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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. हर दो महीने के अंतराल पर RBI MPC की ये बैठक होती है. FY25-26 की चौथी बैठक 29 सितंबर से शुरू हो चुकी है. आज 1 अक्टूबर को बैठक के नतीजे घोषित होंगे. लेकिन आपने कभी सोचा है कि आखिर हर दो महीने पर इस मीटिंग की जरूरत क्यों पड़ती है और क्यों समय-समय पर रेपो रेट में बदलाव किया जाता है? यहां जानिए इस बारे में.
MPC एक 6 सदस्यीय समिति है, जिसमें तीन सदस्य RBI से होते हैं और तीन सदस्य केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं. इसका मुख्य उद्देश्य देश में महंगाई को एक तय दायरे (आमतौर पर 4% (+/- 2%)) में रखना है, साथ ही आर्थिक विकास को भी बढ़ावा देना है. ये समिति मिलकर देश की आर्थिक स्थिति का आकलन करती है और उसी के आधार पर महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले लेती है.
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दरअसल देश में बढ़ती महंगाई और अचानक से मार्केट में कम होती समान की मांग के बीच बैलेंस बनाए रखने के लिए रिजर्व बैंक को समय-समय पर बैठक करनी होती है. ऐसे में आरबीआई की छह सदस्यीय टीम मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक के जरिए महंगाई के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए रेपो रेट में बदलाव को लेकर चर्चा करती है. तीन दिनों तक ये बैठक चलती है और तीसरे दिन आरबीआई गवर्नर मीटिंग में हुए फैसले की घोषणा कर देते हैं. नियम के मुताबिक RBI MPC Meeting साल में कम से कम 4 बार करना जरूरी है. ये मौद्रिक नीति बैठक कितने-कितने समय के अंतराल पर होगी, इस अवधि को तय करने का जिम्मा समिति पर होता है.
समिति के पास बैठक को जरूरत के अनुसार बढ़ाने-घटाने का भी अधिकार होता है. अगर समिति को लगता है कि ये बैठक साल में 4 बार से ज्यादा होनी चाहिए तो इसको लेकर एक नोटिफिकेशन जारी कर दिया जाता है. पिछली बार साल 2023 में नोटिफिकेशन जारी हुआ था तो उसमें कहा गया था कि 2023-24 के लिए मौद्रिक नीति समिति की बैठक 6 बार की जाएगी जो अप्रैल, जून, अगस्त, अक्टूबर, दिसंबर और फरवरी महीने में होगी. तब से लगातार अब तक हर साल 6 एमपीसी बैठक दो महीने के अंतराल पर की जा रही हैं.
रेपो रेट वो ब्याज दर है जिस पर कमर्शियल बैंक (जैसे SBI, HDFC बैंक) अपनी तुरंत की जरूरतों को पूरा करने के लिए RBI से पैसा उधार लेते हैं. इसे 'रेपो' इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये अक्सर 'रिपर्चेज एग्रीमेंट' (Repurchase Agreement) के तहत होता है.
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रेपो रेट में बदलाव का फैसला MPC देश की मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर लेती है. इसके मुख्य कारण ये हैं:
महंगाई बढ़ने पर: अगर देश में महंगाई बढ़ रही है, तो RBI रेपो रेट बढ़ा देता है. इससे बैंकों के लिए RBI से पैसा लेना महंगा हो जाता है. नतीजतन, बैंक भी ग्राहकों को दिए जाने वाले कर्ज पर ब्याज दरें बढ़ा देते हैं (जैसे होम लोन, कार लोन). जब कर्ज महंगा होता है, तो लोग कम खर्च करते हैं और बाजार में पैसों का फ्लो (लिक्विडिटी) कम हो जाता है, जिससे महंगाई को कंट्रोल करने में मदद मिलती है.
महंगाई कम होने पर: अगर महंगाई अपने लक्ष्य से नीचे है या अर्थव्यवस्था में मांग कम है, तो RBI रेपो रेट घटा देता है. इससे बैंकों के लिए कर्ज सस्ता हो जाता है, और वो ग्राहकों को भी कम ब्याज दरों पर कर्ज देते हैं. सस्ता कर्ज मिलने से लोग ज्यादा खर्च करते हैं और निवेश बढ़ता है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है.
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जब अर्थव्यवस्था धीमी गति से चल रही होती है, तो RBI रेपो रेट घटाकर निवेश और उपभोग को प्रोत्साहित करता है. इससे नए बिजनेस शुरू होते हैं, रोजगार के अवसर बढ़ते हैं और कुल मिलाकर आर्थिक विकास को गति मिलती है.
रेपो रेट के जरिए RBI बाजार में पैसों के फ्लो को भी मैनेज करता है. जब उसे बाजार से पैसा खींचना होता है, तो वो रेपो रेट बढ़ाता है और जब पैसा डालना होता है, तो घटाता है.
वैश्विक स्तर पर होने वाले आर्थिक बदलावों का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है. MPC इन अंतरराष्ट्रीय कारकों को भी ध्यान में रखती है और उसके हिसाब से रेपो रेट में बदलाव कर सकती है ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाया जा सके.
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रेपो रेट में बदलाव का सीधा असर आपकी जेब पर पड़ता है: