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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) की लोन रिकवरी के कुछ तरीकों को गलत ठहराया है और साफ तौर पर कहा है कि इनसे बचा जाना चाहिए. सीतारमण ने कहा कि लोन वसूली की प्रक्रिया नियमों और इंसानियत के दायरे में होनी चाहिए. साथ ही NBFC की तरफ से वसूला जाने वाला ब्याज भी उचित होना चाहिए. साथ ही सभी शुल्क पारदर्शी तरीके से ग्राहक को पहले से बताए जाने चाहिए.
वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि विकसित भारत 2047 की यात्रा में NBFCs की बड़ी भूमिका है. ये कंपनियां किसानों, छोटे व्यवसायियों और सामान्य परिवारों तक फाइनेंशियल सर्विसेज पहुंचा रही हैं.
वित्त मंत्री ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं को देखते हुए NBFCs को रिस्क मैनेजमेंट और लिक्विडिटी यानी नकदी नियंत्रण पर भी विशेष ध्यान देना होगा. उन्होंने कहा कि लोन तभी दिया जाना चाहिए, जब ग्राहक को उसकी सही जरूरत हो और वो समय पर उसका भुगतान कर सके.
सरकार चाहती है कि आने वाले सालों में NBFCs की कर्ज देने की क्षमता बैंकों के बराबर हो. अभी जहां बैंक लोन की तुलना में NBFC लोन करीब 24% है, वहीं 2047 तक इसे 50% तक लाने का लक्ष्य रखा गया है. साथ ही NBFC के कुल लोन का आधा हिस्सा ग्रीन एनर्जी, सस्ती हाउसिंग और MSMEs जैसे हाई ग्रोथ सेक्टरों में निवेश किया जाए.
सीतारमण ने यह भी कहा कि 20% NBFC लेंडिंग को बैंकों के साथ को-लेंडिंग फ्रेमवर्क में किया जाए. उन्होंने कहा कि NBFCs को डिजिटल तकनीक को 100 फीसदी अपनाना चाहिए. इसके लिए एक कॉमन टेक्नोलॉजी स्टैंडर्ड विकसित किया जाए, ताकि सभी NBFCs की सेवाएं पारदर्शी और तेज बन सकें.
वित्त मंत्री ने को-लेंडिंग को लेकर बैंकों और NBFCs के बीच बेहतर तालमेल को जरूरी बताया. उन्होंने कहा कि को-लेंडिंग प्लेटफॉर्म, एक समान ऑनबोर्डिंग नियम और इंटरऑपरेबल सिस्टम विकसित किए जाने चाहिए, जिससे ग्राहक को बेहतर अनुभव मिले.
सीतारमण ने कहा कि अब NBFC सिर्फ "शैडो बैंक" नहीं हैं, बल्कि मजबूत रेगुलेशन और गवर्नेंस का हिस्सा हैं. कुछ बड़ी NBFCs बैंकों के समान गवर्नेंस और कम्प्लायंस का पालन कर रही हैं.
उन्होंने कहा कि हाल ही में RBI द्वारा फंडिंग की लागत घटाने वाले कदमों से NBFCs को लाभ मिला है, इस लाभ को ग्राहकों तक पहुंचाया जाना चाहिए. सरकार NBFC सेक्टर को पूरा सहयोग देगी और उनकी चिंताओं को प्राथमिकता से सुना जाएगा.