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Reserve Bank of India
भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों के लिए एसेट क्लासिफिकेशन और प्रोविजनिंग के नए नियम जारी किए हैं. इससे पहले अक्टूबर 2025 को इन प्रस्तावों के ड्राफ्ट जारी किए थे. इन नियमों का सबसे अहम हिस्सा 'एक्सपेक्टेड क्रेडिट लॉस' (ECL) फ्रेमवर्क को अपनाना है. नया सिस्टम बैंकों को संभावित नुकसान के लिए पहले से बफर तैयार करने की परमिशन देता है. आपको बता दें कि एक्स्पेक्टेड क्रेडिट लॉस का इस्तेमाल बैंक यह अनुमान लगाने के लिए करते हैं कि उन्हें अपने दिए गए लोन पर भविष्य में कितना नुकसान हो सकता है.
RBI के मुताबिक, बैंकों के विरोध और टाइम एक्सेटेंशन की मांग के बावजूद नियम 1 अप्रैल 2027 से प्रभावी होंगे. फिलहाल बैंक इनकर्ड लॉस मॉडल पर काम करते हैं, यानी नुकसान होने के बाद प्रोविजनिंग की जाती है.
ECL फ्रेमवर्क के तहत स्टेज और प्रोविजनिंग
| स्टेज | जोखिम का स्तर | प्रोविजनिंग का आधार |
| Stage 1 | कम/सामान्य जोखिम | 12-महीने का अनुमानित नुकसान |
| Stage 2 | जोखिम में उल्लेखनीय वृद्धि | लाइफटाइम (Lifetime) अनुमानित नुकसान |
| Stage 3 | क्रेडिट-इम्पेयर्ड (NPA) | लाइफटाइम (Lifetime) अनुमानित नुकसान |
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने NPA की पहचान के मौजूदा नियमों में कोई फेरबदल नहीं किया है. लोन को तभी एनपीए माना जाएगा, जब 90 दिन में एक भी किस्त का भुगतान नहीं किया गया हो.
एनपीए बन जाएंगे सभी लोन अकाउंट
केंद्रीय बैंक ने जोखिम तय करते वक्त बैंकों को वर्तमान और भविष्य की देश की आर्थिक स्थिति को भी बारीकी से जांचना होगा. नया नियम यह भी जरूरी बनाता है कि एनपीए की पहचान अब ऑटोमैटिक और हर दिन के आखिरी में की जाए. इससे यह पक्का होगा कि लोन की स्थिति केवल इस आधार पर तय हो कि पैसा वापस आया है या नहीं, और इसे किसी भी तरह से टाला न जा सके.