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Tata Group की परोपकारी इकाई Tata Trusts में एक बार फिर अंदरूनी विवाद गहराने लगा है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चेयरमैन नोएल टाटा (Noel Tata) और उनके करीबी दो अन्य ट्रस्टीज़ ने रतन टाटा (Ratan Tata) के नज़दीकी और कारोबारी सहयोगी मेहली मिस्त्री (Mehli Mistry) की ट्रस्टी के तौर पर दोबारा नियुक्ति को रोक दिया है. यह फैसला उस समय आया है जब टाटा ट्रस्ट्स में पहले से ही दो खेमों के बीच शक्ति संघर्ष (Power Struggle) चल रहा था.
रतन टाटा के निधन के बाद नोएल टाटा को Tata Trusts का चेयरमैन नियुक्त किया गया था. उनके नेतृत्व में यह ट्रस्ट 66% हिस्सेदारी के साथ Tata Sons, यानी टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी को नियंत्रित करता है. मौजूदा विवाद तब शुरू हुआ जब मेहली मिस्त्री का तीन साल का कार्यकाल मंगलवार को खत्म हुआ और उनकी री-अपॉइंटमेंट (Reappointment) पर वोटिंग हुई.
किन लोगों ने किया विरोध, किसने दिया समर्थन
सूत्रों के मुताबिक, Venu Srinivasan (TVS Motor के चेयरमैन एमेरिटस) और पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह, दोनों ने नोएल टाटा के साथ मिलकर मेहली मिस्त्री की दोबारा नियुक्ति के खिलाफ वोट किया. वहीं, तीन अन्य ट्रस्टीज़ )प्रमित झावेरी (पूर्व सिटीबैंक इंडिया CEO), मुंबई के वकील डेरियस खंबाटा, और पुणे के परोपकारी जहांगीर एचसी जहांगीर) मिस्त्री के समर्थन में रहे. इस तरह 7 सदस्यीय बोर्ड में तीन-तीन वोट बंट गए, जिससे टाटा ट्रस्ट्स के भीतर स्पष्ट विभाजन सामने आ गया.
रिपोर्ट्स के अनुसार, Tata Trusts में अब दो शक्तिशाली गुट बन गए हैं. पहला गुट नोएल टाटा, वेनु श्रीनिवासन और विजय सिंह का है. दूसरा गुट मेहली मिस्त्री, प्रमित झावेरी, डेरियस खंबाटा और जहांगीर एचसी जहांगीर का है. सितंबर में दोनों के बीच विवाद तब बढ़ा जब मिस्त्री और उनके समर्थक ट्रस्टीज़ ने विजय सिंह को Tata Sons के बोर्ड से हटाने के लिए वोट दिया था.
सूत्रों के अनुसार, मेहली मिस्त्री इस फैसले को कानूनी रूप से चुनौती दे सकते हैं. उनका दावा है कि 17 अक्टूबर 2024 को Sir Dorabji Tata Trust और Sir Ratan Tata Trust की संयुक्त बैठक में यह प्रस्ताव पारित हुआ था कि सभी ट्रस्टीज़ की नियुक्ति आजीवन (लाइफटाइम) होगी और उनके कार्यकाल की कोई सीमा नहीं रखी जाएगी. उस प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि यदि कोई ट्रस्टी इस समझौते के खिलाफ वोट देता है तो उसे “टाटा ट्रस्ट्स में बने रहने का अधिकार नहीं” होगा.
रिपोर्ट के अनुसार, अगर यह मुद्दा कानूनी रूप से खोला गया तो नोएल टाटा की Tata Sons बोर्ड में डायरेक्टर नियुक्ति समेत कई पुराने निर्णयों को भी पुनः समीक्षा (Reopen) किया जा सकता है.इससे पूरे टाटा ट्रस्ट्स और टाटा ग्रुप में बड़ा संवैधानिक संकट खड़ा हो सकता है.
टाटा ट्रस्ट्स के इस अंदरूनी झगड़े की गूंज अब केंद्र सरकार तक पहुंच चुकी है. सूत्रों ने बताया कि हाल ही में नोएल टाटा और Tata Sons के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात की थी. सरकार ने दोनों पक्षों से कहा है कि वे आपसी मतभेदों को सुलझाएं और मामला सार्वजनिक रूप से न बढ़ाएं, क्योंकि टाटा समूह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक अत्यंत अहम संस्थान है.
टाटा ट्रस्ट्स देश की सबसे बड़ी परोपकारी संस्था है, जो Sir Dorabji Tata Trust, Sir Ratan Tata Trust, और कई अन्य चैरिटेबल ट्रस्ट्स को नियंत्रित करती है. यह समूह Tata Sons में करीब 66% हिस्सेदारी रखता है, और टाटा समूह की लगभग 400 कंपनियों (जिनमें से 30 लिस्टेड हैं) का संचालन इसी के जरिए होता है.
टाटा समूह भारत की 156 साल पुरानी औद्योगिक विरासत है. Ratan Tata के निधन के बाद पहली बार ऐसा देखने को मिल रहा है कि Tata Trusts के भीतर इतनी स्पष्ट खेमेबाज़ी हो रही है. अब सवाल यह है कि क्या नोएल टाटा इस विवाद को शांत कर पाएंगे या यह मतभेद समूह की दिशा और प्रतिष्ठा पर असर डालेगा.
FAQs
1. Tata Trusts में विवाद क्यों हुआ है?
नोएल टाटा और दो अन्य ट्रस्टीज़ ने मेहली मिस्त्री की दोबारा नियुक्ति का विरोध किया, जिससे ट्रस्ट दो गुटों में बंट गया.
2. मेहली मिस्त्री कौन हैं?
वे रतन टाटा के लंबे समय से करीबी और कारोबारी सहयोगी हैं, जो Tata Trusts के ट्रस्टी रहे हैं.
3. क्या मामला अदालत में जा सकता है?
हाँ, मिस्त्री इसे कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं, क्योंकि पहले सभी ट्रस्टीज़ को आजीवन नियुक्त करने का प्रस्ताव पास हुआ था.
4. सरकार की इसमें क्या भूमिका है?
गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दोनों पक्षों से आपसी सुलह की अपील की है.
5. Tata Trusts की Tata Group में क्या भूमिका है?
Tata Trusts, Tata Sons में 66% हिस्सेदारी रखता है और पूरे समूह के संचालन में इसका नियंत्रण है.
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