस्टमर्स तक पहुंच सकते थे. साथ ही मीशो ने उन्हें डिलीवरी सिस्टम भी उब्लब्ध कराया.
जहां एमेजाॅम और फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियों ने लगातार अपने प्लेटफॉर्म्स पर यूजर्स को ब्रैंडेड प्रोडक्ट्स और फास्ट ट्रैक डिलीवरी उपलब्ध कराने की कोशिश की, वहीं Meesho ने उन कस्टमर्स को टारगेट किया जो शॉपिंग पर ज्यादा पैसे खर्च नहीं करना चाहते. बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के ब्रैंडेड प्रोडक्ट और उनका वन डे डिलीवरी सिस्टम प्राइस कॉन्शियस कस्टमर्स के लिए उतना कारगर साबित नहीं होता. इनके उलट Meesho ने लोकल सेलर्स से कस्टमर्स को जोड़ कर उन्हें सस्ते प्रोडक्ट्स खरीदने की सुविधा दी. भारत एक डेवेलपिंग देश होने की वजह से ये बिजनेस मॉडल यहां के टियर 2 और टियर 3 इलाकों में बहुत पॉपुलर हो गया.
Meesho ने भारत के किफायती कस्टमर्स पर फोकस करके अपने प्लेटफार्म को लोकल माइक्रो सेलर्स के लिए पेश किया और प्रोडक्ट्स की कीमतों को छोटे शहरों के हिसाब से काफी अफोर्डेबल बना दिया. इस सिंपल सी सोच की वजह से, ICICI Direct की रिपोर्ट के मुताबिक, आज देश के टोटल ई-कॉमर्स ऑर्डर्स का करीब 29–31% Meesho शिप करता है. ये पॉसिबल कैसे हुआ?
Meesho देशभर के लाखों छोटे सेलर्स को कस्टमर्स से जोड़ता है. जहां बाकी प्लेटफॉर्म्स सप्लायर से अपना कमीशन लेते हैं, Meesho ज्यादातर सेलर्स से कोई कमीशन नहीं लेता. इससे घर से काम करने वाले सेलर्स और मैन्युफैक्चरर के लिए एक्सपोजर का रास्ता खोल दिया. इसलिए लाखों छोटे सेलर्स ने ज्यादा कस्टमर्स तक पहुंचने के लिए बड़ी संख्या में Meesho का सहारा लिया. इतने सारे सेलर्स की मौजूदगी Meesho को अलग-अलग वैरायटी के सस्ते प्रोडस्कट्स बेचने में मदद करती है.
Meesho की सक्सेस का दूसरा कारण है प्लेटफॉर्म पर लोगों के शॉपिंग करने का तरीका. जहां बाकी प्लेटफॉर्म्स पर लोग अपने काम का प्रोडक्ट सर्च करके खरीदते हैं, वहीं Meesho अपने प्रोडस्कट्स को खुद ही डिस्प्ले करता है. इससे यूजर्स अपनी सोशल मीडिया फीड पर और ट्रेंडिंग विडीओज में इन प्रोडक्ट्स को देखते हैं और अक्सर ऐसी चीजें खरीद लेते हैं जो उन्होंने सोची नहीं थी. ANI बयान में Meesho के CEO ने कहा कि IPO का कुछ हिस्सा इसी मार्केटिंग स्ट्रेटेजी में लगाया जाएगा.
इसके सिवा कंपनी ने IPO प्रॉस्पेक्टस में लो कॉस्ट लॉजिस्टिक्स,ग्रोसरी नेटवर्क और Meesho पेमेंट्स के डेवेलपमेंट का जिक्र किया है. IPO के बाद कंपनी AI और क्लाउड इन्वेस्टमेंट से यूजर एक्सपीरियंस बेहतर करेगी.
Meesho जीरो कमीशन मॉडल पर काम करता है. ये ज्यादातर पैसा सेलर एडवेर्टीजमेन्ट से कमाता है. यानी Meesho पर सेलर्स अपने कॉम्पिटिटर से ऊपर की रैंक पर आने के लिए ऐड खरीद सकते हैं. साथ ही Meesho लाॅजिस्टिक्स से भी पैसे कमाता है. ये अपने सेलर्स को इन हाउस लाॅजिस्टिक्स और डिलीवरी सर्विस देता है. इससे सेलर्स को काफी आसानी हो जाती है.
ई-कॉमर्स प्लटफॉर्म Meesho ने हिंदुस्तान के टियर 2 और टियर 3 शहरों में अपना सबसे बड़ा यूजर बेस बना लिया है. और अब कंपनी अपना IPO खोल रही है. Meesho का IPO आज यानी 3 दिसंबर 2025 से खुलकर 5 दिसंबर 2025 तक चलने वाला है. कंपनी ने प्राइस बैंड ₹105 से ₹111 प्रति शेयर के बीच तय किया है और लॉट साइज 135 शेयर का है. यानी रिटेल इन्वेस्टर्स को अपर प्राइस पर मिनिमम ₹14,685 लगाने होंगे. इस IPO का अलॉटमेंट 8 दिसंबर को और लिस्टिंग 10 दिसंबर को BSE-NSE पर की जाएगी. मीशो का IPO कुल ₹5,421 करोड़ का है. IPO में ₹4,250 करोड़ का फ्रेश इश्यू है. न्यूज एजेंसी ANI से बात करते हुए Meesho के CEO, विदित आत्रेय ने बताया कि फिलहाल उनका मकसद जल्द से जल्द कंपनी को एक्सपैंड करना और उसके कैश फ्लो को बढ़ाना है.