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अगर आपने भी किसी नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) में पैसा लगाया है या उससे लोन लिया है, तो यह खबर आपके लिए बहुत जरूरी है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक बहुत बड़ी कार्रवाई करते हुए 16 NBFCs का लाइसेंस यानी सर्टिफिकेट ऑफ रजिस्ट्रेशन (CoR) रद्द कर दिया है. इस फैसले के बाद, ये 16 कंपनियां अब पैसों के लेनदेन से जुड़ा कोई भी NBFC वाला काम नहीं कर पाएंगी. RBI ने यह 'सफाई अभियान' वित्तीय सेक्टर में पारदर्शिता और स्थिरता बनाए रखने के लिए चलाया है. इसके साथ ही, RBI ने 2 कंपनियों को राहत देते हुए उनका लाइसेंस बहाल भी किया है, जबकि 10 अन्य कंपनियों ने खुद ही अपना लाइसेंस सरेंडर कर दिया है.
NBFC ऐसी कंपनियां होती हैं जो बैंक तो नहीं होतीं, लेकिन बैंकों की तरह ही लोगों को लोन देने, निवेश करने और पैसे जमा करने (कुछ शर्तों के साथ) जैसे काम करती हैं. बजाज फाइनेंस, मुथूट फाइनेंस जैसी कंपनियां इसके बड़े उदाहरण हैं. ये देश की अर्थव्यवस्था में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, खासकर उन लोगों तक पैसा पहुंचाने में जहां बैंक नहीं पहुंच पाते. लेकिन, चूंकि ये सीधे जनता के पैसे से डील करती हैं, इसलिए RBI इन पर बहुत कड़ी नजर रखता है.
RBI ने इन 16 कंपनियों के लाइसेंस रद्द करने का फैसला यूं ही नहीं लिया है. लाइसेंस रद्द होने के बाद, ये कंपनियां RBI एक्ट, 1934 के सेक्शन 45-I के तहत भारत में NBFC से जुड़ा कोई भी कारोबार नहीं कर सकती हैं. इसके पीछे कई गंभीर कारण हो सकते हैं, जैसे:
नियमों का उल्लंघन: RBI द्वारा बनाए गए नियमों का पालन न करना.
न्यूनतम पूंजी की शर्त पूरी न करना: NBFC चलाने के लिए एक न्यूनतम नेट ओन्ड फंड (Net Owned Fund) की जरूरत होती है. कई बार कंपनियां इस शर्त को पूरा नहीं कर पातीं.
ग्राहकों के हितों की अनदेखी: ग्राहकों के साथ गलत व्यवहार या उनके हितों को नुकसान पहुंचाना.
इस कड़ी कार्रवाई के बीच, दो NBFCs के लिए अच्छी खबर भी आई है. RBI ने इन दोनों के लाइसेंस को बहाल कर दिया है, यानी ये अब पहले की तरह अपना काम कर सकती हैं.
इन कंपनियों के लाइसेंस कोर्ट या अपीलीय प्राधिकरण से अनुकूल आदेश मिलने के बाद बहाल किए गए हैं. शाब्रोस फिन-वेस्ट का लाइसेंस पहले न्यूनतम नेट ओन्ड फंड की शर्त पूरी न करने के कारण रद्द हुआ था, लेकिन कंपनी ने इस फैसले को सफलतापूर्वक चुनौती दी और सभी शर्तों को पूरा किया.
इनके अलावा, 10 और NBFCs ऐसी हैं जिन्होंने खुद ही अपना लाइसेंस RBI को वापस लौटा दिया है. इसका मतलब है कि वे अब NBFC का कारोबार नहीं करना चाहतीं.
इसके पीछे भी कई कारण हो सकते हैं
बिजनेस से बाहर निकलना: कुछ कंपनियां स्वेच्छा से इस बिजनेस से बाहर निकलना चाहती थीं. इनमें पूनावाला इन्वेस्टमेंट्स एंड इंडस्ट्रीज (Poonawalla Investments and Industries) और जेनिथ सिक्योरिटीज एंड इन्वेस्टमेंट जैसी बड़ी कंपनियां भी शामिल हैं.
कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी बनना: कुछ कंपनियां (जैसे इंडिया फिनसेक लिमिटेड) अब ऐसी कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) बन गई हैं, जिन्हें रजिस्ट्रेशन की जरूरत नहीं होती.
कंपनी का अस्तित्व समाप्त होना: कुछ कंपनियां दूसरी कंपनियों में मिल गईं (Merger), उनका विलय हो गया (Amalgamation) या वे बंद हो गईं (Dissolution). इनमें GMR एयरपोर्ट्स लिमिटेड और माया फिनकैप प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनियां शामिल हैं.
RBI समय-समय पर सभी NBFCs के कामकाज की समीक्षा करता रहता है. यह कार्रवाई उसी सुपरवाइजरी फंक्शन का हिस्सा है. इसका मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सभी कंपनियां नियमों के दायरे में रहकर काम करें, जिससे पूरे वित्तीय सेक्टर में पारदर्शिता और स्थिरता बनी रहे. एक ग्राहक या निवेशक के तौर पर, आपको अपना पैसा किसी भी NBFC में लगाने से पहले यह जरूर जांच लेना चाहिए कि वह RBI के साथ रजिस्टर्ड है या नहीं और उसका ट्रैक रिकॉर्ड कैसा है.