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आरबीआई (RBI) ने 135 एनबीएफसी (NBFCs) के रजिस्ट्रेशन लाइसेंस रद्द किए और 13 कंपनियों के सरेंडर को दी मंजूरी. प्रतीकात्मक फोटो (AI/ChatGPT)
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश में बिना नियमों के काम करने वाली वित्तीय कंपनियों के खिलाफ अपना कड़ा रुख जारी रखा है. रिजर्व बैंक ने भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45-आईए (6) के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए बड़ी संख्या में नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) के खिलाफ कड़ा कदम उठाया है. आरबीआई द्वारा जारी ताजा आदेशों के अनुसार, कुल 148 वित्तीय कंपनियों पर बड़ी कार्रवाई हुई है.
इन कंपनियों की सूची को दो अलग-अलग हिस्सों में देखा जा सकता है. पहली सूची उन 135 एनबीएफसी की है जिन पर रिजर्व बैंक ने सीधे कार्रवाई करते हुए उनका लाइसेंस छीना है. वहीं दूसरी सूची उन 13 एनबीएफसी की है जिन्होंने अलग-अलग वजहों से खुद ही रिजर्व बैंक के सामने अपने लाइसेंस को सरेंडर कर दिया था. इस आदेश के बाद अब ये सभी 148 कंपनियां देश में किसी भी तरह का गैर-बैंकिंग वित्तीय काम नहीं कर सकेंगी.
रिजर्व बैंक ने नियमों की अनदेखी और तय शर्तों को पूरा न करने के कारण 135 एनबीएफसी कंपनियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की है. इन सभी कंपनियों के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिए गए हैं. इस लिस्ट में एक्सप्रेस फिनकैप हाउस प्राइवेट लिमिटेड, अक्षय फिस्कल सर्विसेज लिमिटेड, अल्फा टाई-अप प्राइवेट लिमिटेड और एलीगेंस ट्रेड एंड होल्डिंग्स जैसी कई छोटी-बड़ी कंपनियां शामिल हैं.
लाइसेंस रद्द होने वाली इन 135 कंपनियों में से अधिकांश कंपनियां पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर और इसके आस-पास के इलाकों से रजिस्टर्ड हैं. इसके अलावा दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों की भी कुछ कंपनियों पर यह गाज गिरी है. आरबीआई के इस सख्त कदम का मुख्य उद्देश्य वित्तीय क्षेत्र में पारदर्शिता बनाए रखना और आम जनता के पैसों को सुरक्षित रखना है.
दंडात्मक कार्रवाई से अलग, 13 ऐसी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां भी हैं, जिन्होंने खुद आगे बढ़कर अपने रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट रिजर्व बैंक को वापस सौंप दिए हैं. आरबीआई ने इन कंपनियों के सरेंडर करने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया है. इन 13 कंपनियों की तरफ से लाइसेंस वापस करने के पीछे तीन अलग-अलग मुख्य कारण रहे हैं.
1- फाइनेंशियल बिजनेस से बाहर निकलना: इनमें से 6 कंपनियां ऐसी हैं जो अब गैर-बैंकिंग वित्तीय कारोबार से पूरी तरह बाहर निकलना चाहती हैं. इन कंपनियों में जे. थॉमस फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड और इकोनॉमी-सुपर सेल्स प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं.
2- सीआईसी मानदंडों को पूरा करना: एक कंपनी (फोररनर कैपिटल इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड) ने कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) के उन पैमानों को पूरा कर लिया है जिसके बाद उसे किसी रजिस्ट्रेशन की जरूरत नहीं रह जाती है.
3- कंपनियों का आपस में विलय होना: बची हुई 6 कंपनियों का अस्तित्व दूसरी कंपनियों में विलय (Amalgamation/Merger) होने या पूरी तरह से बंद होने की वजह से खत्म हो गया है. इस वजह से इन्होंने अपने लाइसेंस सरेंडर किए हैं, जिनमें कैस्पियन इम्पैक्ट इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनियां शामिल हैं.
रिजर्व बैंक ने साफ तौर पर निर्देश दिया है कि लाइसेंस रद्द होने के बाद अब ये सभी 135 और सरेंडर करने वाली 13 कंपनियां किसी भी प्रकार का वित्तीय लेनदेन नहीं कर सकेंगी. आरबीआई एक्ट, 1934 की धारा 45-आई के क्लॉज (ए) के तहत जो भी अधिकार एक नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी को मिलते हैं, वे सभी अधिकार अब इन कंपनियों से वापस ले लिए गए हैं. इसका मतलब है कि ये कंपनियां अब न तो बाजार से पैसा जुटा सकती हैं और न ही किसी को नया लोन या कर्ज बांट सकती हैं.
आरबीआई की यह कार्रवाई साफ संकेत देती है कि वित्तीय क्षेत्र में नियमों का पालन न करने वाली कंपनियों के लिए अब कोई ढील नहीं है. 135 एनबीएफसी के लाइसेंस रद्द करना और 13 कंपनियों के सरेंडर को मंजूरी देना वित्तीय व्यवस्था में पारदर्शिता और निवेशकों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. लाइसेंस रद्द होने के बाद ये कंपनियां अब किसी भी प्रकार का गैर-बैंकिंग वित्तीय कारोबार नहीं कर सकेंगी. इससे एक ओर जहां वित्तीय क्षेत्र में अनुशासन मजबूत होगा, वहीं आम लोगों का भरोसा भी बढ़ेगा कि केवल नियमों का पालन करने वाली और सक्षम कंपनियां ही वित्तीय सेवाएं प्रदान कर सकेंगी.
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