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क्या बैंक अपने नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) यानी डूबे हुए कर्ज सस्ते दामों पर बेच रहे हैं? क्या एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियां (ARC) इन लोन डील्स से जबरदस्त मुनाफा कमा रही हैं? और क्या इस पूरे प्रोसेस में कहीं बैंक, ARC और कर्जदारों के बीच ‘अंदरखाने सेटिंग’ तो नहीं हो रही? ऐसे तमाम सवाल अब भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की निगरानी में आ गए हैं.
सूत्रों के मुताबिक, RBI उन हाई-वैल्यू डील्स पर खास नजर रख रहा है, जिनमें बैंकों ने भारी रकम वाले खराब लोन एआरसी को बेचे हैं और बाद में ARC ने उन्हीं लोन से काफी अधिक रिकवरी कर ली. इससे सवाल उठ रहा है कि कहीं बैंक इन लोन को उनकी सही वैल्यू से कम पर तो नहीं बेच रहे?
RBI की चिंता का एक बड़ा कारण यह भी है कि कहीं बैंक, लोन रिकवरी के अपने सभी विकल्पों को आजमाने से पहले ही इन लोन को ARC को बेचने का आसान रास्ता तो नहीं चुन रहे. अगर ऐसा हो रहा है, तो यह न केवल बैंकों के लिए नुकसानदेह है बल्कि पूरे फाइनेंशियल सिस्टम की सेहत के लिए भी खतरा है.
RBI यह भी जांच रहा है कि कहीं इस प्रोसेस में किसी तरह की अघोषित मिलीभगत तो नहीं हो रही – मसलन बैंक, कर्जदार और ARC आपस में किसी तरह की ‘सेटिंग’ कर रहे हों, ताकि कर्जदार को राहत मिले, ARC को मुनाफा और बैंक का घाटा सिर्फ कागजों पर ही सीमित रहे.
फिलहाल RBI ने इस मुद्दे पर कोई नई गाइडलाइन जारी नहीं की है और न ही किसी औपचारिक जांच की घोषणा की है. लेकिन केंद्रीय बैंक लगातार निगरानी में है कि बैंक कितना रिकवर कर पा रहे हैं और ARC बाद में उन्हीं लोन से कितना वसूल कर रही है. RBI का लक्ष्य है कि लोन रिजॉल्यूशन की प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और फाइनेंशियल सिस्टम के दीर्घकालिक स्वास्थ्य के अनुरूप हो.