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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 'शहरी सहकारी बैंक (UCBs) और ग्रामीण सहकारी बैंक (RCBs) गवर्नेंस संशोधन निर्देश, 2026' के तहत नए नियम लागू किए हैं. प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)
देश में बैंकिंग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, मजबूत और सुरक्षित बनाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI-रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) ने सहकारी बैंकों (Co-operative Banks) के खिलाफ एक बहुत बड़ा और कड़ा कूटनीतिक कदम उठाया है. रिजर्व बैंक ने शहरी और ग्रामीण दोनों तरह के सहकारी बैंकों के गवर्नेंस (संचालन) नियमों को तत्काल प्रभाव से बेहद सख्त कर दिया है.
आरबीआई की तरफ से जारी नए आदेश के अनुसार, अब सहकारी बैंकों के किसी भी निदेशक (Director) को बोर्ड में लगातार 10 साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद उसी बैंक में दोबारा निदेशक बनने के लिए कम से कम 3 साल का 'कूलिंग-ऑफ पीरियड' (Cooling-off Perio) बिताना होगा. सरकार और आरबीआई ने यह कदम उन निदेशकों को रोकने के लिए उठाया है जो नियमों की कमियों का फायदा उठाकर हेरफेर कर रहे थे.
बैंकिंग कानून (संशोधन) अधिनियम, 2025 ने शहरी सहकारी बैंकों (UCBs), राज्य सहकारी बैंकों (StCBs) और केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCBs) के निदेशकों के अधिकतम लगातार कार्यकाल को 8 साल से बढ़ाकर 10 साल कर दिया था. यह नियम यूसीबी के लिए जून 2020 और ग्रामीण सहकारी बैंकों के लिए अप्रैल 2021 से प्रभावी था.
लेकिन आरबीआई ने जांच में पाया कि कुछ निदेशक इस कानून का गलत फायदा उठा रहे थे. वे कानूनी सीमा (10 साल) खत्म होने से ठीक पहले बोर्ड से कुछ समय के लिए इस्तीफा दे देते थे, और कुछ ही दिनों के भीतर हेरफेर करके दोबारा चुनाव या सह-योजन (Co-option) के जरिए उसी बैंक के बोर्ड में शामिल हो जाते थे. इस तरह वह बिना किसी रुकावट के सालों-साल बैंक के सर्वोच्च पद पर बने रहते थे. आरबीआई ने नए नियमों में पैराग्राफ 7A जोड़कर इस चोर दरवाजे को हमेशा के लिए बंद कर दिया है.
अब कोई निदेशक यह बहाना नहीं बना सकता कि उसने बीच में ब्रेक लिया था. आरबीआई ने साफ कर दिया है कि लगातार कार्यकाल की गणना करते समय, बोर्ड में सेवा दिए गए कुल समय को जोड़ा जाएगा. अगर दो कार्यकालों के बीच का अंतर (Interruption) 3 साल से कम है, तो उस ब्रेक को शून्य माना जाएगा और पिछले कार्यकाल को भी लगातार कार्यकाल में ही गिना जाएगा. हां, अगर कोई निदेशक पूरे 3 साल या उससे अधिक समय तक बैंक के बोर्ड से बाहर रहता है, केवल तभी उसके पिछले कार्यकाल को गिनती से बाहर किया जाएगा.
बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट की धारा 35A, 10A और धारा 56 के तहत लिया गया रिजर्व बैंक का यह फैसला सहकारी बैंकिंग सेक्टर में 'वंशवाद' और 'व्यक्तिगत एकाधिकार' को खत्म करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा. नए निदेशकों और पेशेवर लोगों को बोर्ड में आने का मौका मिलेगा, जिससे सहकारी बैंकों के मैनेजमेंट में सुधार होगा. इससे उन आम मध्यमवर्गीय और ग्रामीण खाताधारकों का भरोसा भी मजबूत होगा, जो अपनी गाढ़ी कमाई इन सहकारी बैंकों में जमा करते हैं.
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