&format=webp&quality=medium)
जॉब छोड़ने के बाद इस अकाउंट को लेकर पूरा कनफ्यूजन दूर कर लेना आपके भविष्य के लिए बहुत फायदेमंद साबित होगा. प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)
जब हम कोई नई नौकरी ज्वाइन करते हैं, तो अक्सर पुरानी कंपनी की बहुत सी बातों को पीछे छोड़ देते हैं. इनमें से एक बड़ी बात होती है हमारा पुराना सैलरी बैंक अकाउंट. अक्सर लोग नई नौकरी में मिलने वाले नए सैलरी अकाउंट के उत्साह में पुराने अकाउंट को वैसे ही छोड़ देते हैं. उन्हें लगता है कि यह अकाउंट तो जीरो बैलेंस (बिना किसी न्यूनतम राशि वाला खाता) है, इसलिए इसमें कोई पैसा न भी रखें तो क्या फर्क पड़ता है.
लेकिन आपकी यही छोटी सी सोच आगे चलकर आपके लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है. नौकरी बदलने के बाद पुराने सैलरी अकाउंट को लेकर बैंकों के अपने कुछ खास नियम होते हैं. अगर आप इन नियमों से अनजान हैं, तो बैंक चुपके से आपके खाते से जुर्माने के रूप में पैसे काटना शुरू कर देता है. इसलिए जॉब छोड़ने के बाद इस अकाउंट को लेकर पूरा कनफ्यूजन दूर कर लेना आपके भविष्य के लिए बहुत फायदेमंद साबित होगा.
सैलरी अकाउंट खुलवाते समय बैंक आपको जीरो बैलेंस की बड़ी सुविधा देते हैं. इसका मतलब यह होता है कि अगर आपके खाते में एक भी रुपया नहीं है, तब भी बैंक आपसे कोई चार्ज नहीं वसूलेगा. लेकिन यह सुविधा आपको तब तक ही मिलती है जब तक आपकी कंपनी हर महीने उस अकाउंट में आपकी सैलरी क्रेडिट (जमा) करती है.
बैंक के नियमों के मुताबिक, अगर किसी सैलरी अकाउंट में लगातार 3 महीने तक कोई सैलरी ट्रांसफर नहीं होती है, तो बैंक उसे सैलरी अकाउंट मानना बंद कर देता है. इसके बाद बैंक उस अकाउंट को ऑटोमेटिक (स्वचालित) तरीके से एक सामान्य सेविंग्स अकाउंट यानी बचत खाते में बदल देता है. जैसे ही अकाउंट का स्टेटस बदलता है, उसके साथ मिलने वाली जीरो बैलेंस की सुविधा भी पूरी तरह खत्म हो जाती है. ध्यान रहे कि यह समयसीमा और नियम अलग-अलग बैंकों में थोड़े अलग हो सकते हैं.
सैलरी अकाउंट से सामान्य सेविंग्स अकाउंट में बदलते ही उस खाते पर रेगुलर सेविंग्स अकाउंट के सारे नियम लागू हो जाते हैं. अब आपको उस अकाउंट में बैंक के नियमानुसार एक तय मिनिमम एवरेज बैलेंस (न्यूनतम औसत राशि) रखनी होगी.
यह राशि अलग-अलग बैंकों और आपके रहने वाले इलाके जैसे मेट्रो सिटी, शहरी या ग्रामीण क्षेत्र के हिसाब से तय होती है. आमतौर पर यह सीमा 5,000 रुपये से लेकर 10,000 रुपये तक होती है. अगर आप अपने उस पुराने अकाउंट में यह मिनिमम बैलेंस मेंटेन (बरकरार) नहीं करते हैं, तो बैंक आपके खाते पर नॉन-मेन्टेनेंस चार्ज यानी जुर्माना लगाना शुरू कर देता है. कई बार लोगों को इस बात का पता तब चलता है जब उनके खाते में बचे हुए कुछ पैसे भी कटकर साफ हो जाते हैं.
अगर आपके मन में यह डर है कि बैंक जुर्माना लगाते-लगाते आपके अकाउंट बैलेंस को माइनस में पहुंचा देगा, तो आपको रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के नियमों को जान लेना चाहिए. आरबीआई की गाइडलाइंस के मुताबिक, कोई भी बैंक मिनिमम बैलेंस न होने पर किसी भी सेविंग्स अकाउंट को नेगेटिव में नहीं ले जा सकता है. यानी आपका बैलेंस जीरो तो हो सकता है, लेकिन माइनस में नहीं जाएगा.
इसके अलावा, बैंक सीधे जुर्माना वसूलना शुरू नहीं कर सकते हैं. जब भी आपका बैलेंस तय सीमा से कम होगा, बैंक को आपको एसएमएस (SMS) या ईमेल के जरिए इसकी जानकारी देनी होगी. अगर आप फिर भी मिनिमम बैलेंस नहीं रखते हैं, तो बैंक आपके शॉर्टफॉल (कमी) के हिसाब से चार्ज वसूल सकता है.
इस तरह के नुकसान से बचने के लिए आपके पास मुख्य रूप से 2 रास्ते होते हैं:
पहला रास्ता (अकाउंट को दोबारा एक्टिव करना): जब आप नई नौकरी ज्वाइन करें, तो अपने नए एम्प्लॉयर (कंपनी) से बात करें. अगर आपकी नई कंपनी का भी उसी बैंक के साथ टाई-अप (अनुबंध) है, तो आप अपने पुराने सैलरी अकाउंट को ही नए जॉब के साथ लिंक करवा सकते हैं. इससे आपका अकाउंट दोबारा एक्टिव हो जाएगा और जीरो बैलेंस की सुविधा बनी रहेगी.
दूसरा रास्ता (अकाउंट पूरी तरह बंद करना): यह सबसे सुरक्षित रास्ता है. अगर आपकी नई कंपनी का उस बैंक से कोई संबंध नहीं है, तो आप अपनी पुरानी कंपनी से फाइनल सेटलमेंट की सैलरी आने के बाद उस पुराने अकाउंट को पूरी तरह बंद करवा दें.
नीचे दी गई टेबल से समझिए कि जॉब छोड़ने के बाद आपका सैलरी अकाउंट किस तरह बदलता है और उस पर क्या नियम लागू होते हैं:
| समय / स्थिति | अकाउंट का स्टेटस | मिनिमम बैलेंस की शर्त | पेनल्टी / चार्ज का नियम |
| नौकरी के दौरान (सैलरी आने तक) | सैलरी अकाउंट | शून्य (Zero Balance) | कोई पेनल्टी नहीं लगती |
| नौकरी छोड़ने के 1 से 3 महीने तक | सैलरी अकाउंट (ग्रेस पीरियड) | शून्य (Zero Balance) | कोई पेनल्टी नहीं लगती |
| लगातार 3 महीने सैलरी न आने पर | सामान्य सेविंग्स अकाउंट | 5,000 से 10,000 रुपये (बैंक और क्षेत्र के अनुसार) | मिनिमम बैलेंस न रखने पर जुर्माना शुरू |
| बैलेंस जीरो होने के बाद | सामान्य सेविंग्स अकाउंट | लागू रहती है | आरबीआई के अनुसार बैलेंस माइनस (-) नहीं हो सकता |
नौकरी बदलना आपके करियर के लिए एक बड़ा कदम है, लेकिन इस दौरान अपने पुराने वित्तीय खातों को लेकर लापरवाह होना नुकसानदेह हो सकता है. 3 महीने तक सैलरी न आने पर बैंक आपके खाते को सामान्य बचत खाते में बदलकर पेनल्टी लगाना शुरू कर देते हैं. हालांकि आरबीआई के नियम आपको खाते के माइनस में जाने से बचाते हैं, लेकिन समझदारी इसी में है कि पुरानी कंपनी का हिसाब-किताब पूरा होते ही या तो उस खाते को बंद करा दें या फिर नई कंपनी में उसी खाते को जारी रखें.
(ताजा खबरों के लिए आप हमारे WhatsApp Channel को सब्सक्राइब जरूर करें)
आर्टिकल से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल (FAQs)
Q1 नौकरी छोड़ने के कितने दिन बाद सैलरी अकाउंट बदल जाता है?
लगातार 3 महीने तक सैलरी क्रेडिट न होने पर बैंक इसे सामान्य सेविंग्स अकाउंट में बदल देते हैं.
Q2 क्या सैलरी अकाउंट में मिनिमम बैलेंस न रखने पर जुर्माना लगता है?
सैलरी अकाउंट रहने तक कोई जुर्माना नहीं लगता, लेकिन सेविंग्स अकाउंट में बदलने के बाद मिनिमम बैलेंस न रखने पर पेनल्टी लगती है.
Q3 पुराना सैलरी अकाउंट बंद न करने पर क्या नुकसान हो सकता है?
खाता बदलने पर मिनिमम बैलेंस न रखने से आपके खाते में जमा बची हुई रकम कट सकती है और सिबिल स्कोर पर भी असर पड़ सकता है.
Q4 क्या मैं अपने पुराने सैलरी अकाउंट को नई कंपनी में इस्तेमाल कर सकता हूं?
हां, अगर नई कंपनी का उसी बैंक के साथ टाई-अप है, तो आप उसे नए जॉब के साथ लिंक करवा सकते हैं.
Q5 क्या अकाउंट बंद करने के लिए कोई चार्ज देना पड़ता है?
ज्यादातर बैंक खाता खुलने के 1 साल बाद उसे बंद करने पर कोई क्लोजर चार्ज नहीं वसूलते हैं.